कविता के शीर्षक मोर प्रान बसे हे जंगल म आर.के.कुंजाम
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज़
मय तो आदिवासी लईका ,मोर प्रान बसे हे जंगल म।
पेड़ पौधा मोर संगी,मितान प्रकृति म हे मोर जान,
कोयली ,मयना,पड़की सुआ के गुरतुर बोली।
मय तो आदिवासी लईका, मोर प्रान बसे हे जंगल म।
बड़े बड़े हे रूख राई,बघवा भालू के कल्लई,
जब देखथव, आंखी डहर ले आंसू बहिथे जब देखथंव पेड़ पौधा के कटई,
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
विकास के नाम म ,होवत हे विनाश, पता नई शासन प्रशासन ल,
जेन जीवन देथे,पानी बरसाथे,परियावयरण ल शुद्ध ताजा रखय्या जेकर करत हे कटई।
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
जन्म म लकड़ी,बिहाव म लकड़ी,मरे म लकड़ी होथे साथ,
तभो ले मुरख अज्ञानी समझ नई पावत हे हम आदिवासी के बात।
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
जीवन देवईय्या,अन्न उपजईय्या, पालन पोषन करईय्या
इही परकृति हे भगवान।
साक्षात् मानव,ज्ञानी, वैज्ञानिक अऊ जानव मानव सब विदवान।
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
सुघ्घर सुघ्घर जरी बुटी,आनी बानी के फूल,
महक जाथे चारो कोती,नई पूरय किरीतरीम सेंठ के खुशबू,
सब गंदगी दूरिहा हो जाथे अईसन मोर जंगल के धुर।
मय तो आदिवासी लईका, मोर प्रान बसे हे जंगल म।
पईसा के लालच,खा डरीच नेता मंत्री,अधिकारी, अऊ ठेकेदार ल,
समझ नईये अइसन परोपकार करईय्या जीवन देवईय्या ल कर दीच सब बरबाद।
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
एक इंकर भूगतना ल,एक दिन भूगते ल परही सब जगत के प्रानी ल,
धरती तपही,बरफ पिघलही,परकृति विपदा जब आही,
हाकाकार मचही त्राहि-त्राहि मचही त उदयोग पति सरकार कति फेंकाही।
एकरे सेती देश के सब लोग बाग ल कहतहंव,बचा ल जंगल रूख राई ल,
नई त एक दिन बिंदरा बिनाश हो जाही,त नई देख सकहू कखरो कल्लई ल।
मय तो आदिवासी लईका मोर प्रान बसे हे जंगल म।
जय सेवा जय प्रकृति जय जोहार
स्व रचित रचना दिनांक -6/2/2024
समय 10 से 11 बजे रात्रि
मोर पहचान — रामकुमार कुंजाम
व्याख्याता
पंडित दीनदयाल उपाध्याय वार्ड भाटापारा जिला बलौदाबाजार भाटापारा

