कोयतुर समुदाय में “पंडुम का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युजआदिवासियों की मौत का जश्न ख़ूब मनाया छत्तीसगढ़ की सरकार ने
विश्व आदिवासी दिवस के कुछ दिन पहले छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले में पुलिस ने 15 आदिवासियों को मार दिया
11, Aug 2018 |
छत्तीसगढ़ के बस्तर ज़िले में रहने वाले पत्रकार तामेश्वर सिन्हा ने 9 अगस्त (विश्व आदिवासी दिवस) की अपनी ख़बर में कुछ आंकड़ों का ज़िक्र किया है. ये आंकड़े उन घटनाओं के हैं जो बतातें हैं कि छत्तीसगढ़ के आदिवासियों को छत्तीसगढ़ की ही सरकार किस तरह लूटने और मारने पर आमादा हो गई है.
· जून 2016, बीजापुर के पालनार में पुलिस ने खेत में हल चला रहे किसान को रास्ता दिखाने के बहाने बुलाकर गोली मार दी, कहा कि नक्सली मुठभेड़ में मारा गया है.
· जून 2016, सुकमा ज़िले का गोमपाड़ गांव, आदिवासी युवती मड़कम हिडमे को सुरक्षाबलों ने उसके घर से जबरन उठा लिया, उसे जंगल ले कर गए और सामूहिक बलात्कार करने के बाद हत्या कर दी. कागज़ों में लिख दिया कि वी नक्सली थी और मुठभेड़ में मारी गई.
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· जनवरी 2016 में सुकमा ज़िले के कुन्ना पेद्दापारा में नाबालिग आदिवासी युवती के साथ बलात्कार की घटना हुई.
· 2016 में ही नारायणपुर ज़िले के कुतल गांव में 11 वीं पढ़ने वाले बच्चे की फर्जी मुठभेड़ में हत्या कर दी गई.
· इसी साल कांकेर जिले के अंतर्गत आने वाले मुरगाँव में पुलिस द्वारा सरपंच की हत्या कर दी गई.
· जुलाई 2016 में बस्तर ज़िले के बुरगुम में आदिवासी सुखराम को घर से उठाकर जंगल की ओर ले जाकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया.
· सितम्बर 2016 में बस्तर ज़िले के बुरगुम क्षेत्र के ही ग्राम सांगवेल में नाबालिग आदिवासी सोनकू जो आठवीं में पढ़ता था, फर्जी मुठभेड़ कर हत्या कर दी गई. वहीं एक अन्य मामले में बिजलू जो गाय चराता था उसके साथ भी यही वाकया दोहराया गया.
· जनवरी 2015 में दंतेवाड़ा ज़िले के देवाली ताड़पारा में नुपो बीमा नाम के आदिवासी की फर्जी मुठभेड़ में गोली मार कर हत्या कर दी गई.
· अक्तूबर 2015 में ही दंतेवाड़ा ज़िले के हंदा ग्राम का भीमा मंडावी अपनी बहन के साथ पास के गांव में जा रहा था उसे उठाकर फर्जी मुठभेड़ में मार दिया गया.
· अक्तूबर 2016 में कोंडागांव ज़िले के किलाभ गांव में आदिवासी रतिराम कोर्राम को बाज़ार जाने के रास्ते में गोली मार दी गई, नाम दिया गया नक्सली मुठभेड़ का
· जून 2016 में सुकमा ज़िले के अंतर्गत ग्राम विरापुरम में आदिवासी सोढ़ी गंगा को घर से जबरन उठाने के बाद जंगल की ओर ले जाकर हत्या कर दी गई.
· सितम्बर 2015 में कांकेर ज़िले के मरकानार में पुलिस द्वारा आदिवासियों की बेहरमी से पिटाई की गयी जिसमें कई आदिवासी बुरी तरह से घायल हो गए.
· सितम्बर 2015 में ही कांकेर के बदनगिन गांव में आदिवासियों को बर्बरता से पीटा गया.
