ग्रामीण विशेषछत्तीसगढ़

गांव व्यवस्था का सांस्कृतिक उत्सव: सुरोती एवं खिचड़ी पर्व (दिवाड़) में कोपाल (राऊत/यादव) की सामाजिक भूमिका

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज 

दिवाली के पावन अवसर पर गांव व्यवस्था (नार्र हुजाड़) का जो विशिष्ट पर्व मनाया जाता है, वह है सुरोती एवं खिचड़ी पर्व, जिसे अधिकतर क्षेत्रों में दिवाड़ के नाम से जाना जाता है। इस पर्व का नायक- कोपाल (राऊत या यादव) होता है। गांव व्यवस्था में राऊत के बिना यह पर्व अधूरा माना जाता है। कहावत भी है—
*“गोंड नहाये नवा दिन और राऊत नहाये दिवारी दिन।”*
अर्थात दिवाली के वास्तविक नायक राऊत ही हैं।

*राऊत: गांव व्यवस्था का सेवक और संरक्षक*

गांव के विकास और व्यवस्था में राऊत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। जब खेतों में धान बोआई का समय होता है, तब से लेकर फसल पकने तक वह पूरे गांव के गाय–बैलों की देखभाल करता है। वर्षा, धूप या ठंड — किसी भी परिस्थिति में वह नि:स्वार्थ भाव से सेवा करता है। अपने खेत, घर–परिवार की चिंता किए बिना वह पशुओं को चराने में तत्पर रहता है। इस सेवा और समर्पण के बदले गांव के लोग उसे आर्थिक सहयोग और सम्मान प्रदान करते हैं। इसलिए राऊत, गांव समाज का एक आदर्श सेवक और सम्मानित व्यक्ति माना जाता है।

*सुरोती पर्व की शुरुआत: राऊत का गौरवपूर्ण क्षण*

सुरोती की रात से ही दिवाली (दिवाड़) का आरंभ होता है। यह दिन राऊत के लिए सबसे खास और गर्व का होता है। गांव के हर घर में गायों को सुहई और बैलों को जेठा बांधा जाता है। इस दृश्य को देखने के लिए पूरा गांव उत्सुकता से प्रतीक्षा करता है।

पर्व की शुरुआत दोहा/लोकगीतों की गूंज से होती है –
*“अरे रे रे भाई रे…*
*उरन चेंकलें, पुरन चेंकलें, चेंकलें चिंगड़ाघाट रे…*
*आज जिमिदारिन अउ मावली याया के सुहई पहनाउकला चेंकलेंसे, जायदे कोन बाट रे…!!!”*
(कोपाल- दुलार सिंह यादव, नार्र -हिचाड़ के द्वारा)
इस तरह की दोहा/गीतें सुरोती की रात में गूंजते हैं, जो पूरे वातावरण को लोक-संगीत और उत्साह से भर देते हैं।

*गांव व्यवस्था की परंपरा और आयोजन की प्रक्रिया*

गांव की व्यवस्था को बनाए रखने के लिए बुमयार ने कोपाल (राऊत) को रहने के लिए विशिष्ट स्थान दिया रहता है। इसलिए सुहई और जेठा बांधने से पहले गांव के बुमयार, जिमिदारिन याया और मावली याया से अनुमति लेना आवश्यक होता है। गांव के पुजारी, प्रमुख सियान और राऊत मिलकर सेवा अर्जी बिनती करते हैं। इसके बाद गांव की परंपरा के अनुसार —जिमिदारिन याया के जुलना में कई फूल (खाप) का एक सुहई, मावली याया के मावली खुंटा में एक फूल (खाप) का सुहई, और बुमयार खुंटा को जेठा बांधा जाता है। इस परंपरा में कई गांव क्षेत्रों में आंशिक भिन्नता हो सकती है।

इसके बाद कोपाल (राऊत) अपने घर के पेन–पुरखों को सेवा अर्जी देकर इरूक पुंगार तर्पण करता है और उनके आशीर्वाद से पूरे गांव में सुहई–जेठा बांधने का शुभ कार्य प्रारंभ करता है।

