ग्रामीण विशेष

संभु ईशर-गवरा : एक शोध यात्रा का नया अध्याय

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज 

“बन ले बन हरदी लानेव, पथरा म कुचरेंव।
टोरी तेल के संग म ओला, ईशर देव ल चुपरेंव।।”

उक्त चित्र सरई के जंगल के मार्ग किनारे उगी प्राकृतिक हल्दी का है। इसके औषधीय गुण अत्यंत समृद्ध हैं। इसके फल, पत्तियाँ तथा जड़ (कंद) का विभिन्न प्रकार से उपयोग किया जाता है। इसके संबंध में विस्तृत जानकारी अनेक विश्वसनीय स्रोतों में उपलब्ध है।

आज इस विषय पर लिखने का विशेष कारण मेरी पुस्तक “संभु ईशर-गवरा : शौर्य-सृजन की लोकगाथा” है। आज यह पुस्तक मेरे हाथों में पहुँची है। वर्तमान व्यस्तता के कारण मैं पूर्व की भाँति स्वयं लोगों तक पुस्तक पहुँचाने में असमर्थ हूँ।

आप सभी को जानकारी के लिए बताना चाहता हूँ कि इस पुस्तक में अत्यंत गहराई से शोध प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ मेरा भविष्य भी जुड़ा हुआ है और इसका अपना एक विशेष अर्थ है। इस पुस्तक में एक ऐसे युवागृह का उल्लेख किया गया है, जो आज तक किसी साहित्य में दृष्टिगोचर नहीं हुआ और न ही उसे संरक्षित एवं आगे बढ़ाने के लिए मूलबीजों द्वारा कोई गंभीर प्रयास किया गया। जबकि उसके अनुयायी आज भी अनेक हैं और लगभग सभी बिरादरियों में उसकी मान्यता विद्यमान है। ऐसे एक महत्वपूर्ण रहस्य से पर्दा उठाने का दायित्व मुझे मिला। ऐसा प्रतीत होता है कि पेन-पुरखों का आशीर्वाद और कृपा-दृष्टि मुझ पर विशेष रूप से बनी हुई है।

पुस्तक का प्रत्येक अध्याय हमें इतिहास की गहराइयों तक ले जाता है और अनेक जटिल वास्तविकताओं के दर्पण से रूबरू कराता है। संपादकीय लेख लिखने वाले भैय्या को मैंने यह पुस्तक सबसे पहले पढ़ने के लिए दी। उन्होंने थोड़ा-सा पढ़ते ही अत्यंत उत्साहजनक समीक्षा दी है। उनका कहना है कि इस पुस्तक का विधिवत विमोचन होना चाहिए, इसलिए सभी से थोड़ा धैर्य रखने का आग्रह है।

मुझे केवल आशा ही नहीं, बल्कि पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक आपको अवश्य पसंद आएगी। हमारी पूर्व प्रकाशित पुस्तक “कोया बूम” पर समीक्षकों ने अनेक समालोचनात्मक अध्ययन एवं समीक्षाएँ भेजीं। उन सुझावों के आधार पर मैंने लगभग 80 प्रतिशत सुधार किए हैं। शेष 20 प्रतिशत इसलिए छोड़ता हूँ कि डिज़ाइन, स्पेस, फ़ॉन्ट अथवा अन्य तकनीकी कमियाँ समय के साथ और अधिक परिष्कृत की जा सकें। उन पर भी आगे निरंतर मेहनत की जाएगी।

हमारी टीम से आग्रह है कि एक बार हम सभी गवरागढ़ चलें और वहाँ के पेन-पुरखों के नाम एक प्रति समर्पित कर आएँ। इस पुस्तक के सफल प्रकाशन में उन पेन-पुरखों का भी आशीर्वाद है, जिनके दर्शन के लिए हम वहाँ गए थे।

चिमन मरकाम जी से भी निवेदन है कि आप पुनः तैयार रहें, हम शीघ्र ही आने वाले हैं। डाकेश्वर मरई जी, आपका हार्दिक धन्यवाद कि आपने हमारे गवरागढ़ प्रवास को सफल बनाया।

संभु ईशर-गवरा को जोहार।
आदिम संस्कृति को जोहार।
कृषि व्यवस्था को जोहार।
महान पेन-पुरखों को जोहार।

> ✍🏻 धर्मपाल कोड़ापे