छत्तीसगढ़

पदोन्नति में आरक्षण के संबंध में जब तक माननीय उच्च न्यायालय में स्थगन समाप्त नहीं हो जाता तब तक किसी भी हालत में अनुसूचित जाति/ जनजाति के लिए आरक्षित रिक्त पदों को नहीं भरा जाए

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युजदोन्नति में आरक्षण के संबंध में जब तक माननीय उच्च न्यायालय में स्थगन समाप्त नहीं हो जाता तब तक किसी भी हालत में अनुसूचित जाति/ जनजाति के लिए आरक्षित रिक्त पदों को नहीं भरा जाए उसे सुरक्षित रखा जावे और जितने सामान्य वर्ग के कर्मचारी अनुसूचित जाति जनजाति के लिए आरक्षित पदों पर नियम विरुद्ध पदोन्नत हुए हैं उसे तत्काल पदानवत जावे

छ.ग.उच्च न्यायालय द्वारा प्रकरण क्रमांक WP(S)No. 9778/2019 विष्नुप्रसन्न तिवारी विरूद्ध छ0ग0राज्य, WP.PIL/91/2019 में पदोन्नति में आरक्षण नियम 2003 को निरस्त कर दो माह में माननीय सुप्रीम कोर्ट एम. नागराज केस एवं जर्नेल केस में पारित आदेश के शर्तों का पालन करते हुये नये पदोन्नति नियम 02 माह में बना लेने की छूट दी गई थी पर उक्त शर्तों का पालन किये बिना सामान्य प्रशासन विभाग व्दारा दिनांक 30 अक्टुबर 2019 को नये नियम तैयार कर लागू किया गया जिसे चुनोैती देने के कारण 100 बिंदु के रोस्टर नियम पर दिनांक 09.12.2019 को इसे सर्वोच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांत के विपरीत होना बताकर पी-5 पदोन्नति के लिये 100 बिंदु के रोस्टर पर रोक स्थगन का आदेश देते हुये आरक्षण के बिना सरकार वरिष्ठता के आधार पर नियम कानून का पालन करते हुये नियमित पदोन्नति दे सकती है, कहा गया है। परन्तु नियम एवं कानून का पालन किये बिना मात्र वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति दी जा रही है जबकि आरक्षण अधिनियम-1994 एवं नियम-1998 तथा पदोन्नति नियम-2003 एवं समय समय पर हुए संशोधन प्रभावी है। मात्र रोस्टर नियम-5 जिसके अनुसार 100 बिंदु का रोस्टर तैयार किया गया है, को स्थगित किया गया, समाप्त नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में लागू पदोन्नति नियम-2003 समय-समय पर शासन द्वारा जारी निर्देश/आदेश के अनुसार आरक्षित पदों को किसी भी तरीके से अनारक्षित वर्गों से नहीं भरा जावेगा। इस महत्वपूर्ण प्रावधान का उल्लंघन करते हुए न्यायालय के आदेश का गलत व्याख्या करते हुए आरक्षित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के रिक्त पदों को अनारक्षित वर्ग सामान्य एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/ कर्मचारीयों से पदोन्नति द्वारा भरा जा रहा है, जबकि होना यह चाहिए कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित रिक्त पदों को न्यायालय के अंतिम आदेश तक सुरक्षित रखा जाकर शेष बचे पदों को वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति द्वारा भरा जा सकता है, परन्तु सामान्य प्रशासन विभाग/विधि विभाग/महाधिवक्ता से कोई दिशा-निर्देश या अभिमत जारी किए बिना सभी विभागों द्वारा नियम विरूद्व आरक्षित रिक्त पदों को एवं बैकलाग रिक्त पदो को सामान्य एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी से भरा जा रहा है, जिससे आरक्षित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी के पदोन्नति पर आरक्षण संबंधी भारतीय संविधान अनुच्छेद-16(4)(क), 85 वाॅं संविधान संशोधन, 2001 पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता,16(4)(ख) संविधान संशोधन 2000 बैकलाग रिक्ति को 50 प्रतिशत कोटा से अतिरिक्त होना बताया गया है, एवं अनुच्छेद-335 का 82 वाॅं संविधान संशोधन 2000 का स्पष्ट उल्लंघन किया जा रहा है और ऐसा कर आरक्षण अधिनियम/नियम का उल्लंघन किया जा रहा है, जिस पर तत्काल रोक लगाया जाकर आरक्षित पदों पर पदोन्नत सामान्य/अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी की पदोन्नति तत्काल निरस्त किया जावे और विधि विभाग/सामान्य प्रशासन विभाग के दिशा-निर्देश नियम के बिना हो रहे पदोन्नति की कार्यवाही पर रोक लगाई जावे। वर्तमान पदोन्नति व्यवस्था से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारियों को अपूरणीय क्षति होगी, जिसे पूरा कर पाना संभव नहीं होेगा, क्योंकि जो अनारक्षित वर्ग के सामान्य/अन्य पिछड़े वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी आरक्षित पदो के विरूद्व पदोन्नत हो गए है, उन्हें हटाये जाने पर न्यायालय का शरण लेंगे और स्थगन प्राप्त कर लेंगे। जैसा कि फर्जी जाति के मामलों पर जो स्थगन लिए है उसे आज तक स्थगन नहीं हटाया जा सका है। पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी को पदोन्नति पर परिणामिक वरिष्ठता सहित आरक्षण का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) (क) 85 वां संशोधन द्वारा जोड़ा गया है, जिसे छत्तीसगढ़ शासन के पत्र क्रमांक छ.ग.शासन व्दारा यह निर्देश स्पष्टीकरण सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र क्रमांक एफ 4-2/2001/2/2 दिनांक 08 मार्च 2006 व्दारा जारी कर प्रभावी किया है।
इसी प्रकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के निर्धारित मानक वाले लोक सेवक उपलब्ध नही होते हैं तो पदोन्नति के लिये मूल्यांकन के मानकों को नियम 08 के अंतर्गत बेंच मार्क को एक श्रेणी शिथिल करने का उपबंध किया गया है, इसके अनुसार प्रथम श्रेणी से प्रथम श्रेणी की पदोन्नति में बेंच मार्क बहुत अच्छा ‘‘क‘‘ 15 अंक निर्धारित है, परन्तु अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी के लिए भारतीय संविधान संशोधन-82 द्वारा अनुच्छेद-335 में संशोधन के अनुसार सीआर मूल्यांकन एक श्रेणी कम करते हुए मानक श्रेणी ‘‘ख’’ अच्छा 10 अंक तक शिथिल करने का प्रावधान है ।

