सामाजिक

भोजली महोत्सव पर लेख आर.के.कुंजाम

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज

प्रांतीय महासचिव गो.ध.सं.सं.समिति छ .ग.

गोंडी धर्म संस्कृति संरक्षण समिति द्वारा प्राचीन परंपरा को बचाये रखने प्रति वर्ष राष्ट्रीय स्तर पर भोजली महोत्सव का आयोजन छत्तीसगढ़ के राजधानी रायपुर में किया जाता है।
क्या है भोजली और ग्रामीण अंचलों मे आदिवासी माताऐं क्यों मनाते आ रहे हैं।बहुत बड़ा रहस्य है।
आदिवासी समाज समुदाय प्रकृति के पुजारी है,प्रकृति जीवन का आधार है। प्रकृति मे संपूर्ण जीवन आधारित है।प्रकृति है तो जीवन है।आदिवासी समाज तथा ग्रामीण प्रकृति के रूप मे पेड़ पौधे वनस्पति आदि की समय समय पर पूजा करते है,प्रथम फल,भाजी ,अन्न आदि।इसी के तहत श्रावण माह मे अन्न माता जिसमे दलहन तिलहन सभी आते है जो जीवन का आधार है इसी तहत अन्न को माता के रूप मे सातो माता भोजली माता के रूप मे सात प्रकार के अन्न बीज को छोटे छोटे बांस की टोकरियों मे बोकर सात दिनों तक सेवा करते हैं।
सावन शंभू प्रिय है।सावन माता के आशीर्वाद से आदिवासी माताऐ अच्छी फसल ,अच्छी बरखा रानी बरसात की कामना से आह्वान जल माता का आह्वान भी करते हैं जिसके तहत गीत ,पाटा गाया जाता है जिसमें देवी गंगा, देवी गंगा लहरा तुरंगा, हमर भोजली दाई के भीगे आठो अंगों इस प्रकार जल दाई ,सावन माता को रिझाया जाता है।ताकि सबका कल्याण हो।पर कालांतर चकाचौंध मे सब अपनी पुरानी कल्चर सभ्यता को भुलते जा रहे हैं।इन सबके बावजूद आदिवासी ग्रामीण जन इस अद्भुत संस्कृति को बचा कर रखे हुए हैं।
इसी संस्कृति को बचाने परमश्रद्धेय गोडवाना गुरूदेव गुरूमाता के सानिध्य आशीर्वाद भोजली माता सावन माता के सातो माता के आशीर्वाद से मनाया जाता है, और मनाया जाता रहेगा।
ग्रामीण को अपने मूल संस्कृति को बचाकर रखने की आवश्यकता है।आज हम शिक्षित हो रहे हैं पर अपनी संस्कृति को रीति नीति परंपरा को भूलते जा रहें।तो पढीं लिखी माताओ,से आशा है की पढ़ो लिखो आगे बढ़ो पर अपनी संस्कृति को बचा कर रखो।दिखावा चकाचौंध मे मत भटको।
जय सेवा जय जोहार