रायपुर

संगच्छध्वम् मंत्र के साथ धर्म महासम्मेलन का समापन

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज

आनन्द मार्ग की रायपुर शाखा के द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय धर्म महासम्मेलन का संगच्छध्वम् मन्त्र के साथ आज समापन हो गया। संगच्छध्वम् ऋग्वेद का मन्त्र है जिसमें ऋषि-मुनि सभी लोगों को एक साथ मिलकर चलने की प्रेरणा दे रहे हैं।। इस मन्त्र की मूल भावना के अनुरूप आनन्दमार्ग सम्पूर्ण विश्व में मानवजाति को एक साथ लेकर चल रहा है। सनातन धर्म पर आधारित यह आध्यात्मिक संगठन दुनिया के लगभग 150 देशों में धर्म प्रचार कर रहा है और लोगों के जीवन में आशा का संचार कर रहा है।
आज सुबह अग्रसेन धाम के विशाल कमरे में लगभग 200 आनन्दमार्गियों ने मिलित रूप से योगासन किया। योगासन शरीर को स्वस्थ्य रखने का सब से आसान उपाय है। दोपहर में आचार्य करुणानन्द अवधूत का “” शिव द्वारा प्रदत्त सफलता के सात सूत्र”” पर प्रवचन हुआ। ये सूत्र आगम और निगम शास्त्र, (जो कि माता पार्वती द्वारा पूछे गए प्रश्नों और भगवान शिव द्वारा दिए गए उत्तरों का संकलन है), में दिए गए हैं। पार्वती जी ने पूछा,” अध्यात्म के पथ पर चलते हुए सफल होने का क्या उपाय है?”
उत्तर में भगवान शिव ने सात सूत्र दिए:- विश्वास, श्रद्धा, गुरु पूजनम् , समता भाव, इन्द्रिय निग्रह, प्रमित आहार, इन सात सूत्रों की व्याख्या करने के बाद भगवान शिव ने कहा,” यदि धर्म पथ पर चलने वाला साधक इन छः सूत्रों का निष्ठापूर्वक पालन करता है तो उसे सातवें सूत्र की आवश्यकता नहीं होगी। श्रद्धा को समझाते हुए करुणानन्द जी ने कहा कि साधक को गुरु से प्रेम करना होगा। गुरु से लगाव के बिना सफलता नहीं मिल सकती। गुरु पूजनम् का अर्थ है गुरु की इच्छा के अनुरूप कार्य करना। हमारी दिनचर्या पर वेद की हल्की सी छाप है लेकिन हम भारतवासी भगवान शिव द्वारा प्रदत्त तान्त्रिक सभ्यता के प्रतिनिधि हैं। तन्त्र में गुरु को ब्रह्म के समकक्ष माना जाता है। आनन्दमार्ग दर्शन शास्त्र की पुस्तक ” आनन्द सूत्रम्” में कहा गया है,”ब्रह्मैव गुरुरेक: न पर:” अर्थात एक मात्र ब्रह्म ही गुरु है। अध्यात्म पथ पर और कोई दूसरा गुरु हो ही नहीं सकता। आनन्दमार्गी को श्री श्री आनन्दमूर्ति हर क़दम पर दिशानिर्देश देते रहते हैं। जिस तरह भगवान श्रीकृष्ण पाण्डवों के फ्रैण्ड, फिलॉसफर और गाइड थे उसी तरह श्री श्री आनन्दमूर्ति भी आनन्दमार्गियों के व्यष्टिगत और पारिवारिक मित्र हैं। समता भाव का अर्थ है बिना किसी भेद भाव के सभी को एक दृष्टि से देखना। करुणानन्द जी ने ज़ोर देकर कहा कि जो लोग जात-पात के आधार पर भेद भाव पैदा कर रहे हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि नफरत की बुनियाद पर एक स्वस्थ समाज का निर्माण कदापि नहीं हो सकता। इन्द्रिय निग्रह का अर्थ है अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना और हमेशा शाकाहारी और बिना लहसुन वह प्याज़ के सात्विक भोजन करना। सीरिया, लेबनान और यूरोप के मार्गी भी शाकाहारी और सात्विक भोजन करते हैं।

करुणानन्द जी ने बतलाया कि मनुष्य का मस्तिष्क एक तरल पदार्थ में तैरता रहता है।उस द्रव को “ब्लड ब्रेन बैरियर” कहा जाता है।इस द्रव्य के रहते हुए कोई भी पदार्थ मस्तिष्क को आघात नहीं पहुंचा सकता लेकिन लहसुन और प्याज़ में उपस्थित “सल्फोन हाइड्राक्सिलॉन” उस द्रव्य को हानि पहुंचाता है और मस्तिष्क की क्षमता को बहुत कम कर देता है, इसलिए आध्यात्मिक साधक को लहसुन और प्याज़ कदापि नहीं खाना चाहिए।सफलता का छठवां सूत्र है प्रमित आहार। हमें आधा पेट खाना चाहिए। एक चौथाई हिस्सा पानी के लिए और एक चौथाई हिस्सा वायु के आवागमन के लिए रखना चाहिए। यही प्रमित आहार कहलाता है। इन छः सूत्रों का पालन करने वाले साधक को सातवें सूत्र की आवश्यकता नहीं पड़ती।दोपहर लंच के बाद आचार्य रूपातीतानन्द अवधूत की अध्यक्षता में गृहस्थ मार्गियों की विचार गोष्ठी हुई जिसमें बेहतर और आदर्श मानव समाज की स्थापना के लिए गहन विचार विमर्श किया गया। शाम के समय “” रिनेसां आर्टिस्ट एण्ड राइटर्स एसोसिएशन, रायपुर “” की ओर से आनन्द मार्ग के छात्र छात्राओं ने प्रभात संगीत पर आधारित नृत्य नाटिका प्रस्तुत किया। समापन समारोह में बाहर से आए हुए संन्यासियों ने रायपुर के भुक्ति प्रधान चन्द्रशेखर चन्द्राकर और उनकी टीम को कार्यक्रम के सफल आयोजन के लिए धन्यवाद दिया।