इसी प्रकार आरक्षित श्रेणी के ऐसे व्यक्ति आगामी पदोन्नति के लिये सिनियारिटी या मेरिट के आधार पर अनारक्षित बिंदु के लिये पदोन्नति हेतु उसका नंबर आता है और पदोन्नति के लिए योग्य पाया जाता है तो उसे पदोन्नति देते हुए आगामी संबंधित आरक्षित बिंदु के विरूद्ध मान्य किया जाएगा का प्रावधान किया गया है, जिसे छत्तीसगढ़ पदोन्नति नियम-2003 के नियम सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देश पत्र क्रमांक.एफ.4.-2/2001/1/3 दिनांक 11 फरवरी 2008 जारी किया गया है।

इसी तरह छ.ग. पदोन्नति नियम 2003 के नियम 06 के उप नियम 16 के संबंध में यह स्पष्ट किया गया है, कि रोस्टर का बिंदु आरक्षित ही रहेगा उपरोक्त व्यवस्था तब तक उक्त आरक्षित बिंदु के लिए रहेगी जब तक कि संबंधित वर्ग का व्यक्ति पदोन्नति के लिए विचार हेतु पात्रता ग्रहण नहीं कर लेता।

2- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) (क) 85 वां संशोधन में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य के अधिकारी/कर्मचारी राज्य के सेवा में पर्याप्त नहीं है राज्य के अधीन सेवाओं में परिणामिक वरिष्ठता सहित पदोंन्नति के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी, के प्रावधान किया गया है जिसके पालन में छत्तीसगढ़ में भी पदोन्नति नियम 2003 में अनुसूचित जाति, जनजाति के लोक सेवकों को पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता दिया गया है, जो दिनांक 17-06-1995 से (पिछले तिथि ) से लागू किया गया है।

इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट किया गया है कि रोस्टर में अनारक्षित वर्ग का बिंदु सामान्य वर्ग के लिये आरक्षित नहीं है, वरन अनारक्षित है अर्थात् अनारक्षित बिंदु पर यदि वरिष्ठता के आधार पर आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति का नंबर सिनियारिटी एवं योग्यता के आधार पर आता है तो उसे अनारक्षित बिंदु के विरूद्ध विचार किया जायेगा जो बाद में उसी वर्ग के आरक्षित बिंदु से समायोजित नहीं होगा। छ.ग.शासन व्दारा यह निर्देश स्पष्टीकरण सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र क्रमांक एफ 4-2/2001/2/2 दिनांक 08 मार्च 2006 व्दारा जारी किया गया है ।

