आर्थिक नाकेबंदी आखिर क्यो? ‌‌ आदिवासी समाज को किसने मजबूर किया सड़क पर आने के लिए

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज लो आदिवासी समाज आखिर क्यों मजबूर है, ऐसे आंदोलन के लिए , किसने मजबूर किया हमें सड़क पर आने के लिए क्या? आदिवासी नेताओं ने कभी समाज की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया! कभी सही वक्त एवं जगह पर आदिवासियों के हक अधिकार की बात उचित फोरम में या पार्टी मंच में या पार्टी के नेतृत्व के पास अपने समाज के समस्याओं को रखने में क्यों असफल रहे हैं, क्यों अपनी बात पूरी क्षमता से नहीं रख रहे हैं । हमारे पर्याप्त संख्या में विधायक के होते हुए भी शासन प्रशासन में आदिवासियों की मांग की अवहेलना ,उपेक्षा , तिरस्कार, मान अपमान क्यों हो रहा है। हमें इन बिंदुओं पर जरा गंभीरता से गौर करना होगा। हममे क्या आत्मविश्वास की कमी है? क्या हम समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं हैं ? क्या हम कुशल नेतृत्व नहीं कर पा रहे हैं, या अपनी बात को ठीक से सक्षम लोगों के पास नहीं रख पा रहे हैं, जिसके कारण हम आदिवासियों को शासन, प्रशासन में पर्याप्त भागीदारी जनसंख्या के अनुपात में नहीं मिल पा रहा है । हमें चिंतन करना पड़ेगा कि इनके पीछे का कारण क्या हो सकता है । क्या हम पढ़े लिखे नहीं हैं । क्या हममें संगठन क्षमता नहीं है? क्या हमें नेतृत्व गुण नहीं है? क्या हममे समाज को साथ लेकर चलने की कला नहीं है ? क्या हममे बिखराव दिख रहा है और यदि दिख रहा है तो वैसा समाज कभी आगे नहीं बढ़ सकता। संविधान में हमें सब कुछ दिया है लेकिन 75 साल में हम अपने पूर्वजों का इतिहास ढूंढ नहीं पाए, पढ़ नहीं पाए तथा लिख नहीं पाए। सविधान को भी हम पढ़ नहीं पा रहे हैं ,तो कैसे हम पांचवी अनुसूची ,पेशा कानून ,ग्राम सभा ,वन अधिकार कानून, राष्ट्रीय जनजाति नीति यह मुख्य विषय हैं। इसके अलावा पदोन्नति में आरक्षण, भर्ती ,फर्जी जाति प्रमाण पत्र, मात्रात्मक टूटी ,जमीन अधिग्रहण, अवैध कब्जा, फर्जी हस्तांतरण, बैक लॉक , गौण खनिज पर अधिकार, शिक्षा एवं संस्कृति के संरक्षण , इन तमाम मुद्दों पर हमारा ध्यान जा तो रहा है लेकिन इन मुद्दों को सरकार कभी भी निदान करने , राहत देने का ठोस कार्यात्मक कार्य नहीं कर पा रही है। अन्यथा 30 अगस्त से होने वाले आर्थिक नाकेबंदी आंदोलन जब मांग पूरा नहीं होगा तब तक आगे जारी रहेगा तथा भविष्य में ,राजधानी में स्थाई आंदोलन कैंप लगाकर निरंतर धरना प्रदर्शन और समय-समय पर शहर के चौक चौराहों पर भी अधिकार प्राप्त करने हेतु कड़ा संघर्ष जारी रखना पड़ेगा। इस लड़ाई में शामिल सभी आदिवासियों को जय जोहार। आप आजादी के समय भले ही नहीं थे लेकिन अधिकारों और हक की लड़ाई जारी रहेगी जो स्वाधीनता आंदोलन से, यह लड़ाई कम नहीं मानी जाएगी इनका भी नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाएगा ।आज जरूरत इस बात की है कि पूरे आदिवासी समाज सियान नौजवान ,महिलाएं युतियां एवं सभी नागरिकों से जो आदिवासियों के हित में काम करना चाहते हैं उनको सादर आमंत्रित करते हैं। सहयोग के लिए सबको धन्यवाद। जय जोहार। जय आदिवासी ।जय छत्तीसगढ़।