· अक्टूबर 2016 में सुकमा ज़िले के आमिरगड़ में नकाबपोश नक्सलियों द्वारा जनपद सदस्य गंगाराम कोडोपी की कथित हत्या को अंजाम दिया गया, नक्सली नकाबपोश थे इसीलिए इस हत्या के पीछे अन्य लोगों की मौजूदगी की शंका ज़ाहिर की गई.
सरकार की नज़र में आदिवासी
छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में स्थिति जितनी ख़तरनाक है, ये थोड़े से आंकड़े शायद उसकी बानगी पेश नहीं कर पाएंगे क्योंकि ये मात्र थोड़े से आंकड़े हैं. मार दिए गए, लूट लिए गए, जेल में बंद कर दिए गए, बलात्कार कर दिए गए या अपनी ज़मीन से बेदख़ल कर दिए गए आदिवासियों के नाम पते मात्र भी गर लिखने शुरू किये जाएं तो कई किताबें बन जाएंगी. कभी किसी आदिवासी के मुह से उसकी बिटिया के सामूहिक बलात्कार की कहानी सुनियेगा, तो आपकी रूह कांप उठेगी, शायद कुछ रातों तक आप सो न पाएं. पुलिस मुठभेड़ में नक्सली कह कर मार दिए गए किसी आदिवासी का क्षत-विक्षिप्त शरीर गर आपकी आँखों के सामने से गुज़र जाएगा कभी तो किताबों से इंसानियत शब्द को गोदकर मिटा देने की इच्छा भी पनप सकती है.
इस सम्बन्ध में हमने अनुसूचित जाति, जनजाति विकास मंत्री केदार कश्यप से बात करनी चाही. छत्तीसगढ़ सरकार की आधिकारिक वेबसाईट पर दिए गए किसी भी नंबर पर बात नहीं हो पाई. सर्व आदिवासी समाज बिलासपुर के सदस्य सुभाष से बात कर हमने ये जाना चाहा कि सरकार कहती है आदिवासी खुश है, क्या आप इस बात से वास्ता रखते हैं? सुभाष ने कहा ये दलालों की सरकार है.
इन मरते आदिवासियों की छाती पर खड़ी छत्तीसगढ़ सरकार ने बीते 9 अगस्त को राजधानी रायपुर एक इंडोर स्टेडियम में बड़ी धूम-धाम से विश्व आदिवासी दिवस मनाया. छत्तीसगढ़ की रमन सरकार का ये तीसरा कार्यकाल है. छत्तीसगढ़ में विश्व आदिवासी दिवस के आयोजन की शक्ल भाजपा के किसी आम चुनाव प्रचार कार्यक्रम की तरह ही थी. कई मीटर ऊंचे मंच पर मंत्रिगण विराजमान थे और नीचे बैठे लोग उनका भाषण सुन रहे थे. कार्यक्रम को रंगारंग बनाने के लिए सजे-धजे आदिवासियों को बुलाया गया था, ऊपर खड़े मुख्यमंत्री महोदय छाति फुलाकर अपने 15 वर्षों का बखान कर रहे थे और नीचे देश का मूल निवासी उनके मनोरंजन के लिए नाच रहा था.
हमारी सरकार की नज़र में शायद आदिवासियों की अब सिर्फ़ इतनी ही अहमियत रह गई है कि ऐसे किसी आयोजन में उन्हें नाचने के लिए बुला लिया जाता है.
न जल-जंगल-जमीन मिली न आज़ादी
सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या में आदिवासी 8.6 हैं. भारत में आदिवासी विशेषकर छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात, पश्चित बंगाल तथा उत्तरपूर्व राज्यों व अंडमान निकोबर में बसते हैं. देश के अलग-अलग राज्यों में लगभग 757 अनुसूचित जनजाति समुदाय हैं.
विश्व आदिवासी दिवस के कुछ ही दिन भाद भारत का स्वतंत्रता दिवस भी आता है. भारत के स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासियों का भी महत्वपूर्ण इतिहास रहा है. लेकिन आज भी न तो जल-जंगल-जमीन पर उन्हें उनका अधिकार मिल पाया है और न ही उन्हें देश की दूसरी आम जनता की तरह आज़ादी मिली है (हालांकि आम जनता को भी सच्ची आज़ादी मिली है या नहीं ये अपने आप में बहस का मुद्दा है).
