हसदेव जंगल की कहानी रुढिजन्य परम्परा के तत्वाधान में जमीनी हालात से रूबरू होने का अवसर मिला – सर्व आदिवासी समाज
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज़ हसदेव कहने से, पेड पौधे और पर्यावरण के नाम पर वहाटसअप में बतियाने जैसे कि लोग सक्रिय हैं उससे काम नहीं चलेगा। हमें भी सर्व आदिवासी समाज रूढ़िजन्य परम्परा के तत्वावधान में आयोजित जमीनी हालत से रूबरू होने का अवसर मिला। अडानी प्रोजेक्ट शुरू होने पर हटाये गए “केते गांव ” के दुख व दर्द को शब्दों में बांधना असंभव है । लोग केवल पेड व पर्यावरण को ही जान रहें हैं वह भी दूर से वहाटसअप से।लेकिन इससे आगे आदिवासियों के आम जिंदगी पर काफी बुरा असर पड़ा है । गांव व्यवस्था के छेड छांव से लोग एकाएक विधवा एवं विधुर बहुत से लोग हो गए हैं, उनके परिवार तबाह हो गया है। गांव के बैगा परिवार पुरी तरह वंश वृद्धि से वंचित हो गया है। एक विस्थापित परिवार जो सम्पन्न था ,मौत हुई तो दूसरे गांव के लोग मरधट में जगह नहीं दिए उन्हे परिवार के जमीन पर अंतिम सफर तय करना पड़ा। पीड़ा अनेक है। बहरहाल इस अभियान मे प्रदेश अध्यक्ष तिरुमाल बी एस रावटे महासचिव तिरुमाल विनोद नागवंशी , बालोद गोंड समाज जिलाध्यक्ष प्रेमलाल कुंजाम दुर्ग गोंडवाना समाज अध्यक्ष तिरुमाल हेमंत नेताम जी, धमतरी के कोषाध्यक्ष तिरुमाल कमल मरावी व भिलाई से कमल सिंह नेताम आसपास के सभी जिलों के सभांग अध्यक्ष जिलाध्यक्ष व अन्य पदाधिकारी साथ साथ “केता,धाट बररा, सालही,फतेहपुर, हरिहरपुर के वासिंदो का दुख व दर्द को जाना व समझा।
सर्व आदिवासी समाज द्वारा हसदेव अरण्य क्षेत्र (परसा, केते, साल्ही,हरिहरपुर, घाटबर्रा, बासेन) में कोयला खनन से गांव के आदिवासी समुदाय के संकृति, परंपरा , जल, जंगल , ज़मीन और उनके आर्थिक स्थिति के ऊपर दुष्प्रभाव का अध्ययन के लिए समिति का *परसा एक्सटेंशन केते बासेन* कोयल खनन में 5 जनवरी को गांव वाले से चर्चा किए।
आज चीख-चीखकर मदद की गुहार लगा रहा है। आज तुम मुझे बचा लो, कल मैं तुम्हें बचा लूंगा। प्रदेश का सबसे बड़ा वनक्षेत्र हसदेव अपनी असतित्व की लड़ाई खुद ही लड़ने को मजबूर है। इसे वेंटीलेटर पर ला दिया है। लाखों जीव-जन्तुओं के आश्रय स्थल रहे हसदेव को अब प्राण वायु के संकट आ पड़े हैं।
जैवविविधता से भरपूर है। इसे छत्तीसगढ़ का हरा फेफड़ा भी कहा जाता है। गोंड आदिवासियों का इसे सुरक्षित घर माना जाता है। यहां 82 प्रजाति के पक्षियां निवास करती है। हसदेव के भीतर 167 प्रकार की वनस्पतियां हैं। जो मानव जीवन के लिए वरदान है। यहां हाथी निवास करते हैं। ये हसदेव नदी का प्रवाह क्षेत्र भी है।
के कटते एक-एक पेड़ों को बचाना आवश्यक है। आज जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। ये किसी से छिपी नहीं है। दुनिया ने कोरोना संकट के दौर में पेड़ों व आक्सीजन के महत्व को बेहत समझा है। प्रकृति का दुश्मन पूरे मानव समुदायों को गहरा आघात पहुंचा

