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परलकोट विद्रोह, जिसमे एक आदिवासी को छत्तीसगढ़ के प्रथम शहीद का गौरव प्राप्त हुआ।

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज

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अंग्रेज  मुक्त बस्तर – परलकोट विद्रोह 1825

1774 के हलबा विद्रोह को मिलकर समाप्त करने के बाद मराठी दीवानों और अंग्रेजों ने बस्तर के भूमि पर अपने अधिकार के झंडे पूर्णतः गाड़ दिए। और इस विजय का जश्न, वो वहाँ के भोले भाले आदिवासियों पर ज़ुल्म, अत्याचार कर के मनाने लगे।

जंगल के लकड़ियों की असीमित कटाई, यहाँ के लोगो से काम लेकर उन्ही पर अत्यधिक अनावश्यक कर वसूल किया जाने लगा।

इन जनजातियों के इनके घर, जंगल में हस्तक्षेप बिलकुल पसंद नही था, परंतु 1779 में डोंगर के राजा अजमेर सिंह की षड्यंत्र से की गई हत्या को देख कर हलबा का संगठन पूरी तरीके से टूट चुका था, जिससे काफी सालो तक डोंगर या आस पास के क्षत्रों में बगावत का बिगुल किसे ने फुकना उचित नही समझा।

1820 के समय मे आवागमन में आसानी को देखते हुए, नए नियुक्त किये गए कप्तान पेबे ने परलकोट को अपना गढ़ चुना, उस समय वह के राजा महिपाल देव थे, जो अजमेर सिंह के वंश के थे परंतु  अंग्रेजो के समर्थक थे।

पारलकोट में मुख्यतः अभुजमाड़ी जनजाति थी, उनपर हो रहे अत्याचार उन्हें बर्दाश्त नहीं थे, अंततः 1824 में गेंद सिंह ने सारे अभुजमाड़ीयों का नेतृत्व करते हुए अंग्रेज मुक्त बस्तर का आह्वाहन किया, जिसे पारलकोट के विद्रोह के नाम से जाना गया, जिसका मूल उद्देश्य बस्तर को बाहरी लोगों से मुक्त करना था।

परलकोट ज़मीदारी से अंदर 165 गांव थे, व परलकोट ज़मीदारी का मुख्यालय था। कोतरी नदी के तट पर बसा परलकोट, महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के पास का एक वनवासी गांव है, यहां तीन नदियों का संगम है।

परलकोट की ज़मीदारी बस्तर के अबूझमाड़ क्षेत्र में आती है। अबूझमाड़ दो शब्दों से मिल कर बना है, अबूझ मतलब जिसे समझा न जा सके, और माड़ का गोंडी में अर्थ है पर्वत। पर्वतों और घने जंगलों के सहारे ही एक साल तक अंग्रेज़ो को छकाया गया, जिसे अंग्रेज़ समझ नही पाए। अंग्रेज़ी बंदूकों के सामने आदिवासियों का जंगल एक मजबूत हथियार बना। हज़ारो की संख्या में वनवासी धनुष बाण और भालों से अंग्रेजी अधिकारियों और मराठा कर्मचारियों पर घात लगा कर आक्रमण करने लगे। पुरुषों के साथ महिलाओं की भी इस विद्रोह में भागीदार थी, शत्रु जहां दिखता उसको वहीं मौत के घाट उतार दिया जाता।

घोटुल में इनकी सभा होती जहां विद्रोह की रणनीतिया बनाई जाती थी। अबुझमाड़िया पांच-पांच सौ की संख्या में गुट बना कर निकलते थे। कुछ का नेतृत्व महिलाएं करती कुछ का पुरूष। और गेंद सिंह योजनाबद्ध तरीके से उनका नेतृत्व करते रहे।

विद्रोह इतना बड़ा हो चुका था कि छत्तीसगढ़ के ब्रिटिश अधीक्षक एग्न्यू को सीधा हस्तक्षेप करना पड़ा। सारे अत्याचारों, हथियारों के कमी के बावजूद अभुजमाड़ी गेंद सिंह ने सिर झुकना उचित नही समझा,  एग्न्यू ने चंद्रपुर से बड़ी सेना बुलवाई और 10 जनवरी 1825 को परलकोट को चारों ओर से घेर लिया।

गेंद सिंह गिरफ्तार हो गए और उनकी गिरफ्तारी से आंदोलन थम गया। गिरफ्तारी के 10 दिन बाद ही 20 जनवरी 1825 को परलकोट के महल के सामने ही गैंद सिंह को फाँसी दे दी गई, बस्तर को शुद्ध किये जाने का सपना लिये वह फाँसी पर चढ़ गए। और छत्तीसगढ़ के इतिहास में गैंद सिंह प्रथम शहीद के रूप में अमर हो गए।

दक्षिण कोसल की माटी, अपने पहले शहीद पुत्र के लहू से जगमगा उठी और इस प्रकाश ने आगे और विद्रोहों के सूखे पत्तों के ढेर में आग लगा दी।

आज इस गौरव गाथा को सामने रख मैं गर्व से कहता हूँ, “हाँ मैं आदिवासी हुँ।”