कन्तेली के गोंड राजा यशवंत सिंह मरकाम के एक गाँव बघर्रा (लोरमी) पंहुची गोंडवाना युवाशक्ति
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
ग्राम बघर्रा लोरमी से १५ कि.मी. दूऋ पर स्थित है. ग्राम पीथमपुर से ग्राम विचारपुर, दिन्दोल होते हुए लोरमी वापस आये. लोरमी से ही बिलासपुर लौट जाना था लेकिन युवा साथियों ने आग्रह किया कि कारी डोंगरी गाँव में सामाजिक समस्या है वहां भी लोग प्रतीक्षा में हैं. भोजन व्यवस्था भी किये हैं. खुडिया जलाशय भी पास में ही है. वहाँ भी पर्यटन किया जा सकता है. युवा शक्ति उत्साहित थे, गाँव वालों का आग्रह भी था. भोजन और पर्यटन का बोनस अलग से… सो कारीडोंगरी जाना तय हुआ. लोरमी से अन्दर झझपुरी होते हुए डोंगरिया पहुंचे. डोंगरिया से Y दोराहा है दायीं तरफ से बघर्रा गाँव के लिए रास्ता है और बायीं तरफ का रोड कारीडॉगरी पहुंचता है. हम बघर्रा की और बढे. आगे जम्नाही गाँव पड़ा. गाँव इसलिय याद है कि यहाँ मरावी जी ने स्वयम के व्यय पर रानी दुर्गावती की मूर्ति स्थापित की है.
साथियों ने मन में बघर्रा गाँव दर्शन की उत्सुकता जगा दी. सो बघर्रा मार्ग पकडे और गाँव पहुचे. बघर्रा कन्तेली के गोंड राजा यशवंत सिंह मरकाम के द्वारा अपने बावा पुजारी को दान में दिये गए गाँव में से एक छोटा सा वनग्राम है. जो एक डोंगरी के परिधि में बसा हुआ है. करीबन एक हजार की आबादी है, जिसमें गोंड समाज की बहुलता है, कुछ घर साहू समाज के हैं जो बावा समाज से नामांतरित हैं. गाँव का नाम ही दर्शाता है कि वर्षों पहले यहाँ के डोंगरी में बाघ का आना जाना होता रहता था क्योंकि डोंगरी में बाघ का माड़ा था. प्रसंग में एक छत्तीसगढ़ी गीत बरबस ही याद आ गया… “ बघनी रेंगे ल धीर धीरे … रे डोंगरी के तीरे… बघनी रेंगे ला धीरे धीरे. यहाँ कुछ् ही महीने पहले ही बुढादेव के लिए चिन्हित ठाना में स्थापित सतरंगी झंडे का गैर आदिवासी समाज के लोगों ने अपमान किया था, और काफी बवाल हुआ था. अभी हालात सामान्य है.
यह गोंडवाना समग्र क्रांति आन्दोलन के प्रणेता दादा हीरासिंह मरकाम के युवा शिष्य नेता श्यामसिंह मरकाम का पैतृक गाँव है. उनके ही घर में स्वल्पाहार की व्यवस्था की गयी थी. घर में उनके बडे भाई और परिवार के लोग मिले. घरेलु और सामाजिक चर्च हुई.
चायपान के बाद गंतव्य कारीडोंगरी के लिय रवाना हुए.