*लोक नायक (राऊत) का सम्मान और घर–घर स्वागत*

जब कोपाल (राऊत) अपने दल के साथ मोहरी, गाजे–बाजे, नृत्य करते हुए गांव में निकलता है, इसे राऊत नाचा भी कहते हैं, उसका हर घर में स्वागत किया जाता है। प्रवेश करते ही घरवाले उसके पैर धोकर चावल का टिका लगाते हैं। घर एवं बैल कोठा में कुम्हार से दिया हुआ दीपक को जलाया जाता है, गाय और बैल को भी सम्मानपूर्वक सजाया जाता है। यह दृश्य अत्यंत भावनात्मक और उत्सवमय होता है— मानो पूरा गांव अपने लोकनायक का अभिनंदन कर रहा हो। सुहई–जेठा बांधने के बाद दोनों पक्ष अपने पेन–पुरखों को इरूक पुंगार तर्पण अर्पित करते हैं और राऊत को भेंट स्वरूप रोसई (सहयोग) दिया जाता है। यह आयोजन पूरी रात चलता है। अंत में राऊत पुनः अपने घर लौटकर पेन–पुरखों का आभार व्यक्त करता है और सफल आयोजन की खुशी में इरूक पुंगार तर्पण करता है।

गांव में यह भी कहा जाता है —
“राऊत ठेंगा के साथ-साथ शीत भी लाता है।” और सचमुच सुरोती के साथ सर्दी की हल्की ठंडक पूरे वातावरण में उतर आती है।

*खिचड़ी पर्व: कोंदाल (पशुओं) के सम्मान का दिन*

सालभर की कृषि अन्न उत्पादन में गाय–बैल का विशेष योगदान रहता है। उन्हें सम्मान देने का अवसर खिचड़ी पर्व है। इस दिन बैलों को सजाया जाता है और उन्हें नया फसल से बना विशेष खिचड़ी खिलाई जाती है। खिचड़ी में नए फसल से तैयार कुमड़ा, उड़द, जुड़ंगा, शकर/डांग कांदा, ईमली, कोचई, सुक्सी आदि सामग्री का उपयोग किया जाता है। इसे कुम्हार से दिया नए हांडी में पकाया जाता है और पारदी (नाहर) के यहां का नए सुपा में खिचड़ी को निकालकर सबसे पहले पेन–पुरखों की सेवा अर्जी किया जाता है। इसके बाद गाय–बैलों को फूल-माला और सुहई–जेठा पहनाकर चावल का टिका लगाया जाता है और उन्हें खिचड़ी खिलाई जाती है। इसके पश्चात परिवारजन वही खिचड़ी प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। यह दिन राऊत, पशुओं और सुहई–जेठा — तीनों के सम्मान का प्रतीक है।

खिचड़ी पर्व के दिन बैल कोठा और घरों में धान बाली, सिलयारी, पर्बत से बनाया हुआ सेला–सिलयारी को बांधा जाता है। पूरा गांव हर्ष और उल्लास से झूम उठता है।

*प्रकृति–आधारित और प्रदूषणमुक्त उत्सव*

सुरोती और खिचड़ी पर्व पूरी तरह प्रकृति आधारित, सादगीपूर्ण और प्रदूषणमुक्त उत्सव हैं। लेकिन आधुनिकता की आंधी ने इस लोक–पर्व को भी आडंबर, शोरगुल और दिखावे से भर दिया है, जो इसकी मूल आत्मा के लिए खतरा है। यदि हमें प्रकृति, संस्कृति और पर्यावरण — तीनों को बचाना है, तो इन पारंपरिक लोक–पर्वों की सादगी और भावनात्मक जुड़ाव को पुनः अपनाना होगा।

इन्हीं शुभकामनाओं के साथ —
आप सभी को सुरोती और दिवाड़ (सिकड़ी तिन्दना पंडुम) की हार्दिक बधाई…
जय जोहार… सेवा जोहार… नमस्कार…!!!