बस्तर में एक महीने तक मनाई जाती है दिवाली, जानिए कैसे…?

BY: छत्तीसगढ़ गाथा  ON: NOVEMBER 16, 2020

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छत्तीसगढ़ के मैदानी क्षेत्रों में जब देवारी लोकपर्व मनाया जाता है. उस समय के ही आसपास छत्तीसगढ़ के दक्षिण में स्थित बस्तर क्षेत्र में ‘दियारी’ तिहार मनाया जाता है. दियारी तिहार के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए लाला जगदलपुरी लिखते हैं-

‘बस्तर भूमि के वनवासी समाज की अपनी अलग दीपावली मनती है, जिसे ‘दियारी- तिहार’ कहा जाता है. बस्तर में दियारी तिहार के अंतर्गत लक्ष्मी पूजन नहीं होता. उनका लक्ष्मी पूजन अलग होता है. धान की तैयार फसल को वे लोग लछमी मानते हैं और धूमधाम के साथ धान की बालियों को खेत से लाकर उस फसल-लछमी का विधि पूर्वक विवाह रचाते हैं. नराएन राजा के साथ. इस प्रथा को ‘लछमी जगार’ कहते हैं. बस्तर के ग्रामीण परिवेश में ‘लछमी जगार’ प्रति वर्ष क्वांर महीने से प्रारम्भ होकर अगहन पूस तक चलता रहता है और ‘दियारी तिहार’ फसल कट जाने के बाद प्रति वर्ष पूस माह से लेकर माघ पूर्णिमा तक मनाते रहते हैं.’

‘लछमी जगार’ में लछमी का अर्थ है धान की बालियां एवं जगार का अर्थ है जागरण. ‘लछमी जगार’ के विषय में बताते हुए बस्तर लोकसंस्कृति के आधिकारिक विद्वान हरिहर वैष्णव लिखते हैं-

‘लछमी जगार’ लोक महाकाव्य की मुख्यत: दो शाखाएं हैं. पहली शाखा ‘बेसरा खंदा (बाज शाखा) के नाम से जानी जाती है, जिसका प्रचलन कोंडागांव के आसपास है जबकि दूसरी शाखा ‘जम खंदा (यम शाखा) कहलाती है, जिसका प्रचलन जगदलपुर के साथ-साथ कोंडागांव के आसपास भी है. नारायणपुर में भी दोनों शाखाओं का प्रचलन मिलता है. तथापि थोड़ी-सी भिन्नता क्षेत्र के हिसाब से पायी गयी है.

‘बेसरा खंदा’ में नरायन राजा बेसरा पक्षी ले कर चिड़ियों का शिकार करने जाते हैं और इसी दौरान उनकी भेंट माहालखी यानी महालक्ष्मी (अर्थात धान) से होती है. फिर नरायन राजा माहालखी से विवाह करने की जिद ठान लेते हैं और अन्तत: उन दोनों का विवाह हो जाता है, जबकि नरायन राजा की पहले से ही 21 रानियां होती हैं. ये रानियां हैं, कोदो, कुटकी, सरसों, अरहर, मूंग, उड़द, चना, बड़रा (मटर) आदि मोटे तथा दलहनी अन्न. ये 21 रानियां माहालखी को तरह-तरह के कष्ट देती हैं, जिससे दुखी हो कर वे नरायन राजा का महल छोड़ कर अन्यत्र चली जाती हैं. उनके वहां से जाने के साथ ही नरायन राजा का महल सूना हो जाता है. फलत: वे और उनकी 21 रानियां और भाई बलराम भूख से व्याकुल हो जाते हैं और माहालखी की खोज करने लगते हैं. अन्तत: नरायन राजा माहालखी को मना-बुझा कर वापस लाने में सफल हो जाते हैं. उनकी वापसी के साथ ही महल धन-धान्य से परिपूर्ण हो जाता है.

इस शाखा की कथा में पारबती रानी द्वारा वर्षा के लिये भिमा देवता का विवाह, फिर सन्तान-प्राप्ति और कीर्तिवान होने के उद्देश्य से सन्तानहीन मेंगिन रानी (वर्षा के देवता मेघ राजा की पत्नी) द्वारा सरोवर खनन और सरोवर के तट पर आम के बीजारोपण का प्रसंग आता है. फिर जब आम अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलदार होता है तब उसके विवाह का प्रसंग भी इसी कथा में गाया जाता है. इसके साथ ही, सरोवर का भी विवाह सम्पन्न होता है. अन्त में होता है माहालखी और नरायन राजा का विवाह.

‘जम खंदा’ की कथा ‘बेसरा खंदा’ की कथा से थोड़ी-सी भिन्न है. इस शाखा में भी कथा तो माहालखी और नरायन राजा की ही हैं, किन्तु इसमें मुख्य भिन्नता है माहालखी का तीन बार जन्म लेना और नरायन राजा के साथ विवाह के पूर्व जम राजा यानी यमराजा के साथ अपूर्ण विवाह.