परन्तु माननीय छ.ग.उच्च न्यायालय बिलासपुर व्दारा दिनांक 04.02.2019 को रिट अपील नंबर 409/2013 को खारीज करते हुये छ.ग. पदोन्नति नियम 2003 के नियम 05 आरक्षण रोस्टर को असंवैधानिक होना मानते हुये अवैध घोषित कर दिया गया तथा छ.ग.शासन को यह छूट दी गई कि माननीय उच्चतम न्यायालय के एम. नागराज एवं अन्य विरूद्ध भारत संघ एवं अन्य (2006)8 एससीसी 212 एवं जर्नेल सिंह एवं अन्य वि. लक्ष्मीनाराण गुप्ता (2018) 10 एससीसी 396 में पारित आदेश में प्रतिपादित सिद्धांत के अनुसार नये नियम या पालिसी बना सकते हैं। परंतु माननीय उच्चतम न्यायालय के उक्त प्रतिपादित सिद्धांत शर्तों एवं संविधान के अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान संशोधन के अनुसार अनु.जाति, जनजाति के प्रतिनिधित्व के आंकड़े क्वांटिफाइबल डाटा एकत्र किये बिना ही छ.ग.शासन व्दारा दिनांक 22 अक्टूबर 2019 को नियम 5 में संशोधन कर 100 बिंदु का नया रोस्टर नियम अधिसूचित कर दिया गया जिसके कारण उक्त नये नियम 5, 100 बिंदु के नये रोस्टर नियम को माननीय उच्चतम न्यायालय के व्दारा प्रतिपादित सिंद्धांतो एवं शर्तों के अनुसार नहीं होने के कारण रिट याचिका क्रमांक डब्ल्यू.पी.एस 9778/2019 विष्नुप्रसन्न तिवारी वि. छ.ग.शासन रिट पिटीशन पीआईएल 91/2019 के आधार पर दिनांक 09.12.2019 को पदोन्नति नियम 2003 के आरक्षण रोस्टर नियम 5 में स्थगन आदेश दिया गया और आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि शासन चाहे तो वरिष्ठता के आधार पर नियम कानून के अनुसार नियमित पदोन्नति दे सकती है।

परंतु बिना नियम निर्देश के आरक्षण अधिनियम 1994 नियम 1998 के नियम 16 ,17, एवं 19 जिसमें एससी एसटी के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने सभी विभागों में नोडल अधिकारी, अनु.जाति, जनजाति मंत्री के नेतृत्व में स्थायी कमेटी व्दारा समीक्षा करने, प्रतिवर्ष विधान सभा में एससी ,एसटी, ओबीसी सामान्य वर्ग के स्वीकृत, भरे, रिक्त, बैकलाग रिक्त पदों की जानकारी प्रस्तुत करने के प्रावधानों का पालन नहीं कराने एवं रोस्टर बैकलाग रोस्टर के अनुसार न्यायालय में प्रतिनिधित्व के आंकड़े प्रवर्गवार एवं संवर्ग वार सभी विभागों का एकत्र कर जवाब दावा शासन की ओर से पेश नही करने के कारण नियम विरूद्ध अनु.जाति, जनजाति के लिए आरक्षित पदों को सामान्य एवं ओबीसी वर्ग के कर्मचारियों से भरा जा रहा है। माननीय न्यायालय के आदेश का गलत व्याख्या कर सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति में अवैध लाभ पहुंचाया जा रहा है जिससे 44 प्रतिशत एससी, एसटी के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान संशोधन का हनन हो रहा है।

कर्नाटक में वर्ष 2018 में तय समय में क्वांटीफाइबल डाटा एकत्र कर परिणामिक वरिष्ठता सहित संशोधित आरक्षण अधिनियम 2018 तैयार कर लागू कर लिया गया, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय ने सही विधिसम्मत संवैधानिक होना पाया है। परंतु छ.ग.शासन अनु.जाति, जनजाति के हितों के रक्षण के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय एम. नागराज एवं अन्य वि. भारत संघ एवं अन्य (2006)8 एससीसी 212 एवं जर्नेल सिंह एवं अन्य वि. लक्ष्मीनाराण गुप्ता (2018) 10 एससीसी 396 में पारित आदेश के शर्तो के अनुसार एवं बी. के. पवित्रा 2 विरूद्व कर्नाटका में कर्नाटक राज्य की तरह रत्न प्रभा कमेटी (वरिष्ठ आई.ए.एस./एसीएस महिला अधिकारी के नेतृत्व में) की तरह एक कमेटी कर्नाटक भेजकर अध्ययन कर यहाॅं भी अनु.जाति, जनजाति के प्रतिनिधित्व जांचने हेतु क्वाटिंफाईबल डाटा तय समय सीमा में तैयार करवा सकती है परंतु एक लम्बा समय व्यतीत हो जाने तथा माननीय उच्च न्यायालय द्वारा कई अवसर देने पर भी अभी तक अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के उचित प्रतिनिधित्व के आंकड़े एकत्र नही करवा पायी है। जो गंभीर चिंता का का विषय है, इसका मुख्य कारण शासन व्दारा पिंगुआ कमेटी को समिति व्दारा रिपोर्ट देने का समय-सीमा निश्चित नही करना एवं किये जाने वाले कार्य को स्पष्ट नही करना है । अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के साथ ओबीसी वर्ग के पिछड़ेपन का आंकड़ा एकत्र करने की जिम्मेदारी पिंगुआ कमेटी को सौंपा जाना अनुचित और विलंबकारी है। क्योंकि माननीय उच्चतम न्यायालय व्दारा इनक़ेे पिछड़ेपन की जांच या डाटा एकत्र करने के शर्त को समाप्त कर दिया गया है और ओबीसी को पदोन्नति में आरक्षण का कोई प्रावधान नही है। जबकि आरक्षण अधिनियम 1994, नियम 1998 नियम 16,17,19 के प्रावधान अनुसार प्रतिनिधित्व जांचने के लिए सभी संवर्ग सभी श्रेणी के पदों के लिए प्रत्येक विभाग प्रत्येक स्थापना में रोस्टर/बैकलाॅग रोस्टर बना है, जिसे देेखकर स्पष्ट जाना जा सकता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिये आरक्षित पद भर चुके हैं अथवा रिक्त है। यदि रिक्त है, उक्त आंकड़े के आधार पर छत्तीसगढ़ में परिणामिक वरिष्ठता सहित पदोन्नति में संशोधित आरक्षण अधिनियम नियम बनाकर लागू कर माननीय न्यायालय में जवाब पेश किया जा सकता है। क्योंकि संविधान के अनुसार राज्य को अनुसूचित जाति, जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व के लिये पदोन्नति में आरक्षण देने का अधिकार अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान व्दारा दिया गया है।

आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 19 के तहत् प्रतिवर्ष सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षित पदों की विस्तृत जानकारी श्रेणीवार (प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थ वर्ग) स्वीकृत, भरे, रिक्त एवं बैकलाॅग की जानकारी वार्षिक प्रतिवेदन के रूप में राज्य, संभाग, जिला स्तरीय पदों की जानकारी, डाटा विधान सभा में प्रस्तुत करती है। वर्ष 2016, 2017 एवं 2018 में जो डाटा विधान सभा में प्रस्तुत की गई है, अधिकांश विभागों में जानकारी अप्राप्त होना दर्शाया गया है, जबकि सभी विभागों में आरक्षण अधिनियम-16 के द्वारा नोडल अधिकारी नियुक्त है, उनके माध्यम से डाटा आसानी से मंगवाया जा सकता था। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व एवं आरक्षण अधिनियम के क्रियान्वयन एवं मानिटरिंग के लिए स्थायी समिति का गठन किया गया है, जिसका अध्यक्ष अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति विकास कल्याण मंत्री को बनाया गया है। उनके माध्यम से शासकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व की जांच एवं रोस्टर, बैकलाॅग रोस्टर जाॅंच किया जाकर प्रतिनिधित्व की डाटा को जाॅंचा जा सकता है। उक्त स्थायी समिति का बैठक नियमित रूप से शीघ्र प्रारंभ किये जाने की आवश्यकता है।
बैकलाॅग रोस्टर के अनुसार रिक्त पदों पर नियुक्ति पदोन्नति छः माह में विशेष भर्ती अभियान और डी.पी.सी. व्दारा नियुक्ति करने का प्रावधान है तथा प्रतिवर्ष जनवरी की स्थिति में वर्षवार रिक्तियों के आधार पर डी.पी.सी. का प्रावधान है, जो नियमित नहीं हो रहा है, जिसकी नियमित समीक्षा कराये जाने की आवश्यकता है।
अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ छत्तीसगढ़ के प्रांताध्यक्ष आर एन ध्रुव द्वारा महामहिम राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके जी, माननीय मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन श्री भूपेश बघेल जी, माननीय विधि मंत्री , माननीय आदिमजाति कल्याण मंत्री श्री डॉक्टर प्रेमसाय सिंह टेकाम जी, मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन,सचिव सामान्य प्रशासन आरक्षण प्रकोष्ठ को पत्र लिखकर जब तक माननीय उच्च न्यायालय में स्थगन समाप्त नहीं हो जाता तब तक किसी भी हालत में अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए आरक्षित रिक्त पदों को नहीं भरा जाये उसे सुरक्षित रखा जावे और जितने सामान्य वर्ग के कर्मचारी अनुसूचित जाति, जनजाति केे लिये आरक्षित रिक्त पदों पर नियम विरूद्ध पदोन्नत हुये हैे,उसे तत्काल पदावनत किए जाने की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना काल में जब लोग अपने अपने घरों में इस आपात स्थिति से बचने के लिए सुरक्षित थे। ऐसे समय में अनुसूचित जनजाति वर्ग के पदों के विरुद्ध हजारों की तादाद में अनारक्षित वर्ग के अधिकारी कर्मचारियों की पदोन्नति हो गई है जो गंभीर चिंता का विषय है।

उसे सुरक्षित रखा जावे और जितने सामान्य वर्ग के कर्मचारी अनुसूचित जाति जनजाति के लिए आरक्षित पदों पर नियम विरुद्ध पदोन्नत हुए हैं उसे तत्काल पदानवत जावे

