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शराब दुकानें खुली, रेल चली, जहाज भी उड़ेगा, कब खुलेगी आंगनवाड़ी ? जानिए

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पिछले एक दशक में आंगनवाड़ी सेवा देश में कुपोषण दूर करने में मील का पत्थर साबित हुई हैं.यह देश में पोषण संकट से जूझ रहे सबसे वंचित तबकों के करोड़ों बच्चों के लिए पोषण का एकमात्र जरिया हैं.केवल पोषण ही नहीं, इनके माध्यम से एक मजबूत सूचना तंत्र विकसित हुआ है.

शराब दुकान खुल गई, धीरे-धीरे रेलगाड़ियां को पटरी पर लाने की कवायद भी शुरू हो गई है, 25 तारीख से आसमान में हवाई जहाज की आवाज शुरू हो जाएगी, पर आंगनवाड़ी कब खुलेगी ? पर क्या आंगनवाड़ी खोलना सचमुच इतना महत्वपूर्ण है, महीने-दो महीने और नहीं खुलें तो भला क्या बिगड़ जाएगा? आंगनवाड़ी से तो बच्चे खतरे में पड़ जाएंगे, वहां पर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना मुश्किल होगा! सुरक्षा के लिहाज से इस ‘ऐहतियात’ पर कोई आपत्ति भी नहीं है, लेकिन देश में आंगनवाड़ियों के समुचित महत्व को जाने बगैर इस बारे में सवाल करना शायद न्यायोचित्त नहीं होगा!

मसला यह है कि हिंदुस्तान की एकीकृत बाल विकास योजना दुनिया के नक्शे में सबसे बड़ी योजना कई वजहों से है.इस अकेली योजना में एकीकृत शून्य से छह साल तक के 158 मिलियन बच्चे बच्चे पात्र हैं. इतनी बड़ी योजना लाने की वजह है देश में बच्चों में कुपोषण.माना गया कि खादय असुरक्षा से जुझते समाज में कुपोषण को थामने के लिए केवल बेहतर पोषण ही हथियार हो सकता है.इसलिए देश की आठ हजार से ज्यादा परियोजनाओं में तकरीबन 13 लाख 80 हजार आंगनवाड़ियों के माध्यम से देश में बच्चों को गरम पका हुआ भोजन दिया जाता है.

यह भोजन भी यूं ही नहीं दे दिया गया.इसके पीछे लंबा संघर्ष है.इसके पीछे सुप्रीम कोर्ट के तमाम निर्देश और आदेश हैं.इसलिए इस योजना को खड़ा करने का स्वयंसेवी संगठनों, बाल अधिकारों, मीडिया, न्यायपालिका की भी भूमिका है, और यह भी उतना बड़ा सच है कि इस योजना को चलाने का माददा केवल सरकार जैसी बड़ी संस्थाओं के अंदर ही है.

देश में शिशु मृत्यु और बाल मृत्यु की उच्च दर भी इस योजना को बेहतर तरीके से लगातार सालों—साल लागू किए जाने की मांग करती है.संयुक्त राष्ट्र से जुड़ी एक संस्था ने कुछ समय पहले एक रिपोर्ट जारी कर बताया था कि भारत भारत में औसतन हर दो मिनट में तीन नवजात बच्चों की मौत हो जाती है.सरकार के ही डेटा का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि वर्ष 2008 से 2015 में भारत में 91 लाख बच्चे अपना पहला जन्म दिन नहीं मना पाए.

56 प्रतिशत बच्चों की नवजात अवस्था में ही मृत्यु हो गई

इस अवधि में शिशु मृत्यु दर 53 से घट कर 37 पर आई है, पर फिर भी वर्ष 2015 के एक साल में ही 9.57 लाख बच्चों की मृत्यु हुई थी.इन्हीं आठ सालों में भारत में 1.113 करोड़ बच्चे अपना पांचवा जन्म दिन नहीं मना पाए और उनकी मृत्यु हो गई.इनमें से 62.40 लाख बच्चे जन्म के पहले महीने (28 दिन के भीतर) नहीं रहे.यानी 56 प्रतिशत बच्चों की नवजात अवस्था में ही मृत्यु हो गई.यह आबादी जीवित रही होती तो हांगकांग, सिंगापुर सरीखे छोटे—मोटे देश बस गए होते.

