Tuesday, June 9, 2026
Latest:
ग्रामीण विशेषछत्तीसगढ़

ग्राम देव किरारी (अकलतरा) जिला जांजगीर में सौ से भी अधिक वर्षों से मनाया जा रहा है पारम्परिक जोत-जवांरा….

Spread the love

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज 

जोत जवारा पंडूम ग्राम देव किरारी में सौ से भी अधिक वर्षों से मनाया जा रहा है. यह साल में दो बार चैत और कुंवार मास में होता है. चूँकि आयोजन नौ दिन का होता है इसलिए इसे आम बोलचाल की भासः में “नेवरात” बोलते हैं. यहाँ के नेवरात की विशेषता है कि गोंड समाज की अगुवाई में सर्व समाज जिसमे बाम्हन, कुर्मी, तेली, केंवट, राउत, नाऊ, पईनका, घसिया, गांडा सब मानते और मनाते हैं. अभी कुंवार नेवरात में जवारा के साथ अखंड जोत जलाया गया. गाँवजल्ला (सामुहिक) आयोजन महमाई दाई ठाना में होता है. निजी बदना नेवारात अपने अपने घरों में किया जाता है. नौ दिन के आयोजन में बीज गिराने से लेकर ठंढा करने (विसर्जन) तक के गोंडी नेंग-जोग बईगा ही करता है. जो बइगा नेवरात के नेंग-जोग करता है उसे गाँव में पंडा बोलते हैं जो नौ दिन तक उपवास रखता है. सायंकाल में सिर्फ दूध और फलाहार करता है. वर्तमान में लादन गोंड किरारी गाँव का बैगा है. ग्राम बैगा ही सर्व समाज के वैवाहिक “देवतला” कार्य संपन्न कराता है. बैगा की श्रृखला में कई बिखर्रा (ख्यातनाम) गोंड और अन्य समाज के बैगा हुए हैं. जिन्हें मैं जनता हूँ उनमे लमहा बैगा, दलसाय बैगा, पराउ बैगा, सोनाऊ बैगा, टेंगना बैगा, बड़का बाबू, घासीराम बैगा, प्रमुख हैं. सोनाउ बैगा केंवट समाज से थे. बड़का बाबू एक मात्र बैगा थे जो बाम्हन समाज से थे और टोनही एक्सपर्ट थे. नेवरात और गउरा आयोजन में सभी गोंडी नेग और जीव सेवा संपन्न कराते थे. दलसाय बैगा इन पंक्तियों के लेखक के दादाजी थे. वे आळ राउंडर गुनिया थे जिन्हें दूर- दूर के गाँव से लोग लेने आते थे. वे हमेशा एक चमचमाता चमकता हुआ छोटा सा फरसा धारण करते थे. वे अपने पीछे नहीं चलने की चेतावनी यह कहते हुए देते थे कि कुछ हो जाएगा तो उसके जिम्मेदार पीछे चलने वाला ही होगा. इन बैगाओं को समर्पित बैगाचौंरा आज भी है और उनको आज भी पेन शक्ति के रूप में पूजा जाता है.

ग्राम देव किरारी अकलतरा – पामगढ़ रोड पर अकलतरा से दो कि.मी. की दुरी पर स्थित पैंतीस सौ – चार हजार की जनसँख्या वाला गोंड़ बहुल गाँव है जहाँ उपर वर्णित जाति के लोग निवास करते हैं. लगभग आधी आबादी गोंडो की है बाकी आधी में सर्व समाज के लोग हैं जिसमें दुसरे नंबर पर कुर्मी समाज और तीसरे नंबर पर साहू समाज के लोग हैं. गाँव का गौटिया एक ही ब्राम्हण परिवार है.

यहाँ का मह्माई दाई ठाना बहुत पुराना है और गाँव के मध्य में है. पहले महमाई दाई की कूटिया मिटटी और खपरैल की थी. सामने एक छोटा सा पोखर था. जो आसपास के रहवासियों के अतिक्रमण के कारण दिनों दिन और भी छोटा होते जा रहा था. इसलिए पंचायत ने मिटटी पाटकर सपाट कर दिया. आज वहां पर मह्माई दाई का मंदिर बन गया है. भैरव बाबा और अर्धनारीश्वर का मूर्ति स्थापित हो गया है. अलग से मनोकामना ज्योति कक्ष भी बन गया है. आठवाही के दिन विशेष दर्शन होता है. नवमी के संध्याकाल में जवारा विसर्जन होता है. इसी दिन ही जीव सेवा दिया जाता है. मुहल्लेवाले चंदा बरार करके अपने अपने मोहल्ले का अलग अलग जीव सेवा देते हैं.यह परम्परा दादा – परदादा के ज़माने से निरंतर चला आ रहा है, और आगे भी चलता रहेगा. यह हर्ष और गौरव की बात है कि गोंडवाना परंपरा को ब्राम्हण, पिछड़ा वर्ग और दलित समाज ने बिना किसी भेदभाव के अंगीकार कर लिया है.
चूँकि देव किरारी मेरा पैत्रिक गाँव है इसलिए अठवाही के दर्शन सपरिवार करने की कोशिश करते हैं. अब की बार भी सपरिवार दर्शन किये.