समस्या सबको दिख रही है केवल सरकार को छोड़कर
पूरी दुनिया को छतीसगढ़ के आदिवासियों की समस्याएं दिख रही हैं, और किसी को नहीं दिख रही हैं तो बस देश और छत्तीसगढ़ की सरकार को. मुख्यमंत्री रमन सिंह की मानें तो प्रदेश का आदिवासी ख़ूब मज़े में है और विकास के पायदान चढ़ता जा रहा है. मुख्यमंत्री रमन सिंह के साथ-साथ सरकार में बैठे आदिवासी मंत्रियों का भी यही मानना है कि प्रदेश के आदिवासी समाज को भाजपा की इस 15 बरस पुरानी सरकार से और मुख्यमंत्री महोदय से लेशमात्र भी शिकायत नहीं है. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह और राज्यपाल बलराम दासजी टंडन ने गुरुवार को विश्व आदिवासी दिवस की बधाई देते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार भी राज्य के आदिवासी समुदायों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक विकास के लिए वचनबद्ध है और प्रकृति के साथ तारतम्य वाली आदिवासियों की जीवनशैली सभी के लिए अनुकरणीय है. ऐसी कई लोकलुभावन बातें मंत्रीजी द्वारा कही गईं.
सुकमा में फिर मारे गए 15 आदिवासी
परंतु छत्तीसगढ़ में काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनता के पक्षधर पत्रकारों की मानें तो यहां के जंगलों में रहने वाले आदिवादियों का जीवन बदहाली और भय के निम्नतम स्तर तक जा चुका है.
बस्तर संभाग के पत्रकार लिंगा ने विश्व आदिवासी दिवस के कुछ दिन पहले पुलिस द्वारा मारे गए 15 आदिवासियों की ख़बर अपनी फ़ेसबुक वाल पर पोस्ट की. उनके अनुसार सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी ने मृतकों के परिजनों व गांव के अन्य लोगों से मुलाकात की, गांव वालों ने उन्हें बताया कि घटना में मारा गया कोई भी आदिवासी किसी भी तरह की नक्सली गतिविधि में शामिल नहीं था. गांव वालों ने ये भी बताया कि पुलिस जिस नक्सली मुठभेड़ की बात कह रही है वैसी कोई मुठभेड़ गांव में हुई ही नहीं. इसका सीधा मतलब ये है कि छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा की जाने वाली फर्जी मुठभेड़ों का ये एक नया मामला है. इस घटना में सुकमा जिले के चार गांवों नुलकातोग, गोमपाड़, किन्द्रमपाड़, वेलपोच्चा के लोग मारे गए जिसमें बच्चे और महिलाएं भी शामिल थीं. इसके अलावा पुलिस ने कुछ आदिवासियों को हिरासत में भी लिया है.
बात बड़ी अजीब लगती है कि ऐसी भयावह परिस्थितियों वाला कोई प्रदेश विश्व आदिवासी दिवस पर कोई उत्सव मनाने की बात भला कैसे और किस मुह से सोच सकता है. जनप्रतिनिधियों की संवेदनाओं का इस हद तक मर जाना लोकतंत्र के लिए खुल्ला ख़तरा है.
हालांकि मौत का ये मंज़र केवल छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है. प्रदेश की राजधानी रायपुर के वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने “मौत का गढ़ छत्तीसगढ़” शीर्षक से ये पोस्ट लिखी
मुस्कुराइए आप छत्तीसगढ़ में हैं और फ़िलहाल जिंदा हैं
“अगर आप बस्तर में बसने की सोच रहे हैं तो आपको कभी भी फर्जी मुठभेड़ में माओवादी बताकर मारा जा सकता है. अगर माओवादी की मौत नहीं मरे तो माओवादी आपको पुलिस का मुखबिर या सीधे पुलिसवाला समझकर मौत के घाट उतार सकते हैं. अगर आप जशपुर में गुजर-बसर करने के इच्छुक हैं तो नागलोक का सांप आपको डस सकता है.
