ग्रामीण विशेषसामाजिक

32 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने आर्थिक नाकाबंदी चक्काजाम 15 नवंबर को मानपुर चौंक दल्ली राजहरा

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एक तीर एक कमान, सर्व आदिवासी एक समान

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज (रूढिजन्य परंपरा पर आधारित)  सर्व आदिवासी दल  मानपुर चौक दल्ली राजहरा जिला बालोद (छ.ग.) आर्थिक नाकेबंदी की तैयारी डौंडी ब्लाक के प्रत्येक गांव में गोपनीय बैठक हो रही है इस आर्थिक नाकेबंदी में डौंडी ब्लाक के लगभग 50,000 एकजुट होने की संभावना है जिसकी जानकारी डौंडीं ब्लाक के  गोंड समाज अध्यक्ष आत्माराम कौडो ने दिया और कहा कि 1 नवम्बर 2000 को छ.ग. राज्य निर्माण के तुरन्त बाद ही आदिवासी समाज का प्रदेश में 32 प्रतिशत आरक्षण स्वभाविक एवं संवैधानिक हक था। लेकिन समाज के लगातार संघर्ष के पश्चात् 2012 में जाकर प्रदेश में 32 प्रतिशत आदिवासी आरक्षण मिला। 12 वर्षों तक आदिवासियों का हक मारा गया। जिसके लिए कांग्रेस व भाजपा की सरकारें बराबर की दोषी हैं। 2012 में रमन सरकार ने आंदोलन के दबाव में अधूरे मन से जानबूझकर 50 प्रतिशत की सीमा बिना पूर्व औपचारिकतापूर्ण किये लांघते हुए प्रदेश में 58 प्रतिशत की। जबकि 50 प्रतिशत आरक्षण के भीतर भी आदिवासियों का हक 32 प्रतिशत है, जो केन्द्र सरकार के डी.ओ.पी.टी के 5 जुलाई 2005 के आफिस मेमोरेण्डम से भी स्पष्ट है। भाजपा सरकार की चालाकी समाज समझ नहीं पाया, और 32 प्रतिशत आरक्षण लागू होते ही समाज बेफिक्र हो गया। फलतः हाई कोर्ट में लगी 20 से अधिक याचिकाओं में हमारा पक्ष रमन सरकार और न ही भूपेश सरकार ने मजबूती से रखा और न ही इन 10 वर्षों के दौरान आवश्यक सांवैधानिक औपचारिकताओं को पूरा करने की जररूत समझी। आखिरकार 19 सितम्बर को बिलासपुर हाई कोर्ट ने छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग आरक्षण (संशोधन) अधिनियम 2011 अपात्र किया और मार्च 2012 की स्थिति यानि अनूसुचित जाति 16, अनुसूचित जनजाति 20 व अन्य पिछड़ा वर्ग 14 प्रतिशत पुनः लागू हो गया।

सगा जनो, आदिवासी हितों व संवैधानिक अधिकारों पर हमलों की श्रृंखला में एक और कड़ी जुड़ गई। आदिवासी हितों के संवैधानिक प्रावधानों को जमीन पर उतारने के बजाय उनका हनन केन्द्र व राज्य की सरकारें लगातार कर रही है। 5 वीं अनुसूची, पेशा कानून, वन अधिकार मान्यता कानून के माध्यम से संविधान में प्रदत्त प्रावधानों को लागू करने के बजाय केन्द्र व राज्य सरकार के बीच मनमानी इनके हनन एवं उन्हें निप्रभावी करने की प्रतिस्पर्धा चल रही है।

निप्रभावी कार्पोरेट मुनाफे के लिए जल, जंगल, जमीन की लूट का रास्ता आसान करने हाल ही में जहां मोदी सरकार ने वन | संरक्षण नियम 2022 लाया है। जिसके माध्यम से वन भूमि हस्तांतरण एवं डिरिजर्वेशन में ग्राम सभा के भूमिका को नगण्य किया है। वहीं भूपेश सरकार ने पेशा कानून के नियम ऐसे बनाये कि कानून की आत्मा ही मार डाली गई। जहां ग्राम सभा की सर्वोच्चता होनी चाहिए वहां उसकी भूमिका एक सलाहकार की बना दी गई।

जल, जंगल, जमीन लूटने बस्तर में पुलिसिया दमन बदस्तूर जारी है। चाहे भाजपा की रमन सरकार रही हो या कांग्रेस की भूपेश सरकार। बेकसूर आदिवासियों पर झूठे केश लगाये जा रहे हैं जबकि बेकसूरों को छोड़ने का चुनावी वादा था। सिलेगर में पुलिस फायरिंग में मारे गये निर्दोष आदिवासियों को कोई न्याय कोई मुआवजा नहीं दिया जाता। जबकि लखीमपुर खीरी पहुंचकर मुआवजा व संवेदना दिखाई जाती है । बस्तर में एक दर्जन से ज्यादा जगहों में चल रहे आन्दोलन से भूपेश सरकार को कोई सरोकार नहीं है। न संवेदना है न संवाद न्याय तो दूर की बात है। सरगुजा में हसदेव बचाते संघर्षरत आदिवासियों से आगे एक भी डंगाल नहीं काटने का वादा कर बंदूक की नोक पर अडाणी के लिए रातोंरात पूरे खदान क्षेत्र के जंगलकाट दिये जाते हैं। सगाजनों, सरकारों की अनदेखी एवं दमन की लम्बी फेहरिस्त है हालांकि विधानसभा में हमारे एक तिहाई विधायक हैं जिनकी प्रतिबद्धता से हम भलीभांति परिचित हैं। संघर्ष के अलावा कोई और रास्ता नहीं है, इन परिस्थितियों में सर्व आदिवासी समाज (रूदिजन्य परंपरा पर आधारित) लगातार संघर्षरत है।

32 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने भी चरणबद्ध आंदोलन किया जा रहा है। 15 नवम्बर 2022 शहीद बिरसामुण्डा की जयंती के मौके पर राज्य भर में अर्थिक नाकेबंदी शुरू करने का आह्वान किया गया है। प्रदेश स्तरीय आह्वान पर नेशनल हाईवे 53 अम्बेडकर चौक बसना में 15 नवम्बर मंगलवार को आर्थिक नाकेबंदी एवं चक्काजाम प्रातः 10:00 बजे से किया जायेगा। अतः ज्यादा से ज्यादा संख्या में अपने हक के संघर्ष में भागीदारी निभाने मानपुर चौक दल्ली राजहरा जिला बालोद अवश्य पहुंचे की अपील की है लड़ेंगे- जितेंगे

विशेष :- आदिवासी हकों के सतत् संघर्ष में प्रति  हर परिवार से महा आन्दोलन में शामिल हों साथ ही शाससकीय एवं अर्ध शासकीय कर्मचारी भी अवकाश लेकर शामिल होवें