अजा अजजा वर्ग के शिक्षकों को आरक्षण रोस्टर का पालन करते हुए पदोन्नति का पूरा लाभ मिले-आर एन ध्रुव*

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज
स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा दिनांक 08.01.2022 को प्रधान पाठक प्राथमिक शाला शिक्षक तथा प्रधानपाठक पूर्व माध्यमिक शाला के पदो पर एल.बी.संवर्ग के शिक्षको का दिनांक 31.01.2022 तक पदोन्नति करने आदेश जारी किया गया हैं। वर्तमान के अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के पदोन्नति में आरक्षण रोस्टर का मामला कोर्ट में सुनवाई हेतु प्रक्रियाधीन है। ऐसी स्थिति में पदोन्नति के लिए जल्दबाजी करना अनुचित होगा।आरक्षण रोस्टर, बैकलाग रोस्टर के बगैर पदोन्नति किया जाना राज्य के अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग के शिक्षको के साथ भारी अन्याय होगा।क्योंकि आरक्षण रोस्टर के आधार पर अनुसूचित जाति के 12% व अनुसूचित जनजाति वर्ग के 32% हिस्सें मे आते है।शिक्षा विभाग मे होने वाली लगभग 40,000 पदो मे 18,000 पद आरक्षण रोस्टर के आधार पर अनुसूचित जनजाति व अनुसूचित जाति के हिस्से मे आयेंगें।
राज्य के बहुसंख्यक अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति वर्ग लगभग पिछले दो साल से पदोन्नति में आरक्षण बहाली हेतु विभिन्न माध्यमों से शासन–प्रशासन तक अपनी बात पहुंचाते आ रहे हैं।पदोन्नति मे आरक्षण प्रदान करने सुप्रीम कोर्ट के शर्तों के अनुरूप माननीय मनोज कुमार पिंगुआ के अध्यक्षता में गठित क्वांटिफिएबल डाटा कमेटी की रिपोर्ट मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन व सामान्य प्रशासन विभाग को प्रस्तुत कर दिनांक 08.08.2021 को मा.मुख्यमंत्री की अध्यक्षता मे मंत्री मंडल के बैठक मे अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गो के अपर्याप्त प्रतिनिधित्व की अनुशंसा सहित पदोन्नति मे आरक्षण जारी रखने अनुमोदित कर दिया गया है। राज्य सरकार की ओर से पदोन्नति मे आरक्षण केस की पैरवी हेतु नियुक्त विशेष कौंसील ने जवाब दावा माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर में प्रस्तुत कर दिया है। सुनवाई दिनांक फरवरी 2022 को निर्धारित है।एक-दो सुनवाई मे इस केस की अंतिम निर्णय आ सकती है।
रिट याचिका क्र.9778/2019 विष्णु प्रसाद तिवारी वर्सेस स्टेट आफ छ.ग. व जनहित याचिका क्र 91/2019 एस.संतोष कुमार वर्सेस स्टेट आफ छ.ग मामले मे हस्तक्षेपकर्ता काउंसिल को प्राप्त रिपोर्ट की प्रति के आधार पर क्वांटिफिएबल डाटा कमेटी की रिपोर्ट में उल्लेखित जानकारी के अनुसार अनुसूचित जनजाति के 52% व अनुसूचित जनजाति वर्ग के 48% पद शासकीय सेवाओं में रिक्त है।शिक्षा विभाग अंतर्गत तृतीय श्रेणी कें पदों मे अनुसूचित जनजाति वर्ग के 58% व अनुसूचित जाति वर्ग के 65% पद रिक्त है।
महोदय जी आपको स्पष्ट अवगत कराना चाहते हैं कि छत्तीसगढ़ लोकसेवा पदोन्नति नियम 2003 में उल्लेखित आरक्षण रोस्टर 100 बिंदु में से 44 बिंदु अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों के लिए आरक्षित है। माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर ने उच्चतम न्यायालय के शर्तो के पालन होने तक रोस्टर पर अस्थायी स्थगन रोक लगाया है । आरक्षण अधिनियम,नियम में रोक नहीं लगाया गया है, न ही समाप्त किया है । लेकिन सामान्य प्रशासन विभाग एवं अन्य विभाग ने उच्च न्यायलय के आदेश को मनमाफिक परिभाषित कर सारे रिक्त पदों को अनारक्षित (वरिष्ठता) बिंदु में पदोन्नत कर अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के आगामी वर्षों में पदोन्नति के लिए रास्ते बंद कर दिए है।क्योकि सारे पद भर जाएंगे तो आगामी पदोन्नति के लिए पद खत्म हो जाएंगे।100 बिंदु रोस्टर में क्रमशः दूसरा ,चौथा छठवां व आठवां पद अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए है। छ.ग.लोक सेवा आरक्षण अधिनियम 1994,नियम 1998 के अनुसार आरक्षित पदों को,आरक्षण रोस्टर के बिंदुओं को किसी भी रीति में अन्य वर्गाे से नही भरा जा सकता है।