अंबिकापुर/ रायगढ़ और धर्मजयगढ़ में जाएंगे तो लगेगा अब-तब में हाथी कुचल देगा. महासमुन्द में भालू आपका पीछा करेगा. भिलाई- दुर्ग, रायगढ़, कोरबा और रायपुर का औद्योगिक प्रदूषण आपका दम घोंट सकता है. अगर आप राजधानी रायपुर में रहना चाहते हैं तो आवारा कुत्तों से सावधान रहना होगा। आवारा कुत्ते कभी भी जहन्नुम का रास्ता दिखा सकते हैं. कुत्तों से बच भी गए तो शराब पीने के बाद आपकी मौत तय है. शराब की बिक्री के मामले में छत्तीसगढ़ ने एक रिकार्ड कायम किया है और अब तो यहां मिलने वाली हर ब्रांड नकली ही मानी जाती है. अगर आप शराब नहीं पीते तो भी यह मत सोचिए कि यहां की व्यवस्था आपको जिंदा छोड़ देगी. हो सकता है जिस गाड़ी ने आपको दुर्घटनाग्रस्त करने के बाद अस्पताल पहुंचाया हो उसका चालक पियक्कड़ हो. छत्तीसगढ़ में वाहन दुर्घटना के प्रकरणों में भी खासी वृद्धि देखने को मिल रही है। यदि जैसे-तैसे आप अस्पताल पहुंच भी गए तो यह अनिवार्य नहीं है कि स्वस्थ होकर जल्द से जल्द घर पहुंच जाएंगे. प्रदेश के हर प्राइवेट अस्पताल की फीस अनाप-शनाप है. इलाज के बाद फीस देखकर भी मौत हो सकती है. यह भी हो सकता है कि आपका मुर्दा शरीर अस्पताल में तब तक बंधक रहे जब तक डाक्टर को पूरी फीस न मिल जाए.
अगर आप दो-चार एकड़ जमीन लेकर खेती करने के बारे में विचार कर रहे हैं तो यह विचार अभी और इसी वक्त त्याग दीजिए. किसान बनकर क्या कर लीजिएगा. देश के अन्य हिस्सों की तरह यहां भी किसान बड़ी संख्या में आत्महत्या कर रहे हैं. अगर आप आदिवासी है और सोच रहे हैं कि कोई आपकी जमीन पर कब्जा नहीं करेगा तो यह भ्रम दिमाग से निकाल दीजिए. यहां आदिवासियों की जमीन हड़पना एक सामान्य व्यवहार माना जाता है. अब तो इसे नियम-कानून मान लिया गया है. आपको बताना ठीक होगा कि बस्तर में टाटा के स्थापित होने वाले प्लांट के लिए सरकार ने आदिवासियों से जमीन अधिग्रहीत की थी. वहां प्लांट लग नहीं पाया और आदिवासियों को अपनी जमीन से हाथ धोना पड़ा. केवल बस्तर ही नहीं छत्तीसगढ़ में ऐसे कई इलाके हैं जहां जमीनों पर सरकार के कब्जे के बाद आदिवासियों ने मौत को गले लगा लिया है.
अगर आप किसी गरीब आदिवासी बेटी के पिता है तो मानव तस्कर आपकी बेटी का अपहरण कर सकते हैं और आपको इस अपराधबोध में आत्महत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है कि आपने गरीब बेटी का बाप बनकर छत्तीसगढ़ में जन्म क्यों लिया? अगर आपका विरोध इस बात को लेकर हैं कि आपके गांव में बार-बार बिजली क्यों गुल हो जाती हैं तो आपको थाने लाकर पीटा जा सकता है. जब वर्दीधारियों की पिटाई से आपकी मौत हो जाएगी तो आपको लॉकअप में फांसी के फंदे पर झुलाया भी जा सकता है. आपने सीडी बनाई है या नहीं बनाई है इस बात से फर्क नहीं पड़ता. आपने अगर बलराज साहनी की किसी पुरानी फिल्म की सीडी भी अपने पास रखी है तो आपको फांसी के फंदे पर लटकना पड़ सकता है.