दोनों ही शाखाओं की कथा में माहालखी द्वारा नरायन राजा का महल छोड़ कर अन्यत्र चले जाने एवं इस कारण नरायन राजा और उनकी रानियों तथा भाई बलराम पर दुखों के पहाड़ टूट पड़ने की कथा है. दोनों ही शाखाओं की कथाएं लोक-मानस की अद्भुत रचनाएं कही जा सकती हैं, जिनके रचयिता का कोई पता नहीं है. बस! जगार गायिकाएं यानी गुरुमायें इसे वाचिक परम्परा के सहारे गाती चली आ रही हैं.’

‘दियारी तिहार’ मुख्य रूप से बस्तर के मैदान जहां धान उत्पादन होता है वहां प्रमुखता से मनाया जाता है.

दियारी का तिथि निर्धारण

‘दियारी तिहार’ का तिथि निर्धारण माटी देव गुड़ी का पुजारी जिसे बस्तर में गांवों का मुखिया होने का दर्जा प्राप्त होता है, वह माटी देव गुड़ी का पुजारी अन्य गांवों के पुजारियों के साथ बैठक आयोजित कर ‘दियारी तिहार’ की तिथि तय करते हैं. बस्तर क्षेत्र के अलग अलग गांवों में ‘दियारी तिहार’ पूस माह से माघ पूर्णिमा तक अलग-अलग तिथि में मनाया जाता है. इसलिए इन महीनों में लगभग हर दिन किसी न किसी गांव में ‘दियारी तिहार’ का उत्सव बस्तरवासी मनाते हैं.

दियारी तिहार का मुख्य आकर्षण-‘धोरई’

दियारी तिहार का मुख्य केंद्र ‘धोरई’ होते हैं. छत्तीसगढ़ के मैदान में जिस तरह गोवर्द्धन पूजा और मातर तिहार के मुख्य आकर्षण का केंद्र राउत बंधु होते हैं. ठीक वैसे ही ‘दियारी तिहार’ में धोरई. धोरई बस्तर में गाय-बैल चरवाहे को कहा जाता है. छत्तीसगढ़ के मैदान में चरवाहे का कार्य ‘राउत’ जाति के लोग करते हैं, वहीं बस्तर क्षेत्र में यह कार्य अधिकांश रूप में ‘माहरा’ जाति के लोग करते हैं.

‘दियारी तिहार’ का उत्सव रूप भी छत्तीसगढ़ के मैदानों में मनाए जाने वाले गोवर्द्धन पूजा और मातर तिहार की तरह ही होता है. बस लोकरंग में अंतर है. बस्तर में ‘दियारी तिहार’ में लोकपर्व का विशुद्ध रूप दिखाई देता है, जबकि छत्तीसगढ़ के मैदानों में मनाई जाने वाली ‘देवारी’ में बाजार के प्रभाव के कारण लोक का रंग दिन-ब-दिन फीका पड़ रहा है.

‘दियारी तिहार’ किसानी संस्कृति के आधार पशु धन के सम्मान का लोकपर्व है. धोरई और पशु मालिक के बीच आपसी समन्वय और सदाशयता का उत्सव है.

प्रथम दिवस-पशु धन मालिकों का सम्मान और पशु धन को जेठा और चुई का श्रृंगार

‘दियारी तिहार’ के प्रथम दिवस धोरई पशु मालिकों को अपनी हैसियत के अनुसार खिला-पिलाकर सम्मान करता है. ‘दियारी तिहार’ के प्रथम दिवस को छत्तीसगढ़ के मैदानों में जिस प्रकार राउत बन्धुओं द्वारा गोवर्धन पूजा के दिन पशु धन को सोहई पहनाते हैं और पशुमालिकों के आंगन में दीपदान करते हैं, बस्तर क्षेत्र में दियारी का रूप भी इससे मिलता जुलता है. दिन में पशुओं के मालिकों को पिला-खिला कर, धोरई रात में उनके घर ‘गेठा’ बांधने जाता है. ‘गेठा’ को जेठा भी कहते हैं. कोठों (पशु शालाओं) तक वह बाजे-गाजे के साथ पहुंचता है और प्रत्येक कोठे के प्रत्येक जानवर के गले में बांधता है. सन रस्सी से बनी इन मालाओं को धोरई स्वयं तैयार करता है. पलाश जड़ की रस्सी से भी मालाएं बनाई जाती हैं. बैलों और गायों की अलग-अलग प्रकार की मालाएं होती हैं. बैल की माला ‘जेठा’ और गाय की ‘चुई’ या ‘छुई’ कहलाती है. धोरई को प्रत्येक घर से जेठा बांधने का पारिश्रमिक थोड़ा सा धान मिल जाता है.

द्वितीय दिवस- गोड़धन पूजा

छत्तीसगढ़ के मैदानों में जिसे हम गोवर्धन पूजा कहते हैं उसे बस्तर में गोड़धन पूजा कहा जाता है. दूसरे दिन धोरई गाय-बैलों को पशु मालिकों के घर जाकर खिचड़ी खिलाता है. पशुओं को लाल तिलक लगाकर पुष्प से पूजन किया जाता है. पशु धन को प्रणाम करते हुए खिचड़ी खिलाई जाती है. खिचड़ी में चावल और सब्जी और अनेक भाजी के टुकड़े के अलावा अरहर, उड़द, मूंग की दाल डाली जाती है.