इसके पीछे के कारणों में पानी, स्वच्छता, उचित पोषाहार या बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव बताया गया था.इनके पीछे कुपोषण को साबित करना एक बड़ी तकनीकी चुनौती है, क्योंकि कुपोषण सीधे मृत्यू का कारण नहीं बनता.उसके पीछे संक्रमण सहित कई और कारण होते हैं, जो एक कमजोर अवस्था में ज्यादा असर डालते हैं.

पिछले कई सालों के जमीनी अनुभवों के आधार पर हमने पाया है कि पिछले एक दशक में आंगनवाड़ी सेवा देश में कुपोषण दूर करने में मील का पत्थर साबित हुई हैं.यह देश में पोषण संकट से जूझ रहे सबसे वंचित तबकों के करोड़ों बच्चों के लिए पोषण का एकमात्र जरिया हैं.केवल पोषण ही नहीं, इनके माध्यम से एक मजबूत सूचना तंत्र विकसित हुआ है.

इनके माध्यम से गर्भवती माताओं और बच्चों के टीकाकरण का प्रतिशत भी संतोषजनक रूप से सुधरा है. टीकाकरण ही वह माध्यम है जिसके माध्यम से हम बाल मृत्यु दर को 65 प्रतिशत तक कम कर सकते हैं.इसके महत्व को हम ऐसे भी सोच सकते हैं कि कोरोना वायरस का टीका नहीं बन पाने के कारण समूची मानव सभ्यता कितने बड़े संकट में है.दुनिया में कई बीमारियां तबाही मचा सकती थीं अगर उनका टीका नहीं बनाया या होता.

आंगनवाड़ी में पोषण आहार के विकल्प के रूप में लॉकडाउन के बाद बच्चों के परिवारों को रेडी टू ईट पोषण आहार देने के विकल्प को चुना गया था.इसमें एक संकट उपलब्धता का था.क्या इतनी बड़ी मात्रा में लॉकडाउन के बाद रेडी टू ईट फूड पैकेट उपलब्ध हो पाए होंगे.लॉकडाउन में उसकी तैयारी आखिर की कैसे गई होगी ?

यही वजह रही कि जितना स्टॉक था, वह तो बंटा, लेकिन यह सब बच्चों तक पहुंचा होगा इसका ठीक—ठाक अध्ययन अभी आया नहीं है, लेकिन इसमें कमी रही है.दूसरा संकट जो पहले से बरकरार था कि जो मिला भी है क्या एक परिवार के अंदर वह बच्चों तक ही पहुंचा होगा या उसको पूरे परिवार ने निपटाया होगा.रेडी टू ईट फूड में पहले से भी बहुत सारी दिक्कतें मौजूद थी हीं, इसकी वजह से ही सर्वोच्च न्यायालय ने गरम पका हुआ खाना के निर्देश दिए थे.

अल्पवजन को दो प्रतिशत प्रतिवर्षकम करने का लक्ष्य रखा गया

भले ही यह आंगनवाड़ी की छह सेवाओं को पूरी तरह से लागू नहीं करे, लेकिन क्या ऐसा कोई तरीका हो सकता है जिससे वंचित समुदायों के बच्चों की भूख मिटाने और उन्हें संपूर्ण आहार दिलवाने का जतन किया जा सके.चूंकि आंगनवाड़ी में दर्ज बच्चों की संख्या निश्चित है, इसलिए वहां सामाजिक दूरी को बेहतर तरीके से व्यवस्थित किया जा सकता है.उन समुदायों में जहां कि कोरोना मरीज नहीं है, अथवा कोई भी व्यक्ति बाहर से नहीं आए हैं, उन्हें भी चिन्हित करके खोला जा सकता है. आंगनवाड़ियों के न खोलने से मोदी सरकार द्वारा 2017 से चलाए जा रहे पोषण अभियान को भी झटका लगेगा, जिसमें मुख्यत बच्चों में ठिगनेपन, अल्पवजन को दो प्रतिशत प्रतिवर्ष कम करने का लक्ष्य रखा गया है.

चिंता इसी बात की है कि कहीं एक संकट से लड़ते—लड़ते हम दूसरे संकट को और गंभीर नहीं बना लें, इसलिए यह जरूरी लगता है. अब जबकि हम लगातार कोरोना के बढ़ते केस के बावजूद शराब दुकानें, रेलगाड़ियां, बाजार और हवाई जहाज तक चलाने की हिम्मत दिखा रहे हैं तो हमें संकट के समय बच्चों के भरपूर पोषण पर भी हिम्मत दिखानी चाहिए

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