आपको यह तो पता ही होगा कि छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है. बस्तर में आज भी कई जगहों पर एम्बुलेंस नहीं पहुंच पाती है. सरकार खुद मानती हैं कि प्रदेश को जितने डाक्टर चाहिए उतने उनके पास नहीं है. अगर आप खांसी-कुशी और बीमारी से बच भी गए तो सरकार में बैठे नुमाइंदे और दलाल आपको किसी न किसी झूठे मामले में फंसा देंगे. हो सकता है कि आप जेल में सड़ जाएं या फिर केस लड़ते- लड़ते स्वर्ग सिधार जाएं. अगर आप सामाजिक कार्यकर्ता हैं और आपका विरोध इस बात को लेकर हैं कि बेगुनाह लोगों की मौत क्यों हो रही है तो भी आपकी मौत सुनिश्चित है. पुण्य-सुन्य-प्रसुण तो किसी चैनल से अभी हकाले गए हैं. छत्तीसगढ़ में कई पत्रकार मौत के घाट उतारे जा चुके हैं. यहां असहमति का मतलब अपराधी हो जाना है और असहमतियों के अपराधियों की सजा है- मौत… और केवल मौत.
अगर आप छत्तीसगढ़ के हैं और अभी आपकी सांसे चल रही हैं तो जिस भगवान को भी मानते हैं उसका शुक्रिया अदा करिए. अगर आप नास्तिक है तो भी कोई बात नहीं…
छत्तीसगढ़ में आपके जिंदा रहने को लेकर थोड़े समय के लिए ही सही मैं यह मान लेता हूं कि किस्मत नाम की भी कोई चीज होती है. अब मुस्कुराइए भी… क्योंकि आप छत्तीसगढ़ में हैं और फिलहाल जिंदा हैं.
विस्थापन की मार झेल रहा है देश का आदिवासी
देश की कुल जनसंख्या का मात्र 9 प्रतिशत के लगभग होते हुए भी, एक के बाद एक सरकारों की तथाकथित विकासीय परियोजनाओं के चलते आदिवासियों का विनाश ही हो रहा. देश में विस्थापन से प्रभावित कुल जनसंख्या में से लगभग 56 प्रतिशत आदिवासी हैं. कभी तथाकथित माओवाद को कुचलने के नाम पर हो या आदिवासियों द्वारा अपनी व्यथा को प्रकट करने की अभिव्यक्ति ’पत्थलगड़ी आंदोलन’ को कुचलने के नाम पर हो या फिर अंबानी, अडानी, जिंदल या टाटा जैसे बड़े कार्पोरेट घरानों की पहल से किए जा रहे ’’विकास’’ की बात हो, कीमत आदिवासी जनता को ही चुकानी पड़ती है. वे ही सबसे ज्यादा दमन का विनाश का शिकार बनते हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1994 में विश्व के मूल निवासियों के लिए 9 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय दिवस घोषित किया. संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुमान के अनुसार दुनिया के 70 देशों में करीब 370 मिलियन मूल निवासी (आदिवासी) निवास करते हैं. और यह विश्व की कुल जनसंख्या के 6 प्रतिशत से कुछ कम है तथा 72 देशों में 5000 अलग-अलग शाखाओं से ताल्लुक रखते हैं.
जो पहले हाशिए पर थे वो अब भी हाशिए पर ही हैं
सरकार चाहे किसी भी पार्टी की हो, वो अच्छे दिनों का कितना भी दावा करती हो, दिवसों को वो कितनी भी धूम-धाम से मनाती हो मानवता की नीयत किसी भी नाप की छाती में नहीं दिखती. आदिवासियों, दलितों, शोषितों, मेहनतकशों, महिलाओं, अल्पसंख्यकों तथा उत्पीड़ित वर्गों के लिए कोई सरकार भाषणों के ज़्यादा कुछ नहीं करती, हां साज़िश ज़रूर रचती है. सरकार जनता की ज़रा भी नहीं और कार्पोरेट की पूरी पूरी लगती है. विश्व आदिवासी दिवस की शुरुआत के बरसों बाद भी आदिवासी समाज संघर्ष ही कर रहा है कॉरपोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के राज के ख़िलाफ़. जो पहले हाशिए पर थे वो अब भी हाशिए पर ही हैं बल्कि पहले से ज़्यादा बुरी स्थिति में पहुंचा दिए गए हैं.
