छत्तीसगढ़ का कश्मीर …. चैतुरगढ़

Spread the love

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज 
यह कल्पनातीत है कि बिलासपुर के पास एक खुबसूरत जगह है जो जो अपने नैसर्गिक सुषमा से महाराष्ट्र के लोनावाला और खंडाला को भी मात दे सकता है. बम्बई के साधन संपन्न लोग महानगरीय भागम भाग से रिलेक्स होने के लिए बम्बई के नजदीक लोनावाला और खंडाला पसंदीदा (फ़ेवरिट डेस्टिनेशन) पर्यटन स्थल है. NTPC के वेस्टर्न रीजन मुख्यालय, मुंबई के मीटिंग के डेलिगेट को अक्सर इस जगह का भ्रमण कराया जाता है. इसका लाभ मुझे भी मिला है. बम्बई वालों ने इस जगह को इतना इज्जत बख्श दिया हैं कि बाहर से बम्बई पहुचने वाले लोग बरसात में एक बार वहां जाकर भीगने की चाहत जरुर रखते हैं.
लेकिन बिलासपुर से मात्र 80 और कोरबा से 70 कि.मी. दूर प्राकृतिक वनाच्छादित चैतुरगढ़ की पहाड़ी को … जो उपरोक्त पर्यटन स्थल से बेहतर और अनुपम प्राकृतिक छटाओं से परिपूर्ण है ; वह सम्मान नहीं मिल पाया है जिसका वह हकदार है, वजह या तो छत्तीसगढ़ की विपन्नता, क्षेत्रीय लोगों में पर्यटन की अभिरुचि का अभाव, दुर्गम मार्ग, घनघोर जंगल आदि कुछ भी हो सकता है.
चैतुरगढ़ दर्शन का विचार मन में अनायास ही आया. कौशल राज जी के आमंत्रण में 2 जुलाई को दोपहर में पाली पहुचे थे. विवाह. स्थल बुढादेव ठाना में पंडाल सजा तो था लेकिन तब सुनसान था. पास में ही लाफागढ़ और चैतुरगढ़ के बारे में सुना था. सो निकल पड़े चैतुरगढ़ के लिए. ड्राइविंग सीट पर मै स्वयं था, बगल में अनिल और पीछे सीट पर मिसेज थीं. पाली से आगे रोड पक्की तो है लेकिन संकरी इकहरी है. सामने से आती हुई बाईक को भी सावधानीपूर्वक रास्ता देना पड़ता है. ग्राम सैला होते हुए लाफा ग्राम पहुंचे. लाफा से आगे हरे भरे घने जंगल प्रारंभ हो जाता है. जंगल में सराई पेड़ की अधिकता है. जंगल में नगोई भांठा,जेमरा, बगदरा आदि वनग्राम गाँव पड़ा. चैतुरगढ़ के आधार तल तक पहुचने में दो घाट की चढाई पार करनी पड़ती है. हेयर पीन टर्निंग वाली घाट की चढाई में ड्राइविंग की सारे इम्तहान पास कर लिए. हमारी कार सेकण्ड और थर्ड गेयर में ही गुर्राती सी चल रही थी. ऊँचे ऊँचे सरई पेड़ों के बीच बरसात में भीगी कोलतार की घुमावदार काली सड़क किसी नागिन सी बलखाती चलती लग रही थी. अनिल तो मुझे ड्राइविंग करते हुए पहली बार देख रहा था इसलिए सहमा सहमा सा और अचंभित था…. बार बार टर्निंग पर हार्न देते हुए ड्राइव करने की ताकीद कर रह था. अनिल बता रहा था कि अपने सीनियर के साथ आया था तो आधे रस्ते से ही वापस आ गए थे.
बरसाती मौसम धुले – पुंछे हरे भरे जंगल को सद्यः स्नाता रमणी सा सौन्दर्य प्रदान कर रहा था. बरखा रानी अपने आँचल में हलकी हलकी फुहारें लेकर हमारे साथ कभी रमती… कभी थमती सी चल रही थी. इक्के दुक्के युवक युवती बाइक में आ जा रहे थे. घाट में कुछ झोरकी (झरने) भी दिखाई दिए जो अभी सूखे थे. सावन में उनमे यौवन अवश्य आ जाएगा.
जोखिम, जोश और कौतुक के साथ अंततः हम आधार तल तक पहुंचे. बाएं तरफ समतल और चौरस वाहन पार्किंग है. जहाँ दो चारपहिया और कुछ दुपहिया वाहन खड़े थे. दायीं तरफ झोपड़ी और तम्बू में स्वल्पाहार और पूजा सामग्री के कुछ दुकाने हैं. आसपास घनघोर सराई जंगल है. जहा से पैदल चढ़ाई शुरू होती है वहां दस बारह फीट ऊँचा लोहे का गेट है जो अक्सर बंद रहता है खाश मौके पर ही खोला जाता है. पैदल दर्शनार्थियों के लिए बगल में छोटा गेट है जिससे होकर हम आगे बढे. पंद्रह बीस फीट चौड़ा पक्का रास्त है. आधार तल से पौन – एक कि. मी. की शिखर तक घुमावदार किन्तु काफी खड़ी चढ़ाई है. सांस भरने लगता है.
