बस्तर में 3 मार्च से निशा जात्रा दैवीय आराधना प्रारंभ,ग्राम देवी-देवताओं का वार्षिक महा सम्मेलन आयोजन

ChhattisgarhExclusiveFebruary 28, Jiwrakhan lal ushare

कोंडागांव: बस्तर संभाग के अन्य मेलों में जिला कोंडागांव के वार्षिक मेले कुल 5 दिनों तक चलने वाले इस मेले का एक अन्य आर्कषण जिला मुख्यालय के आसपास के ग्रामों के नृतक दलों की ओर से पारम्परिक लोक नृत्यों की प्रस्तुतियां भी है। इनमें प्रचलित आदिम नृत्य जैसे कोंकरेग, रेला, हूल्की, माटी मांदरी, गेडी, गौर नृत्य शामिल है, जिन्हे स्थानीय ग्राम कोकोड़ी, किबई बालेंगा, पाला, तेलंगा, खरगांव, गोलावण्ड के नर्तक दल प्रमुखता से प्रदर्शित करते हैं। इन नृत्यों में प्रचलित लोक धुन धार्मिक विश्वास उत्साह और उन्माद परिलक्षित होता है।

तत्कालीन बस्तर राजवंश की ओर से संभवतः अंचल के समस्त मांझी मुखिया परगना पटेलो में धार्मिक एकता बनाए रखने एंव उनमें समन्वय स्थापित करने के लिए ग्राम देवी-देवताओं का वार्षिक महा सम्मेलन आयोजन करने के निर्देश की चर्चा की होती है। इसके तहत क्षेत्र में बसने वाले सभी समुदाय वर्ग के लोग एकजुट होकर धार्मिक कर्मकांड एंव प्रथाओं का पालन करना सुनिश्चित करते है। इस वार्षिक मेले में जिले के आसपास के ग्रामों जैसे पलारी, भीरागांव, बनजुगानी, भेलवापदर, फरसगांव, कोपाबेड़ा, डोंगरीपारा के ग्रामीण देवी-देवता, माटीपुजारी, गांयताओं का पूरे प्राचीन विधि विधान के साथ महासंगम होता है। जिले के विभिन्न समुदायों के देवी देवताओं में आराध्य मां दन्तेश्वरी के अलावा सियान देव, चैरासी देव, बुढाराव, जरही मावली, गपा गोसीन, देश मात्रा देवी, सेदंरी माता, दुलारदई, कुरलादई, परदेसीन, रेवागढ़ी, परमेश्वरी, राजाराव, झूलना राव, आंगा, कलार बुढ़ा, हिंगलाजीन माता, बाघा बसीन जैसे देवी देवता प्रमुख है। इन सभी देवताओं का पूरे धार्मिक विधि विधान ढोल नगाड़ें, माहरी, तोड़ी, मांदर एंव शंख ध्वनि के साथ भव्य पूजा अर्चना की जाती है।

ग्राम पलारी से आई हुई माता डोली एंव लाट द्वारा सर्वप्रथम पूरी भव्यता के साथ भ्रमण किया जाता है। उसके बाद उनके पीछे-पीछे अन्य ग्रामों के देवी-देवताओं एंव ग्रामों की डोलियां उनका अनुसरण करते हुए परिक्रमा करती है। इनके साथ ही छतर एंव डंगई लाट धरे हुए उनके भक्त गण भी साथ चलते हैं। पांरम्परिक आस्था के प्रतीक स्वरूप इन लाटो को काले एंव लाल झंडियों एंव फूलों से सजाया जाता है। इस दौरान पूरा बाजार स्थल ढ़ोल, मोहरियों, मांदर की धुन से गूंजता रहता है। इसे देखने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। देवी-देवताओं के परिक्रमा के बाद ‘जुझारी’ खेलने का अनुष्ठान प्रारंभ होता है। इसके तहत डोलियों को कन्धे में धरने वाले कहार स्वचालित होकर अटखेलियां करते हैं। यह माना जाता है कि इन सभी कहारों पर देवी माता आरूढ़ रहती है।

संबंधित गांवों के गांयता पुजारी कोटवार, सिरहाओ को भी सम्मानित किया जाता है। इन सब दैवीय अनुष्ठानों का प्रमुख केन्द्र जिला कोण्डागांव का बाजारपारा होता है। इस संबध में मावली माता मंदिर के पुजारी की ओर से जानकारी दी गई कि इस वर्ष मेला 3 मार्च से 8 मार्च तक आयोजित होगा और 2 मार्च को निशा जात्रा के साथ ही दैवीय आराधना प्रारंभ हो जायेगी पूर्व में इस कर्मकांड के तहत पशु बलि दिए जाने की परम्परा थी, जिसे अब प्रतीकात्मक कर दिया गया है। मेले को निर्विघ्न सम्पन्न कराने के लिए एक अन्य लोक देवता चैरासी देव के माध्यम से बाजार स्थल के समस्त कोनो में कील ठुकवाने की रस्म अदा भी की जाती है। मेले की तिथि अर्थात 3 मार्च को मुख्य पूजा स्थल मावली माता के मंदिर के पुजारियों की ओर से फूलों से सुसज्जित मंडप तैयार कर एक अन्य पुरातन मंदिर से एक अन्य इष्ट देवी बुढ़ी माता (डोकरी देव) के मंदिर में सभी एकत्रित होकर माता के पालकी को मुख्य मेला स्थल में लाया जाता है। बुढ़ी माता क्षेत्र के समस्त समुदायों की इष्ट देवी भी मानी जाती है। देवी को लाए जाने के पश्चात मुख्य पुजारियों एंव सिरहाओ की ओर से नगर के प्रमुख अधिकारी एंव जन प्रतिनिधि गणों की अगुवानी की जाती है। पूरे मेले स्थल की परिक्रमा भी परम्परागत दैवीय अनुष्ठान का एक प्रमुख अंग माना जाता है।

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