छ.ग.उच्च न्यायालय द्वारा प्रकरण क्रमांक WP(S)No. 9778/2019 विष्नुप्रसन्न तिवारी विरूद्ध छ0ग0राज्य, WP.PIL/91/2019 में पदोन्नति में आरक्षण नियम 2003 को निरस्त कर दो माह में माननीय सुप्रीम कोर्ट एम. नागराज केस एवं जर्नेल केस में पारित आदेश के शर्तों का पालन करते हुये नये पदोन्नति नियम 02 माह में बना लेने की छूट दी गई थी पर उक्त शर्तों का पालन किये बिना सामान्य प्रशासन विभाग व्दारा दिनांक 30 अक्टुबर 2019 को नये नियम तैयार कर लागू किया गया जिसे चुनोैती देने के कारण 100 बिंदु के रोस्टर नियम पर दिनांक 09.12.2019 को इसे सर्वोच्च न्यायालय के न्याय दृष्टांत के विपरीत होना बताकर पी-5 पदोन्नति के लिये 100 बिंदु के रोस्टर पर रोक स्थगन का आदेश देते हुये आरक्षण के बिना सरकार वरिष्ठता के आधार पर नियम कानून का पालन करते हुये नियमित पदोन्नति दे सकती है, कहा गया है। परन्तु नियम एवं कानून का पालन किये बिना मात्र वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति दी जा रही है जबकि आरक्षण अधिनियम-1994 एवं नियम-1998 तथा पदोन्नति नियम-2003 एवं समय समय पर हुए संशोधन प्रभावी है। मात्र रोस्टर नियम-5 जिसके अनुसार 100 बिंदु का रोस्टर तैयार किया गया है, को स्थगित किया गया, समाप्त नहीं किया गया है। ऐसी स्थिति में प्रदेश में लागू पदोन्नति नियम-2003 समय-समय पर शासन द्वारा जारी निर्देश/आदेश के अनुसार आरक्षित पदों को किसी भी तरीके से अनारक्षित वर्गों से नहीं भरा जावेगा। इस महत्वपूर्ण प्रावधान का उल्लंघन करते हुए न्यायालय के आदेश का गलत व्याख्या करते हुए आरक्षित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के रिक्त पदों को अनारक्षित वर्ग सामान्य एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/ कर्मचारीयों से पदोन्नति द्वारा भरा जा रहा है, जबकि होना यह चाहिए कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित रिक्त पदों को न्यायालय के अंतिम आदेश तक सुरक्षित रखा जाकर शेष बचे पदों को वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति द्वारा भरा जा सकता है, परन्तु सामान्य प्रशासन विभाग/विधि विभाग/महाधिवक्ता से कोई दिशा-निर्देश या अभिमत जारी किए बिना सभी विभागों द्वारा नियम विरूद्व आरक्षित रिक्त पदों को एवं बैकलाग रिक्त पदो को सामान्य एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी से भरा जा रहा है, जिससे आरक्षित अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी के पदोन्नति पर आरक्षण संबंधी भारतीय संविधान अनुच्छेद-16(4)(क), 85 वाॅं संविधान संशोधन, 2001 पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता,16(4)(ख) संविधान संशोधन 2000 बैकलाग रिक्ति को 50 प्रतिशत कोटा से अतिरिक्त होना बताया गया है, एवं अनुच्छेद-335 का 82 वाॅं संविधान संशोधन 2000 का स्पष्ट उल्लंघन किया जा रहा है और ऐसा कर आरक्षण अधिनियम/नियम का उल्लंघन किया जा रहा है, जिस पर तत्काल रोक लगाया जाकर आरक्षित पदों पर पदोन्नत सामान्य/अन्य पिछड़ा वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी की पदोन्नति तत्काल निरस्त किया जावे और विधि विभाग/सामान्य प्रशासन विभाग के दिशा-निर्देश नियम के बिना हो रहे पदोन्नति की कार्यवाही पर रोक लगाई जावे। वर्तमान पदोन्नति व्यवस्था से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारियों को अपूरणीय क्षति होगी, जिसे पूरा कर पाना संभव नहीं होेगा, क्योंकि जो अनारक्षित वर्ग के सामान्य/अन्य पिछड़े वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी आरक्षित पदो के विरूद्व पदोन्नत हो गए है, उन्हें हटाये जाने पर न्यायालय का शरण लेंगे और स्थगन प्राप्त कर लेंगे। जैसा कि फर्जी जाति के मामलों पर जो स्थगन लिए है उसे आज तक स्थगन नहीं हटाया जा सका है। पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी को पदोन्नति पर परिणामिक वरिष्ठता सहित आरक्षण का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) (क) 85 वां संशोधन द्वारा जोड़ा गया है, जिसे छत्तीसगढ़ शासन के पत्र क्रमांक छ.ग.शासन व्दारा यह निर्देश स्पष्टीकरण सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र क्रमांक एफ 4-2/2001/2/2 दिनांक 08 मार्च 2006 व्दारा जारी कर प्रभावी किया है।
इसी प्रकार अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के निर्धारित मानक वाले लोक सेवक उपलब्ध नही होते हैं तो पदोन्नति के लिये मूल्यांकन के मानकों को नियम 08 के अंतर्गत बेंच मार्क को एक श्रेणी शिथिल करने का उपबंध किया गया है, इसके अनुसार प्रथम श्रेणी से प्रथम श्रेणी की पदोन्नति में बेंच मार्क बहुत अच्छा ‘‘क‘‘ 15 अंक निर्धारित है, परन्तु अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारी/कर्मचारी के लिए भारतीय संविधान संशोधन-82 द्वारा अनुच्छेद-335 में संशोधन के अनुसार सीआर मूल्यांकन एक श्रेणी कम करते हुए मानक श्रेणी ‘‘ख’’ अच्छा 10 अंक तक शिथिल करने का प्रावधान है ।