गोड़धन पूजन के बाद धोरई बाजे गाजे के साथ पशु मालिकों के घर जाते हैं. वहां धोरई को सम्मान में राशि या अन्न भेंट की जाती है.

तृतीय दिवस-गोठान पूजा

गोठान अर्थात वह खुला स्थान जहां गांव भर के पशुधन इकट्ठा होते हैं और आराम करते हैं. गोठान के आसपास पशुओं को धोरई चराता है और वह भी अपनी पत्नी या बच्चे के द्वारा लाये गए पेज को पीकर पशुओं के साथ दिन में आराम करता है. पेज उस पेय को कहा जाता है जो मांडिया (मांड) और कनकी (चावल के टुकड़े) को मिलाकर बनाया जाता है. गोठान का भी देवता होता है. बस्तर में ऐसी मान्यता है. गोठान देव पशुधन की सब प्रकार से रक्षा करते हैं. इस देव को ‘गोठान देव’ कहा जाता है.

गोठान पूजा के समय पशु मालिक अपने पशुओं के सींगों पर लंबे-लंबे नए कपड़ों के सिंगोटी बांधकर धूमधाम से गोठान पहुंचते हैं. सिंगोटी अर्थात बैल के सींग पर पहनाये जाने वाली पगड़ी.

गांव की गृहणियां भी इस कार्यक्रम में शिरकत करती हैं. वे नए कपड़े और धान या कोई भी अन्न या फल लेकर गोठान में उपस्थित होती हैं. गांव के समस्त लोगों द्वारा लाये गए अन्न का ढेर बनाया जाता है. इसके पश्चात सभी भेंट गोठान देव को अर्पित करते हुए पूरे मनोयोग से पूजा की जाती है. गोठान देव को पूजन के दौरान शराब चढ़ाया जाता है और मुर्गे की बलि दी जाती है. सभी भेंट आखिर में धोरई अपने पास रख लेता है. पूजन के अंत मे पशुपालक अपने बैलों को पूजन स्थल से दौड़ा देता है. उसे पकड़ने धोरई भी दौड़ता है और बैलों को पकड़कर नए सिंगोटी पर भी अधिकार कर लेता है.

कार्यक्रम के आखिरी हिस्से में धोरई और पशुधन मालिक गोठान में प्राप्त राशि और अन्न का बहुत बड़ा हिस्सा धोरई को देकर बचे हुए राशि से सब मिलकर उत्सव मनाते हैं. इस उत्सव का मुख्य आकर्षण बस्तर बियर ‘सल्फी’ का सामूहिक सेवन होता है. इस उत्सव को ‘बासी-तिहार’ कहा जाता है. इस बासी तिहार में पशुचारक, पशुपालक और पूरे ग्रामवासी नशे में मस्त होकर गाते और नाचते हुए हुल्लड़ मचाते हैं.

भूमण्डलीकरण के इस दौर में जब स्थानीयता के सौंदर्य के मूल लोकभाषाएं खतरे में हैं. हमारे लोकतांत्रिक देश में ‘भाषाओं का लोकतंत्र’ प्रश्न के घेरे में है. लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्वभाव लोकभाषाओं के संरक्षण तक दिखाई देना चाहिए तभी लोकतंत्र की परिभाषा कर्म में तब्दील होगी. लोकतंत्र का ‘लोक’ बचेगा तभी ‘तंत्र’ लोककल्याणकारी होगी. लोकपर्व को बचाना, लोकगीतों को बचाना है और इस रूप में लोकभाषाओं को भी. लोकगीत बचेंगे तभी एक अनुभव संसार बचेगा. देवारी, दियारी और सोहराई जैसे लोकपर्व भूमण्डलीकरण के एकरूपता के नारे के बरक्स स्थानीयता का उत्सव है. ग्लोबल विलेज के भूल भुलैय्या को छोड़कर अपने स्वत्व की विनम्र घोषणा है. 
———————————————डॉ. भुवाल सिंह  ठाकुर दिल्ली विश्वविद्यालय से ‘महादेवी साहित्य में नवजागरण’ विषय पर पी-एच डी किये हैं. आप छायावादी साहित्य और छत्तीसगढ़ के लोकसंस्कृति पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लगातार लिख रहे हैं. दंतेवाड़ा में उच्च शिक्षा में स्त्री शिक्षा के लिए संजीदा प्रयास के लिए ‘बस्तर पाती सम्मान’ से सम्मानित हैं. लमही, द रिसर्चर, चौमासा, स्त्रीकाल, हिंदुस्तानी जुबान युवा, वीक्षा, समकालीन जनमत, मूक आवाज़, संबोध आदि पत्रिकाओं में लेख प्रकाशित हैं. वर्त्तमान में छत्तीसगढ़ के ग्राम्यांचल में स्थित शासकीय पी.जी.कॉलेज भखारा (धमतरी) में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर के पद पर पदस्थ हैं.