राजनीति

राष्ट्रीय दलों की ताजपोशी, कौन साबित होगा आदिवासी हितकारी

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज़ 
रायपुर । छत्तीसगढ़ प्रदेश की पहचान यहां के मूल निवासी आदिवासी राज्य के रूप में होता है, जमींदारी भले ही कोई भी सम्हालता हो परन्तु जल, जंगल और जमीन का असल हकदार आदिवासियों को ही माना गया है। आदिवासी समाज अपने रूढि़वादी परम्पराओं,रीति-रिवाजों के साथ निरंतर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे, आदिवासियों ने अपनी स्वतंत्रता को बचाये रखा और किसी राजनीतिक दलों की बपौती नहीं बनने दिया, इसलिए आधुनिकता के इस दौर में अपनी परम्पराओं के चलते आदिवासी अस्तित्व बरकरार है। हाल ही में छत्तीसगढ़ में सम्पन्न विधानसभा चुनाव में कौन सी राष्ट्रीय दल सरकार बनाती है यह सवाल आदिवासी हित से सीधे जुड़ा हुआ है क्योंकि किसी भी राष्ट्रीय दलों की ताजपोशी में कौन, कितने आदिवासियों के हितकारी साबित होती हैं, मायने यह रखता है, हाल ही के वर्षों में आदिवासी अपने मूल हक से वंचित होते महसूस कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ राज्य में दो प्रमुख राजनीतिक दल कांग्रेस या भाजपा में से जिसकी भी सरकार बनें आदिवासियों को अपने जल, जंगल और जमीन के हक की चिंता है, ऐसे में नवगठित सरकार उनके इस हक पर कितने जिम्मेदार साबित होते हैं, यह आदिवासियों के वर्तमान और भविष्य को भी दिशा देने वाला साबित होगा। आदिवासियों की ओर से उनकी चिंताओं पर गौर किया जाये तो सवाल उठना लाजिमी है कि क्या? आदिवासी मुद्दों को सदन से लेकर कैबिनेट तक उठाने हेतु कितने प्रतिबद्ध है? क्या 32 प्रतिशत आरक्षण आदिवासियों को वापस दिला सकते हैं? क्या आदिवासियों की समस्या हल करने साथ खड़े रहेंगे? क्या आदिवासियों को केवल वोटर ही बनाकर गुलामी कराएंगे? क्या आदिवासी विधायक गण पार्टी के इशारे सिर हिलाकर हां में हां मिलाने वाले ही बने रहेंगे? क्या आदिवासी विधायक गण मानसिक / बौद्धिक जड़ता के शिकार बने रहेंगे? क्या आदिवासी विधायक गण अपने आदिवासी सामाजिक अगुवा या कार्यकर्ताओं की अनसुनी करेंगे? क्या आदिवासी विधायक गण अपने ही आदिवासी समाज के लोगों के साथ गद्दारी करते रहेंगे? क्या आदिवासी विधायक गण गैर आदिवासी लोगों की गुलामी करते रहेंगे? क्या आदिवासी विधायक गण आदिवासी समाज की उपेक्षा/ अवहेलना ही करते रहेंगे? आदिवासी समाज की मांगों पर प्रमुख राजनीतिक दल आश्वस्त करें और प्रतिज्ञा पूर्वक आदिवासी विधायक प्रत्याशी समाज को आश्वासन दे, कि वे आदिवासी हितों के साथ हैं और उनके हितकारी निर्णयों के लिए कटिबद्ध हैं, यदि हां तो आदिवासी समाज भी वचनबद्ध रहने तैयार हैं कि वे उनके साथ हैं और आगे भी रहेंगे।