इसी प्रकार आरक्षित श्रेणी के ऐसे व्यक्ति आगामी पदोन्नति के लिये सिनियारिटी या मेरिट के आधार पर अनारक्षित बिंदु के लिये पदोन्नति हेतु उसका नंबर आता है और पदोन्नति के लिए योग्य पाया जाता है तो उसे पदोन्नति देते हुए आगामी संबंधित आरक्षित बिंदु के विरूद्ध मान्य किया जाएगा का प्रावधान किया गया है, जिसे छत्तीसगढ़ पदोन्नति नियम-2003 के नियम सामान्य प्रशासन विभाग के निर्देश पत्र क्रमांक.एफ.4.-2/2001/1/3 दिनांक 11 फरवरी 2008 जारी किया गया है।

इसी तरह छ.ग. पदोन्नति नियम 2003 के नियम 06 के उप नियम 16 के संबंध में यह स्पष्ट किया गया है, कि रोस्टर का बिंदु आरक्षित ही रहेगा उपरोक्त व्यवस्था तब तक उक्त आरक्षित बिंदु के लिए रहेगी जब तक कि संबंधित वर्ग का व्यक्ति पदोन्नति के लिए विचार हेतु पात्रता ग्रहण नहीं कर लेता।

2- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 16(4) (क) 85 वां संशोधन में स्पष्ट प्रावधान किया गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात राज्य को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति के पक्ष में जिनका प्रतिनिधित्व राज्य के अधिकारी/कर्मचारी राज्य के सेवा में पर्याप्त नहीं है राज्य के अधीन सेवाओं में परिणामिक वरिष्ठता सहित पदोंन्नति के लिए उपबंध करने से निवारित नहीं करेगी, के प्रावधान किया गया है जिसके पालन में छत्तीसगढ़ में भी पदोन्नति नियम 2003 में अनुसूचित जाति, जनजाति के लोक सेवकों को पदोन्नति में परिणामिक वरिष्ठता दिया गया है, जो दिनांक 17-06-1995 से (पिछले तिथि ) से लागू किया गया है।

इसके अतिरिक्त यह भी स्पष्ट किया गया है कि रोस्टर में अनारक्षित वर्ग का बिंदु सामान्य वर्ग के लिये आरक्षित नहीं है, वरन अनारक्षित है अर्थात् अनारक्षित बिंदु पर यदि वरिष्ठता के आधार पर आरक्षित श्रेणी का व्यक्ति का नंबर सिनियारिटी एवं योग्यता के आधार पर आता है तो उसे अनारक्षित बिंदु के विरूद्ध विचार किया जायेगा जो बाद में उसी वर्ग के आरक्षित बिंदु से समायोजित नहीं होगा। छ.ग.शासन व्दारा यह निर्देश स्पष्टीकरण सामान्य प्रशासन विभाग के परिपत्र क्रमांक एफ 4-2/2001/2/2 दिनांक 08 मार्च 2006 व्दारा जारी किया गया है ।

