राष्ट्रीय

आदिवासी महिलाओं की भूमिका और नेतृत्व

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज  भारत विविध सांस्कृतिक परंपराओं और जीवन-पद्धतियों वाला
समृद्ध देश है, और इसमें अनुसूचित जनजातियों की आबादी
10.45 करोड़ से अधिक है, जो देश की कुल जनसंख्या का
लगभग 8.6% है।यह केवल जनसंख्या का आँकड़ा नहीं, बल्कि
भारत की जीवंत, प्राचीन और बहुविध सांस्कृतिक धरोहर का
अद्वितीय स्वरूप है। यह समुदाय न केवल प्राकृतिक संसाधनों
के संरक्षण का संवाहक रहा है, बल्कि अपनी समृद्ध
परंपराओं, भाषा-भाषाई विविधता और मौलिक ज्ञान प्रणालियों
के माध्यम से भारत की सांस्कृतिक पहचान को निर्मित करता
रहा है। रामायण और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इनके
पराक्रम, बुद्धिमत्ता और प्रकृति से गहरे संबंध का उल्लेख
मिलता है।

फिर भी, लंबे समय तक आदिवासी समाज को मुख्यधारा के
विकास से दूर रखा गया। उन्हें एक जीवित संस्कृति के
संरक्षक के रूप में तो देखा गया, पर समान भागीदार के रूप
में नहीं। विशेषकर आदिवासी महिलाओं के नेतृत्व, कौशल,
सामाजिक समझ और समुदाय निर्माण में उनकी भूमिका को
लंबे समय तक वह मान्यता नहीं मिली, जिसकी वे वास्तविक
हकदार थीं।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में इस सोच और
व्यवस्था में स्पष्टत था उद्देश्य पूर्ण परिवर्तन देखने को
मिला है। सरकार ने टोकनिज़्म (प्रतीकात्मक पहल) से आगे
बढ़कर टार्गेटेड एम्पावरमेंट (लक्ष्य आधारित सशक्तिकरण) की
नीति अपनाई है। जनजातीय समुदायों के सर्वांगीण विकास के
प्रति यह प्रतिबद्धता इस बात का प्रमाण है कि भारत की
विकास यात्रा में अब कोई भी समुदाय पीछे न रह जाए।“
सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका
प्रयास” का मंत्र इसी समावेशी दृष्टि का सशक्त उदाहरण बन
चुका है।
इसी प्रतिबद्धता का प्रभाव बजट आवंटन में स्पष्ट रूप से
देखा जा सकता है। जनजातीय समुदायों के विकास हेतु कुल
बजट 2024-25 में ₹10,237.33 करोड़ से बढ़कर 2025-26

में ₹14,925.81 करोड़ हो गया है, जो 45.79% की
उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है। यदि दीर्घकालीन दृष्टि से देखें,
तो 2014-15 में ₹4,497.96 करोड़ के बजट के मुकाबले यह
राशि पहले 2021-22 में ₹7,411 करोड़ तक पहुँची और अब
यह वृद्धि 231.83% तक पहुँच गई है। केंद्रीय बजट
2025–26 में जनजातीय कार्य मंत्रालय के लिए बढ़े हुए
आवंटन से स्पष्ट है कि अब आदिवासी समुदाय, खासकर
महिलाएँ, विकास की यात्रा में केवल लाभार्थी नहीं बल्कि
नेतृत्वकारी भूमिका में हैं।
भारत की आदिवासी महिलाएँ सामाजिक, सांस्कृतिक और
आर्थिक जीवन की धुरी रही हैं। वे जल, जंगल और जमीन से
जुड़ी पारंपरिक जीवन व्यवस्थाओं की संरक्षक हैं और
सामुदायिक निर्णय, संसाधन प्रबंधन और सांस्कृतिक परंपराओं
के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आज यह
भूमिका केवल पारिवारिक और सामुदायिक स्तर तक सीमित
नहीं रह गई है, बल्कि शासन व्यवस्था से लेकर नीति
निर्माण तक दिखाई दे रही है। इस परिवर्तन का सबसे
प्रभावशाली प्रतीक यह है कि भारत के सर्वोच्च संवैधानिक पद
पर एक आदिवासी महिला, राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू
आसीन हैं।

