वैक्सीन लगवाने से क्यों झिझक रहे हैं लोग- अमेरिकी विश्लेषण ने बताया

दुनिया

Published 6 hours ago 

on April 30, 2021

कोरोना वायरस की दूसरी लहर का सबसे सटीक उपाय टीकाकरण में तेजी बताया जा रहा है. लेकिन भारत ही नहीं अमेरिका और दुनिया के बहुत से देशों में ऐसे लोगों की संख्या बहुत है जो टीका लगवाने में झिझक महसूस कर रहे हैं. ऐसे में सवाल उठा रहा है कि आखिर लोग वैक्सीन लगवाने में इतनी झिझक क्यों दिखा रहे हैं. एक अमेरिकी शोध ने इस पर रोशनी डाली है.

टीका और जोखिम

टीका को लेकर लोगों की मानसिकता का संबंध जोखिम लेने और बर्ताव के अन्य पहलुओं से है. जीवन में जोखिम सामान्य बात है. लेकिन कई जोखिम फायदेमंद भी होते हैं. ऐसे कैल्क्युलेटेड रिस्क की सूची लंबी है. वहीं हैरानी की बात है कुछ जोखिम लेने में खतरा ज्यादा नहीं होता है और उसका प्रतिफल भी अच्छा होता है तब भी लोग वह जोखिम नहीं लेते है. कोविड-19 वैक्सीन के साथ भी ऐसा ही कुछ हो रहा है.

वैक्सीन ही इलाज?

कोविड महामारी ने जहां भारत में जहां दो लाख लोगों की जान ले ली है, वहीं अमेरिका में 5.7 लाख लाख लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. वहीं लाखों लोग इन देशों में ठीक होने के बाद बीमारी के बाद के दुष्प्रभाव झेल रहे हैं और अपने मरने का जोखिम बढ़ा चुके हैं. और विशेषज्ञ लगातार इसका समाधान वैक्सीन ही बता रहे हैं.

सब जगह है झिझक

इसके बाद भी सर्वे बताता है कि अमेरिका में बहुत से लोग तीन उपलब्ध वैक्सीन में से एक भी लगवाने में झिझक रहे हैं. ऐसा केवल अमेरिका में ही नहीं भारत और दुनिया के कई देशों में हो रहा है. ऐसा तब हो रहा है जब वैक्सीन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के एक साल पहले के दावों से ज्यादा प्रभावी और सुरक्षित साबित हुई हैं.

राजनैतिक कारण भी

अमेरिका में वैक्सीन लगवाने के कुछ प्रतिरोध राजनैतिक भी था. सर्वे में 40 प्रतिशत रिपब्लिकन्स ने रायशुमारी करने वालों को लगातार बताया था कि वे वैक्सीन लगवाने की योजना नहीं बना रहे हैं. वहीं भारत में शुरू में राजनैतिक कारण दिखाई तो दिया था, लेकिन वह केवल कुछ ही राजनैतिक लोगों तक ही सीमित दिखाई दिया था. याद करें यूपी में समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने क्या कहा था. अभी इस बारे में ऐसा कोई संकेत दिखाई नहीं दिया है.

मानवीय अविवेक

यहां कोविड महामारी का विकराल रूप देखने वाले आधे से ज्यादा अगली पंक्ति के स्वास्थ्यकर्मियों ने अभी तक वैक्सीन नहीं लगवाई है. भारत में ऐसा नहीं दिखाई दिया. न्यूयार्क टाइम्स के लेखक डेविड लियोहार्ट ने हाल ही में लिखा है, “यह जोखिम को लेकर मानवीय अविवेक का उत्तम उदाहरण है. हम प्रायः बड़े गंभीर खतरों जैसेकि कार दुर्घटना और रासायनिक प्रदूषण को कम आंकते हैं और छोटे छिपे हुए जोखिम जैसे कि हवाई दुर्घटना या फिर शार्क हमले को अहमित देते हैं.”