Mango festival
“#मरका पंडुम+इरूक +तुमीर+रेका+ कोरमाता पंडुम”(आम-महुआ-तेन्दू-चार आदि प्रकृति प्रदत फसलो का त्योहार ): वैज्ञानिक विश्लेषण
(बस्तर संभाग के विभिन्न पेन मण्डाओ मे मरका पंडुम जारी)
एक नजर इन “ज्ञान की ओर सतत् प्रवाहित समुदाय के रूढ़ि परम्पराओं” को देखकर गर्व की अनुभूति करे …….
“मानवता का लक्ष्य यह नही है कि तकनीकी के माध्यम से प्रकृति को कुचल कर सिर्फ मानवीय महत्वाकांक्षाओ को आकार दो …… बल्कि मानवता का लक्ष्य है प्रकृति के साथ मानवीय गुंणो का विकास ….. क्योंकि प्रकृति खुश 😌 रहेगी तभी मानवता प्रफुल्लित रहेगी” . … इसी मुख्य संदेश को प्रसारित करता #गोण्डीयन समुदाय का महान “मरका पंडुम” /चैतरई महापर्व /आम-चार-तेंदु-महुआ-करमोता का त्योहार
कोया -कोयतोर – गोण्ड – मुरिया – माड़िया आदि आदिवासी समुदायों के जीवन दर्शन वर्तमान अति उपभोगवाद जनित चिन्ताजनक परिस्थितियों से बाहर निकालने की एक बेहतर उम्मीद जगाती है । इन समुदायों में इन ” पांरम्परिक #प्रकृति संरक्षण ” पद्धति को व्यवस्थित रूप देने के लिए उनके पास ” कोया पुनेम ” के रूप में सरल प्रकृति दर्शन भी है , “#गोटूल ” जैसे एजुकेशन सिस्टम है, “#नार-जागा-मण्डा-गढ ” जैसे व्यवस्थित प्रशासनिक ढांचा व इनके व्यवहारिक अनुप्रयोगो के लिए ” #पंडुम ” भी है। हम इस आलेख में इन जनजातियों के इन्हीं “पंडुम ” (त्योहार /उत्सव) का अध्ययन कर आदिवसीयो के जीवन में वैज्ञानिक सम्मत नेंग व्यवस्था व #पर्यावरणीय समस्याओं को हल करने के तरीकों को समझने का प्रयास करेंगे ।
कोयतुर समुदाय में “पंडुम ” का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है, हम अब तक सामान्यतः “पंडुम ” का अर्थ “त्योहारों /उत्सवों ” के रूप में ही समझ पाऐ हैं । जबकि गोण्डीयन समुदाय में “पंडुम ” अपने अन्दर बहुत ही विस्तृत व गहन अर्थ छुपाऐ हुए हैं । दरअसल गोण्ड समुदाय के लिए उत्सव के अतरिक्त “पडुंम ” प्रकृति को #अनंतकाल तक “मानव समुदाय” के लिए “#अनुकूल” बनाऐ रखने का एक वैज्ञानिक प्रक्रम भी है । इसे और अच्छे से देखने के लिए इसे गोण्डी भाषा में शाब्दिक विश्लेषण करते हैं, “पडुंम ” शब्द गोण्डी लैंग “पंडना ” शब्द से निर्मित है जिसका अर्थ होता है “बनाना” अर्थात प्रकृति सम्मत परम्पराओं को अपने आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित बनाऐ रखना । इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए हम उदाहरण स्वरूप किसी एक “पंडुम ” जैसे की “मरका पडुंम “(आम के फल का त्योहार ) के नेंग दस्तूरो को देख सकते हैं । जैसा कि हम जानते हैं कि गोण्ड समुदाय किसी भी प्रकृति प्रदत्त उपज को वह तब तक खाना शुरू नहीं करता जब तक कि वह अपने “पूर्णावस्था” में नहीं आ जाता है । इसी मूल भावना की तरह ही “मरका पडुंम ” में भी जब ” मरका” याने आम के फल में ” टाका” (बीज कोष) पूर्ण विकसित हो जाते हैं , अर्थात उस अवस्था के बाद आम का फल अपने आने वाली पीढ़ी हेतु पौध अंकुरण की क्षमता विकसित करने लायक हो जाता है । तब सर्व प्रथम इस “अदभुत ज्ञान” को बताने वाले “#पुर्वजो / पेन्क” को आम के फल की “सेवा ” अर्पित कर समुदाय के सभी लोग एक साथ आम के फल का उपभोग करना शुरू कर देते हैं । इसके पीछे वैज्ञानिक कारण यह होती है कि यदि हम छोटे-छोटे व अपरिपक्व अवस्था से ही फलों का उपभोग करना शुरू कर देते हैं तो जाहिर है आम के वृक्ष पर पके हुए आम के फल तैयार नहीं हो पाऐगे ।और यदि आम के फल पक नही पाऐगे तो उस आम के फल की अगली पीढ़ी के लिए “नया पौध” तैयार नहीं हो पाऐगा जिसके दुष्प्रभाव से आने वाले मानव समुदाय को भी उस “अदभुत प्रजाति “से वंचित होना पड़ेगा ।और आगे चलकर उस सदृश्य सभी प्रजातियाँ ही इस पृथ्वी पर नष्ट होने लगेगी । इसके कारण पृथ्वी के “जैव विविधता ” पर घातक प्रभाव पड़ने लगेगा इसके साथ ही उस “प्रजाति ” के “सन्तुलन बिन्दु”/ “सहजीविता ” पर टीके हजारों अन्य जीवों कि भी ” विलुप्ति ” की ऊल्टी गिनती शुरू हो जाऐगी । इसलिए इस गम्भीर “इको सिस्टम ” से सम्बन्धित पहलु पर गहरी समझ रखते हुए आदिवासी समुदाय हजारों सालों से पीढ़ी दर पीढ़ी अपने “पारम्परिक ज्ञान पैकेट्स ” को सतत् विकसित करते हुए आ रहे हैं जिसे कोयतोर समुदाय अपने गोण्डी भाषा में “#पूनेम ” कहते हैं । “पूनेम ” शब्द दो गोण्डी शब्दों “पून” + ” नेम” से बना है ” पुन” अर्थात ” जानना ” /”ज्ञान ” और ” नेम” याने ” कि ओर ” अर्थात ” जानने की ओर ” या ” ज्ञान की ओर सतत् प्रवाहित होने वाले समुदाय” । इसे गोण्डीयन “कोया पुनेम ” (प्रकृति धर्म ) कहना पंसद करते हैं । इस प्रकार इस ” पुनेमी ज्ञान ” को वे ” पडुंमो ” में व्यवहारिक अनुप्रयोग द्वारा संयोजित, संवर्धित व पल्लवित करते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करते रहते हैं जैसा कि हमने “मरका पडुंम ” के उदाहरणों में हमने देखा । यहां आश्चर्यजनक पहलू और भी है कि ऐ इन पंडुमो के ” पुनेमी उदेश्यो ” के सटीकता से समुदाय को परिपालन के लिए छोटे-छोटे बहुत ही सरल व मजेदार नेंग -नियमों के द्वारा इसे व्यवहारिक व अनुपाल्य बनाऐ रखते हैं । “मरका पडुंम ” में ही एक “#कोको पंडिग पाटा ” या नियंत्रित उपभोग करने की संदेश फैलाता “मुर्गा और बीज का गीत ” गोटूल लया लयोरों द्वारा गाया जाता है । इस गीत को तब गाया जाता है जब आम के फलों को अपने पूर्वजों / पेन्क को अर्पित कर रहे होते हैं और जब सेवा अर्पण करके उपस्थित जन समुदाय के बीच प्रथम उपभोग हेतु फलों के तुकड़े वितरित कर रहे होते हैं। ठीक इसी वक्त इस गीत को प्रश्न- उत्तरीय शैली में गाया जाता है. . . . इस गीत के अनुवादित अंश इस तरह है. .