सरकार ने आदिवासी महिलाओं के सामाजिक-सांस्कृतिक
सशक्तिकरण, आर्थिक उत्थान एवं उनके नेतृत्व को संस्थागत
आधार प्रदान करने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया
है, जिससे विकास केवल सुविधाओं का विस्तार न होकर,
सम्मान, पहचान और आत्मनिर्भरता को भी सुनिश्चित
करे।इनमें आदिवासी महिला सशक्तिकरण योजना के अंतर्गत
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति वित्त एवं विकास निगम द्वारा
आदिवासी महिलाओं को स्वरोजगार एवं उद्यमिता के लिए
₹2 लाख तक का ऋण मात्र 4% ब्याज दर पर प्रदान किया
जा रहा है, जिससे वे हस्तशिल्प, कृषि-आधारित कार्य, बांस
उत्पाद, पशुपालन, प्रसंस्करण एवं सेवा क्षेत्र में उद्यमशीलता
विकसित कर रही हैं।
विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों (PVTGs) के लिए
शुरू किया गया प्रधानमंत्री जनजाति आदिवासी न्याय
महाअभियान (PM-JANMAN) इन समुदायों तक बुनियादी
सुविधाएँ पहुँचा रहा है।यह अभियान 18 राज्यों और 1 केंद्र
शासित प्रदेश के 75 PVTG समुदायों के उन इलाकों में
विकास सुनिश्चित कर रहा है, जो लंबे समय से मुख्यधारा से
दूर रहे हैं। लगभग ₹24,104 करोड़ के निवेश के साथ PM-
JANMAN आवास, स्वच्छ जल, स्वास्थ्य सेवा, पोषण, शिक्षा,

सड़क संपर्क और सतत आजीविका जैसे क्षेत्रों में समग्र सुधार
ला रहा है।
इसके अतिरिक्त, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय
(EMRS) आदिवासी बच्चों को निःशुल्क एवं गुणवत्तापूर्ण
शिक्षा प्रदान कर रहे हैं, जिससे उनके कौशल विकास के नए
अवसर सृजित हो रहे हैं। साथ ही, छात्रवृत्ति योजनाओं ने
विशेषरूप से बालिकाओं में स्कूल छोड़ने की प्रवृत्ति को कम
करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
DAY-NRLM ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से
आदिवासी महिलाओं की वित्तीय निर्णय लेने की क्षमता,
सामूहिक उत्पादन, विपणन और आर्थिक आत्मनिर्भरता को
सुदृढ़ किया है।वहीं सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण अभियान ने
गर्भवती महिलाओं एवं स्तनपान कराने वाली माताओं के
पोषण स्तर और मातृ-स्वास्थ्य संकेतकों को सुधारने का कार्य
किया हैं।
पेसा (PESA) पंचायत (अनुसूचितक्षेत्रोंतकविस्तार) अधिनियम,
1996 के माध्यम से पाँचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में रहनेवाले
आदिवासी समुदायों को ग्राम सभाओं के माध्यम से स्वशासन
की शक्ति दी गई है। इस कानून ने पंचायत और ग्राम सभा
में महिला भागीदारी को संरचनात्मक स्तर पर सुनिश्चित