परन्तु माननीय छ.ग.उच्च न्यायालय बिलासपुर व्दारा दिनांक 04.02.2019 को रिट अपील नंबर 409/2013 को खारीज करते हुये छ.ग. पदोन्नति नियम 2003 के नियम 05 आरक्षण रोस्टर को असंवैधानिक होना मानते हुये अवैध घोषित कर दिया गया तथा छ.ग.शासन को यह छूट दी गई कि माननीय उच्चतम न्यायालय के एम. नागराज एवं अन्य विरूद्ध भारत संघ एवं अन्य (2006)8 एससीसी 212 एवं जर्नेल सिंह एवं अन्य वि. लक्ष्मीनाराण गुप्ता (2018) 10 एससीसी 396 में पारित आदेश में प्रतिपादित सिद्धांत के अनुसार नये नियम या पालिसी बना सकते हैं। परंतु माननीय उच्चतम न्यायालय के उक्त प्रतिपादित सिद्धांत शर्तों एवं संविधान के अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान संशोधन के अनुसार अनु.जाति, जनजाति के प्रतिनिधित्व के आंकड़े क्वांटिफाइबल डाटा एकत्र किये बिना ही छ.ग.शासन व्दारा दिनांक 22 अक्टूबर 2019 को नियम 5 में संशोधन कर 100 बिंदु का नया रोस्टर नियम अधिसूचित कर दिया गया जिसके कारण उक्त नये नियम 5, 100 बिंदु के नये रोस्टर नियम को माननीय उच्चतम न्यायालय के व्दारा प्रतिपादित सिंद्धांतो एवं शर्तों के अनुसार नहीं होने के कारण रिट याचिका क्रमांक डब्ल्यू.पी.एस 9778/2019 विष्नुप्रसन्न तिवारी वि. छ.ग.शासन रिट पिटीशन पीआईएल 91/2019 के आधार पर दिनांक 09.12.2019 को पदोन्नति नियम 2003 के आरक्षण रोस्टर नियम 5 में स्थगन आदेश दिया गया और आदेश में यह भी कहा गया है कि यदि शासन चाहे तो वरिष्ठता के आधार पर नियम कानून के अनुसार नियमित पदोन्नति दे सकती है।

परंतु बिना नियम निर्देश के आरक्षण अधिनियम 1994 नियम 1998 के नियम 16 ,17, एवं 19 जिसमें एससी एसटी के उचित प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने सभी विभागों में नोडल अधिकारी, अनु.जाति, जनजाति मंत्री के नेतृत्व में स्थायी कमेटी व्दारा समीक्षा करने, प्रतिवर्ष विधान सभा में एससी ,एसटी, ओबीसी सामान्य वर्ग के स्वीकृत, भरे, रिक्त, बैकलाग रिक्त पदों की जानकारी प्रस्तुत करने के प्रावधानों का पालन नहीं कराने एवं रोस्टर बैकलाग रोस्टर के अनुसार न्यायालय में प्रतिनिधित्व के आंकड़े प्रवर्गवार एवं संवर्ग वार सभी विभागों का एकत्र कर जवाब दावा शासन की ओर से पेश नही करने के कारण नियम विरूद्ध अनु.जाति, जनजाति के लिए आरक्षित पदों को सामान्य एवं ओबीसी वर्ग के कर्मचारियों से भरा जा रहा है। माननीय न्यायालय के आदेश का गलत व्याख्या कर सामान्य वर्ग के कर्मचारियों को पदोन्नति में अवैध लाभ पहुंचाया जा रहा है जिससे 44 प्रतिशत एससी, एसटी के संवैधानिक अधिकार (अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान संशोधन का हनन हो रहा है।

कर्नाटक में वर्ष 2018 में तय समय में क्वांटीफाइबल डाटा एकत्र कर परिणामिक वरिष्ठता सहित संशोधित आरक्षण अधिनियम 2018 तैयार कर लागू कर लिया गया, जिसे माननीय उच्चतम न्यायालय ने सही विधिसम्मत संवैधानिक होना पाया है। परंतु छ.ग.शासन अनु.जाति, जनजाति के हितों के रक्षण के लिये माननीय उच्चतम न्यायालय एम. नागराज एवं अन्य वि. भारत संघ एवं अन्य (2006)8 एससीसी 212 एवं जर्नेल सिंह एवं अन्य वि. लक्ष्मीनाराण गुप्ता (2018) 10 एससीसी 396 में पारित आदेश के शर्तो के अनुसार एवं बी. के. पवित्रा 2 विरूद्व कर्नाटका में कर्नाटक राज्य की तरह रत्न प्रभा कमेटी (वरिष्ठ आई.ए.एस./एसीएस महिला अधिकारी के नेतृत्व में) की तरह एक कमेटी कर्नाटक भेजकर अध्ययन कर यहाॅं भी अनु.जाति, जनजाति के प्रतिनिधित्व जांचने हेतु क्वाटिंफाईबल डाटा तय समय सीमा में तैयार करवा सकती है परंतु एक लम्बा समय व्यतीत हो जाने तथा माननीय उच्च न्यायालय द्वारा कई अवसर देने पर भी अभी तक अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के उचित प्रतिनिधित्व के आंकड़े एकत्र नही करवा पायी है। जो गंभीर चिंता का का विषय है, इसका मुख्य कारण शासन व्दारा पिंगुआ कमेटी को समिति व्दारा रिपोर्ट देने का समय-सीमा निश्चित नही करना एवं किये जाने वाले कार्य को स्पष्ट नही करना है । अनुसूचित जाति, जनजाति वर्ग के साथ ओबीसी वर्ग के पिछड़ेपन का आंकड़ा एकत्र करने की जिम्मेदारी पिंगुआ कमेटी को सौंपा जाना अनुचित और विलंबकारी है। क्योंकि माननीय उच्चतम न्यायालय व्दारा इनक़ेे पिछड़ेपन की जांच या डाटा एकत्र करने के शर्त को समाप्त कर दिया गया है और ओबीसी को पदोन्नति में आरक्षण का कोई प्रावधान नही है। जबकि आरक्षण अधिनियम 1994, नियम 1998 नियम 16,17,19 के प्रावधान अनुसार प्रतिनिधित्व जांचने के लिए सभी संवर्ग सभी श्रेणी के पदों के लिए प्रत्येक विभाग प्रत्येक स्थापना में रोस्टर/बैकलाॅग रोस्टर बना है, जिसे देेखकर स्पष्ट जाना जा सकता है कि अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिये आरक्षित पद भर चुके हैं अथवा रिक्त है। यदि रिक्त है, उक्त आंकड़े के आधार पर छत्तीसगढ़ में परिणामिक वरिष्ठता सहित पदोन्नति में संशोधित आरक्षण अधिनियम नियम बनाकर लागू कर माननीय न्यायालय में जवाब पेश किया जा सकता है। क्योंकि संविधान के अनुसार राज्य को अनुसूचित जाति, जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व के लिये पदोन्नति में आरक्षण देने का अधिकार अनुच्छेद 16(4)(क) 85 वाॅं संविधान व्दारा दिया गया है।

