देश का लीगल सिस्टम अमीरों और ताकतवरों के पक्ष में हो गया है : जस्टिस दीपक गुप्ता

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Published  Jiwrakhan lal ushare cggrameen nëws

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपने फेयरवेल स्पीच में भारतीय न्याय व्यवस्था पर कुछ गंभीर एवं महत्त्वपूर्ण सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि देश का लीगल सिस्टम अमीरों और ताकतवरों के पक्ष में हो गया है। जज ऑस्ट्रिच की तरह अपना सिर नहीं छिपा सकते, उन्हें ज्यूडिशियरी की दिक्कतें समझकर इनसे निपटना चाहिए। उन्होंने कहा कि कोई अमीर सलाखों के पीछे होता है तो कानून अपना काम तेजी से करता है लेकिन, गरीबों के मुकदमों में देरी होती है। अमीर लोग तो जल्द सुनवाई के लिए उच्च अदालतों में पहुंच जाते हैं लेकिन, गरीब ऐसा नहीं कर पाते। दूसरी ओर कोई अमीर जमानत पर है तो वह मुकदमे में देरी करवाने के लिए भी वह उच्च अदालतों में जाने का खर्च उठा सकता है।

जस्टिस गुप्ता ने अपने विचारो को प्रकट करते हुए आगे कहा कि न्यायपालिका को खुद ही अपना ईमान बचाना चाहिए। देश के लोगों को ज्यूडिशियरी में बहुत भरोसा है। वकील कानून की बजाय राजनीतिक और विचारधारा के आधार पर बहस करते हैं। ऐसा नहीं होना चाहिए। संकट के समय, खासकर अभी जो संकट है, उसमें मेरे और आपके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होगा। लेकिन, गरीबों के साथ हमेशा ऐसा होता है। उन लोगों की आवाज नहीं सुनी जाती इसलिए उन्हें भुगतना पड़ता है। अगर कोई उनकी आवाज उठाता है तो अदालतों को जरूर सुनना चाहिए। उनके लिए जो भी किया जा सकता है, करना चाहिए।

जस्टिस गुप्ता ने बार के “मानवीय” होने की आवश्यकता के बारे में भी बताया, “एक अच्छा वकील बनने के लिए, आपको पहले एक अच्छा इंसान बनना होगा। आपको सभी की समस्याओं के प्रति संवेदनशील होना होगा।” उन्होंने कहा, “जब आप एक मानवीय न्यायपालिका की उम्मीद करते हैं, तो बार को भी मानवीय होना चाहिए। आप अपने मुव्वकिलों आसमान छूते शुल्क नहीं ले सकते हैं।”

पूर्व में भी अनेक अवसरों पर समाज के बुद्धिजीवियों ने विभिन्न मंचो से अपने वक्तव्य दिए कि भारत कि मौजूदा व्यवस्था गरीबो के अनुकूल नहीं है। गरीबो का लगातार शोषण हो रहा है। उनकी स्थिति दयनीय है। देश कि आज़ादी से लेकर अब तक जितनी भी सरकारों ने दिल्ली पर राज़ किया उन्होंने गरीबो के उत्थान के लिए अनेक योजनाए बनायीं, हजारो करोड़ रूपये खर्च किये, परन्तु ऐसा क्या कारण है कि गरीब कि स्थिति ज्यों कि त्यों है। भारतीय न्यायिक व्यवस्था को “lawyer’s paradise” कहा गया है, जिसमे अमरो कि तूती बोलती है और आम गरीबजन कि ठीक से सुनवाई नहीं है।

जस्टिस गुप्ता ने जो सवाल उठाये है कि भारतीय कानून और न्यायिक व्यवस्था अमीरो कि मुट्ठी में है, ऐसा क्यों? इसके पीछे क्या कारण है? भारतीय न्यायिक व्यवस्था लचर क्यों है? क्या कोर्ट में लंबित करोडो केसेस इसके लिए जिम्मेदार है? क्या देश की अदालतों में जज के हजारो रिक्त पद भी इसके लिए जिम्मेदार है? ये भी आरोप लगाया जाता है कि भारतीय न्यायिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार व्याप्त है? क्या न्यायाधीशों में प्रकरणों को जल्द निपटाने के लिए पहल कि कमी है?

आइये जाने इस विषय में छत्तीसगढ़ के प्रबुद्ध वर्गों की क्या राय है :

एडवोकेट  राजकुमार गुप्त

न्याय व्यवस्था कभी भी स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं रही है यह हमेशा से ही सत्ता और समाज के प्रभावशाली लोगों प्रभाव में रही और बहुत बार ऐसा देखा गया है कि न्याय व्यवस्था प्रभाव शालियों के हितों की रक्षा भी करती दिखती है है, न्याय व्यवस्था को साधन विहीन शोषित लोगों के पहुंच से जानबूझ कर बहुत दूर रखा गया है सच्चाई यह है कि स्वतंत्र भारत में न्याय तंत्र  शासक वर्ग के खिलाफ वंचितों  के असंतोष को क्रांति में परिवर्तित न होने देने के लिये शाक अब्जार्वर या कूकर के सेफ्टी वाल्व ( सीटी ) का काम करता है ।

संदीप दुबे अधिवक्ता हाई कोर्ट

उनकी बातो मे स्पस्टता है, मै यह भी कहूंगा की न्यायायिक प्रकिया मे गरीब अमीर लोगो का भेद अकेले कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि पुरे देश मे हर छेत्र मे चाहे वो न्यायपालिका हो, कार्यपालिका हो विधायिका सहित सभी जगह भेदभाव है, जस्टिस गुप्ता साहेब अपने छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के कार्यकाल के दौरान भी बहुत ही स्पष्ट वादी रहे है

अधिवक्ता निरूपमा बाजपेयी

पूर्व सदस्य, राज्य विधिज्ञ परिषद  

हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा इन्होने पद मे रहते हुये भी बिदाई भाषण में बोले अनुसार ही कार्य किया।वर्षा डोंगरे का निर्णय महत्वपूर्ण था। सु को में भी ये बेबाकी के लिये जाने जाते ।यह भी तय है इन्हें कोई लाभ का पद सेवानिवृत्ति के बाद केन्द्र सरकार नहीं देगी।इन्होने सु को के एक फैसले पर कहा था सरकार की आलोचना देशद्रोह नहीं है,और माननीय गुप्ता सर ने बिदाई भाषण में जो कहा वह सब अक्षरशः सच है।जस्टिस गुप्ता जैसे जज सालों मे एकाध ही होते है, ऐसे व्यक्ति अगर लम्बे समय तक सु को मे रहते या वंहा के चीफ जस्टिस होते काफी कुछ सुधार होते।सच है जब वे यंहा थे तब पुराने मामलों मे खास कर जेल मे जो थे उन्हें प्राथमिकता से सुना जा रहा थाकोर्ट में पैसे वाले बडे बडे लोगों के केस एक दिन मे लिस्ट होते है और सुनवाई हो जाती है ।ऐसा नहीं होना चाहिए । जो जेल में निरूद्ध है उनके केस और जो गरीब है उनके केस की सुनवाई को प्राथमिकता देनी चाहिए,अभी लाॅकडाउन मे उन महिलाओं के बारे मे किसी कोर्ट ने कोई प्रावधान नही किया जिनके पति उन्हें छोड़ दिये और वे भरण पोषण से अपनी और बच्चों की जिन्दगी बसर कर रही । इस दौरान अधिकांश पति भरण पोषण की राशी जमा करने से बच गये।

अजय सोनी, अधिवक्ता पूर्व 

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