महोदय जी सीधी भर्ती में पहले अनारक्षित पद भरा जाता है ।तत्पश्चात आरक्षित पद क्रम अनुसार भरा जाता है ।अनारक्षित बिंदु के पदों में सामान्यतः सामान्य वर्ग के अभ्यर्थी चयन होते हैं। इसलिए वरिष्ठता क्रम में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों का नाम ऊपर होता है । अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों की वरिष्ठता सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों से नीचे होती है।उच्च पदों में पदोन्नति के पद आधी हो जाती है। के कारण अनारक्षित वर्ग में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी कर्मचारी स्थान नही बना पाते हैं।वर्तमान पदोन्नति अनारक्षित बिंदु में होने से गैर अनुसूचित जाति, जनजाति पदोन्नत हो रहे हैं।क्योकि वरिष्ठता में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का स्थान नगण्य है। वर्तमान पदोन्नति से अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों को बहुत अधिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
भारत का संविधान आर्टिकल 16 (4) क पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता के साथ पदोन्नति में आरक्षण देने का प्रावधान करता है एवं आर्टिकल 335 शासकीय सेवाओं और पदों में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों के दावे के निपटान करने का प्रावधान करता है। जिसमें निर्धारित मानक बेंचमार्क आ तक कम करने के साथ ही संविधान के भाग 4 में निहित राज्य के नीति निदेशक तत्व आर्टिकल 46 अनुसूचित जातियों एवं जनजाति वर्गों के हितों की अभिवृद्धि राज्य शासन को सुनिश्चित करने के लिए कहता है ।संविधान में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों के मौलिक अधिकारों के प्रावधान होने के बावजूद हमारे संवैधानिक अधिकारों को नजरअंदाज कर रहे हैं।
इसलिए अनुसूचित जाति व जनजाति वर्गों के लोक नियोजन में अवसर की समता का मौलिक अधिकारों का संरक्षण व शासकीय सेवाओं में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों के दावे का ध्यान रखते हुए पदोन्नति मे आरक्षण से संबंधित माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर मे प्रक्रियाधीन रिट याचिका क्र.9778/2019 विष्णु प्रसाद तिवारी वर्सेस स्टेट आफ छ.ग. व जनहित याचिका क्र 91/2019 एस.संतोष कुमार वर्सेस स्टेट आफ छ.ग के अंतिम निर्णय आने तक अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्गों के मूलभूत संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण एवं भारत के संविधान आर्टिकल 16(4)क,व 335 के अनुपालन में शिक्षा विभाग द्वारा की जा रही पदोन्नति प्रकिया पर तत्काल रोक लगाने हेतु निवेदन सुश्री अनुसुइया उइके जी,महामहिम राज्यपाल
छत्तीसगढ़ शासन,माननीय श्री भूपेश बघेल जी, मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन,माननीय डॉक्टर प्रेमसाय सिंह टेकाम जी,मंत्री- स्कूल शिक्षा विभाग ,सहकारिता एवं आदिम जाति कल्याण विभाग छत्तीसगढ़ शासन, माननीय श्री भानु प्रताप सिंह जी अध्यक्ष, अनुसूचित जनजाति आयोग छत्तीसगढ़ शासन,श्रीमान मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन ,सचिव
सामान्य प्रशासन विभाग छत्तीसगढ़ शासन, प्रमुख सचिव स्कूल शिक्षा विभाग छत्तीसगढ़ शासन को अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ छत्तीसगढ़ के प्रांताध्यक्ष आर एन ध्रुव द्वारा की गई है। उन्होंने कहा कि यदि इस पदोन्नति के कार्यवाही को स्थगित करना संभव नहीं हो तो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति वर्ग के पदों को सुरक्षित रखकर पदोन्नति की कार्यवाही की जावे। पदों को सुरक्षित रखने से किसी भी तरीके से हाईकोर्ट का अवमानना नही होगा और ना ही किसी तरह के नियम कानून का उल्लंघन होगा बल्कि नियम कानून का पालन होगा। न्यायालय ने कहीं भी नहीं कहा है कि अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग को पदोन्नति नहीं देना है। आरक्षण नियमों का पालन नहीं करने से अनुसूचित जाति /जनजाति वर्ग के अपूरणीय क्षति हो रही है जिसे कभी सुधारा नहीं जा सकता। शासन प्रशासन यदि संगठन की बातें अनसुनी करती है तो हमे धरना-प्रदर्शन, उग्र आंदोलन के लिए बाध्य होना पड़ेगा,जिसकी समस्त जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।