आरक्षण अधिनियम 1994 की धारा 19 के तहत् प्रतिवर्ष सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षित पदों की विस्तृत जानकारी श्रेणीवार (प्रथम, द्वितीय एवं चतुर्थ वर्ग) स्वीकृत, भरे, रिक्त एवं बैकलाॅग की जानकारी वार्षिक प्रतिवेदन के रूप में राज्य, संभाग, जिला स्तरीय पदों की जानकारी, डाटा विधान सभा में प्रस्तुत करती है। वर्ष 2016, 2017 एवं 2018 में जो डाटा विधान सभा में प्रस्तुत की गई है, अधिकांश विभागों में जानकारी अप्राप्त होना दर्शाया गया है, जबकि सभी विभागों में आरक्षण अधिनियम-16 के द्वारा नोडल अधिकारी नियुक्त है, उनके माध्यम से डाटा आसानी से मंगवाया जा सकता था। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के प्रतिनिधित्व एवं आरक्षण अधिनियम के क्रियान्वयन एवं मानिटरिंग के लिए स्थायी समिति का गठन किया गया है, जिसका अध्यक्ष अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति विकास कल्याण मंत्री को बनाया गया है। उनके माध्यम से शासकीय सेवाओं में प्रतिनिधित्व की जांच एवं रोस्टर, बैकलाॅग रोस्टर जाॅंच किया जाकर प्रतिनिधित्व की डाटा को जाॅंचा जा सकता है। उक्त स्थायी समिति का बैठक नियमित रूप से शीघ्र प्रारंभ किये जाने की आवश्यकता है।
बैकलाॅग रोस्टर के अनुसार रिक्त पदों पर नियुक्ति पदोन्नति छः माह में विशेष भर्ती अभियान और डी.पी.सी. व्दारा नियुक्ति करने का प्रावधान है तथा प्रतिवर्ष जनवरी की स्थिति में वर्षवार रिक्तियों के आधार पर डी.पी.सी. का प्रावधान है, जो नियमित नहीं हो रहा है, जिसकी नियमित समीक्षा कराये जाने की आवश्यकता है।
अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ छत्तीसगढ़ के प्रांताध्यक्ष आर एन ध्रुव द्वारा महामहिम राज्यपाल सुश्री अनुसुइया उइके जी, माननीय मुख्यमंत्री छत्तीसगढ़ शासन श्री भूपेश बघेल जी, माननीय विधि मंत्री , माननीय आदिमजाति कल्याण मंत्री श्री डॉक्टर प्रेमसाय सिंह टेकाम जी, मुख्य सचिव छत्तीसगढ़ शासन,सचिव सामान्य प्रशासन आरक्षण प्रकोष्ठ को पत्र लिखकर जब तक माननीय उच्च न्यायालय में स्थगन समाप्त नहीं हो जाता तब तक किसी भी हालत में अनुसूचित जाति, जनजाति के लिए आरक्षित रिक्त पदों को नहीं भरा जाये उसे सुरक्षित रखा जावे और जितने सामान्य वर्ग के कर्मचारी अनुसूचित जाति, जनजाति केे लिये आरक्षित रिक्त पदों पर नियम विरूद्ध पदोन्नत हुये हैे,उसे तत्काल पदावनत किए जाने की मांग करते हुए उन्होंने कहा कि कोरोना काल में जब लोग अपने अपने घरों में इस आपात स्थिति से बचने के लिए सुरक्षित थे। ऐसे समय में अनुसूचित जनजाति वर्ग के पदों के विरुद्ध हजारों की तादाद में अनारक्षित वर्ग के अधिकारी कर्मचारियों की पदोन्नति हो गई है जो गंभीर चिंता का विषय है।