चढ़ाई के अंत में हम मैकल पर्वत श्रंखला के छत्तीसगढ़ में सबसे ऊँची छोटी पर थे जिसकी ऊंचाई समुद्र सतह से 3060 फीट है. लेकिन ऊपर चोटी नहीं चार पांच वर्ग कि. मी. का समतल प्लेट्यु (पठार) है. मंदिर का गर्भगृह नौ सोपान ऊँचे चबूतरे पर बना है. गर्भगृह में मह्माई दाई की बंदन लेपित मूर्ति है जैसा गाँव गाँव में मिलता है. इसे महिषासुर मर्दिनी के मंदिर के नाम से प्रचारित किया गे है लेकिन महिषासुर की आकृति नहीं है. पास में ही मंदिर के सेवादारों के लिए कुछ कमरे भी बनवाये गए हैं. जब हम मंदिर पहुंचे तो वहां से एक युवक आया, मंदिर के गर्भ गृह का कपाट खोला और हमें दर्शन और पूजन करवाया. बातचीत से पता चला कि वह युवक ही बइगा है… नाम है रनसिंह धनुहार. कुछ ही मिनटों में एक भगवाधारी युवा भी आया और अपने आप को यहाँ का पुजारी होने का दावा किया. हमें बिलासपुर से आया जानकार अपने आप को बिलासपुर अशोकनगर का निवासी बताया. मंदिर परिसर में दर्शनार्थियों के विश्राम के लिए सुन्दर मेहराबदार पक्का कुटीर भी जिसका निर्माण NTPC ने करवाया है. परिसर में विशाल जलाशय भी है. थोड़ी दूर पर VIP लोगों के लिए हेलीपेड की सुविधा भी है.
वर्तमान में मंदिर परिसर की प्रबंधन समिति में दो गुटों के बीच विवाद की स्थिति है. यह बात मंदिर के सेवादारों और आधार तल के दुकानदारों से ज्ञात हुआ. एक गुट में प्रभु चौहान (पाली के चौहान पेट्रोलियम के संचालक) के साथ बिलासपुर, जांजगीर चाम्पा और कोरबा के संभ्रांत लोग है तो दुसरे गुट में ग्राम लाफा के तंवर राजा लाल कीर्तिकुमार सिंह के वंशज के साथ आस पास के वनग्राम जेम्ररा, बगदरा आदि के ग्रामीण जन हैं.
चैतुरगढ़ जिसे लाफागढ़ नाम से भी जाना जाता है को तंवर वंशी राजा पृथ्वीदेव प्रथम के शासनकाल में उनके द्वारा बनवाया गया था। मंदिर निर्माण में प्रयुक्त प्रस्तर और शिल्प को देखते हुए निर्माण काल का निर्धारण पाली के मंदिर (नवमी शताब्दी) के बाद की शताब्दी किया जा सकता है.शिखर पर दृश्य अलौकिक था. चारो तरफ धुंध पसरा हुआ था. वस्तूतः हम धुंध में नहीं बल्कि बादलों के आगोश में थे. बरसात की बुँदे नहीं थी फिर भी पेड़,पत्थर रास्ते, हमारे बाल चेहरे नम हो रहे थे. हवा में भीगने का आनंद अद्भुत और कल्पनातीत था. शिखर से निचे दुधिया बादलों में लिपटे हरित कानन ऐसे लग रहे थे मानो वनदेवी चुनरी ओढ़े शांत अविचल ध्यान में बैठी हो.
ऐसे मनोरम दृश्य में खोये हम पैदल उतरते कब आधार ताल पहुँच गए … भान ही नहीं हुआ.
निचे चाय की चुस्कियों के साथ अपना आनंदानुभुति आपस में साझा कर रहे थे तो लोगों ने बताया कि गर्मियों में भी यहाँ तापमान ३० डिग्री से. पार नहीं करता. इसलिए इसे छत्तीसगढ़ का कश्मीर कह जा सकता है. शीत आतप या पावस ऋतु में भी चैतुरगढ़ के मनोरम दृश्य का आनंद लिया जा सकता है.
,
चैतुरगढ़ का जलाशय, झरना, नदी, दुर्लभ जड़ी-बूटी, गुप्त गुफ़ा एवं औषधीय वृक्षों एवं पौधो से परिपूर्ण क्षेत्र विशाल, अनुपम, अलौकिक एवं दिव्य है….दर्शनीय है… प्रणम्य है।