“मरका पडुंम ” —— “कोको को”
रेका पंडेम —— कोको को
इरूक पंडेम —-‘ कोको को
तुमीर काया — कोको को
इस में एक कोई भी बड़ा गोटूल लयोर खड़ा होकर खुशी खुशी नारा लगाते हुए सभी से पुछता है कि अब हमने आम के फल सहित अन्य मौसमी फलों चार , तेन्दू आदि की सेवा कर उपभोग तो शुरू कर रहे हैं लेकिन उसे कैसे और किस तरह से खाना चाहिए के भावों से जोर जोर से ओजस्वी गीत के रूप में एक एक लाईन गाते जाता है. . . जैसे वह पुछता है “आम का फल” सामने से आवाज आती है. . . . “कोको को”
इसका भावार्थ है कि अब हम कैसे आम के फल को खाऐ जिससे सामने वाले बच्चों से उत्तर आता है , “मुर्गे की तरह ” अर्थात एक एक करके याने थोड़ा-थोड़ा करके। सीधे तौर पर कहे तो चूंकि आम का फल बच्चों में लालच उत्पन्न कर सकता है , उस लालच को नियंत्रित कर जितनी जरूरी है उतना ही फल तोड़ना ताकि उस वृक्ष मे अंतिम तक पेड़ में ही प्राकृतिक ढंग से फल पक कर नये अंकुरण की सम्भावनाओं को बड़ा सके । इसको हम उदाहरण के तौर पर यह अनुभव कर सकते हैं कि शहरी क्षेत्रों में बिना उद्यानिकी विभाग के आम के पौधों को प्राकृतिक ढंग से अपने आप उगने की कल्पना नहीं कर सकते जबकि हर आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे भारी भरकम विभागों के बैगेर भी घरों में ऐसे पौधे प्राकृतिक ढंग से पल्लवित होते रहते हैं ।इस तरह गोण्ड समुदाय इन ” पारम्परिक ज्ञान ” को “गोटूल ” में संग्रहित व परिमार्जित कर “कोया पुनेम ” के रूप में ” पडुंम ” के व्यवहारिक क्रियाओं के द्वारा इस पृथ्वी को मानव समुदाय के लिए अनंतकाल के लिए सुरक्षित बनाऐ रखने की कोशिश करते रहने वाला समुदाय है । क्या ऐसा सरल सार्वभौमिक और पवित्र दर्शन दुनिया के किसी अन्य “धर्म ग्रंथों” में मिलेगा ?
इतना ही नहीं “पडुंम ” के अन्दर एक साथ कई मानवीय लक्ष्यों को वैज्ञानिक सम्मत ढंग से साधने की भी कोशिश छुपी होती है। उदाहरण स्वरूप इसी “मरका पडुंम / आम के त्योहार ” में पुरखों को अर्पण या “सेवा” से पहले चूंकि फलों को खाने की मनाही होती है जिससे छोटे बच्चे भी इन छोटे फलों को खाने से दूर रहते हैं । जबकि जिन इलाकों में दूसरे समुदाय इन नियमों का पालन नही करते हैं उन क्षेत्रों में छोटे बच्चों के मुंह में छाले व घांव आम के सीजन में बहुतायत में दिखाई देते है ।दरअसल छोटे फलों में निकलने वाला “घातक एसीड ” मुंह और पेट में छाले उत्पन्न कर देता है जिससे भविष्य में गम्भीर इन्फेक्शन का खतरा भी हो सकता है । लेकिन कोया समुदाय की इन “पडुंमो” में निहित “पुनेमी ज्ञान परम्पराओं ” से वे अपने बच्चों को इन खतरों से बचा कर रखने में भी कामयाब हो जाते हैं ।
इस तरह के अदभुत तकनीकी हम गोण्ड समुदाय के हर “पडुंमो ” में देख सकते हैं।
इसलिए हे महान प्रकृति के रक्षको ….दुनिया के सबसे बड़े वैज्ञानिको …. अब समय आ गया है इस पृथ्वी पर जीवन की संभावनाओ को अनंतकाल तक बचाऐ रखने के लिए प्रकृति पुनेम कोया पुनेम जरूरी है. ……(क्रमशः…KBKS..)
जय सेवा! प्रकृति सेवा! जय लिंगो!