किया है, जिसके लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा
महिलाओं के लिए विशेष नेतृत्व प्रशिक्षण मॉड्यूल विकसित
किए गए हैं।
आदि कर्मयोगी अभियान जनजातीय क्षेत्रों में एक ऐतिहासिक
पहल के रूप में उभरा है। इस अभियान के तहत 20 लाख से
अधिक परिवर्तनकारी प्रतिनिधियों (Change Agents), जिनमें
महिला स्वयं-सहायता समूहों की सदस्याएँ, युवा और स्थानीय
अधिकारी शामिल हैं, को शासन, सेवा वितरण और
सामुदायिक सशक्तिकरण में स्थानीय नेतृत्व के रूप में
प्रशिक्षित किया गया है। अभियान का लक्ष्य “1 लाख
जनजातीय गाँव– विज़न 2030” के माध्यम से सहभागी
शासन प्रणाली को मजबूत करना है, जिसमें महिलाओं की
केंद्रीय भूमिका सुनिश्चित की गई है। देश की राष्ट्रपति श्रीमती
द्रौपदी मुर्मु ने भी इस अभियान की सराहना की है और कहा
है कि जमीनी स्तर पर आदिवासी नेतृत्व ही
‘विकसितभारत@2047’ की आधारशिला है। आज अनेक
जनजातीय बहुल गाँवों में महिलाएँ ग्राम संस्थाओं की अध्यक्ष
के रूप में नेतृत्व कर रही हैं, स्वयं-सहायता समूहों का
संचालन कर रही हैं, शासन प्रयोगशालाओं में परिवर्तनकारी
नेतृत्व निभा रही हैं और अपने समुदाय को आजीविका एवं
विकास योजनाओं से जोड़ रही हैं।

साथ ही, वर्ष 2024 में शुरू ‘धरती आबा जनजातीय ग्राम
उत्कर्ष अभियान’ के तहत 63,000 से अधिक जन जातीय
बहुल गाँवों में समग्र विकास के लिए ₹79,000 करोड़ से
अधिक की राशि स्वीकृत की गई है, जिसका एक मुख्य
आधार ग्राम समितियों में महिलाओं की प्रत्यक्ष नेतृत्व भूमिका
को मजबूत करना है।
भारत की विकास यात्रा में आदिवासी महिलाओं की बढ़ती
भागीदारी यह दर्शाती है कि वे अब केवल सहभागी नहीं,
बल्कि परिवर्तन की अग्रणी शक्ति बन रही हैं। अब हमारा
ध्यान इस बात पर है कि जमीनी स्तर पर उनके नेतृत्व को
कैसे और मज़बूत बनाया जाए।इसी उद्देश्य से स्थानीय
समुदायों में महिला नेतृत्व प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार
किया जा रहा है, ताकि अधिकाधिक महिलाएँ प्रशासनिक,
आर्थिक और सामाजिक निर्णयों में सक्रिय भूमिका निभा सकें।
वन आधारित आजीविका और हस्त-उद्यमों को राष्ट्रीय एवं
अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों से जोड़ना हमारी प्रमुख प्राथमिकताओं में
है, जिससे उनके कार्य का मूल्य और सम्मान दोनों बढ़ें। स्वयं
सहायता समूहों और आजीविका समूहों के माध्यम से महिलाएँ
समाज में सकारात्मक परिवर्तन की सशक्त वाहक बन रही
हैं।इस दिशा में डिजिटल साक्षरता और वित्तीय प्रबंधन

प्रशिक्षण को और व्यापक रूप से लागू किया जा रहा है, ताकि
प्रत्येक महिला आत्मनिर्भर बन सके।
साथ ही, आदिवासी बालिकाओं की उच्च शिक्षा और कौशल
विकास तक पहुँच को निरंतर सुदृढ़ किया जा रहा है, ताकि वे
आत्मविश्वास के साथ भविष्य के नेतृत्व पदों तक आगे बढ़
सकें।हमारा उद्देश्य स्पष्ट है-आदिवासी महिलाओं का
सशक्तिकरण केवल सामाजिक संवेदना का विषय नहीं, बल्कि
भारत के लोकतांत्रिक विस्तार, सतत विकास और समावेशी
प्रगति की सबसे मज़बूत नींव है।
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*(महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री, भारत सरकार)*