भाषा,संस्कृति, प्राकृतिक ही आदिवासियों की मूल पहचान -आर .के.कुंजाम
आर.के.कुंजाम
प्रां महासचिव गो.ध.सं.सं.समिति छ.ग
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज
प्राचीन गोंडवाना लैंड के अंतर्गत आनेवाले सभी महाद्वीपों में आदि काल से रहने वाले मूल लोग जिसे आज कुछ लोग आदिवासी, मूलनिवासी तथा भारत में रहने वालो को आदिवासी, मूलनिवासी के साथ कोयतूर,पुनेमी तथा संवैधानिक रूप से जनजाति के रूप में जाने जाते हैं।
जिनका जीवन प्रकृति से संबंधित है,आचार विचार व्यवहार मधुर सरल और सहज है।जिनकी भाषा पारसी, गोंडी, हल्बी पहाड़ी आदि है।अपनी आदिम संस्कृति की पहचान और छटा बिखेरते विविधता में भी एकता को समाहित कर सहेजे हुए हैं। जिसमें गोंड,हल्बा,कंवर, पहाड़ी,बैगा,उरांव आदि है।गोंडों को कहीं कहीं कोयतूर,पुनेमी,आदि भी है। गोंडी मूल व्यवस्था है भाषा संस्कृति जिनकी मूल पहचान है। संवैधानिक रूप से लोग जाति के नाम से भी एक विशेष पहचान के रूप में जानते हैं। गोंडी भाषा और संस्कृति ही हमारी मूल पहचान है।
आज प्रकृति पर्यावरण जंगल पहाड़ अगर संरक्षित है तो गोंडवाना के मूलनिवासियो के कारण चाहे वह किसी भी भाग में रहें।आज जिस जगह आदिवासी रहते हैं प्राकृतिक धरोहर संरक्षित है। जिसे कुछ समय से शासन प्रशासन द्वारा दोहन किया जा रहा है। जंगल नष्ट किए जा रहे हैं आदिवासियों का जंगलों से व्यवस्थापन किया जा रहा है।जिसके कारण भविष्य में प्रकृति विनाश का कारण भी बन सकता है।
आज प्राकृतिक आपदा विपदा ग्बोल वार्मिंग बढ़ना, पर्यावरण प्रदुषित होना सब प्रकृति के अंधाधुंध जंगलों की कटाई, पहाड़ों का विनाश है। जंगलों के विनाश से एक ओर जहां जंगलों में निवास करने तथा उस पर निर्भर रहने वालो का जीवन दुभर हो रहा है, वही जंगल में रहने वाले पशु पक्षी वनौषधी भी विनाश के कगार पर है।
मूल गोंडी भाषा संस्कृति प्रकृति पर आधारित है। गोंडवाना लैंड के नाम से गोंड जनजाति की उत्पत्ति मूल है। गोंडवाना लैंड में गोंडी मूल संस्कृति ही एक व्यवस्था है जो प्रकृति आचरण के तहत है।पेन ,पुरूखा,पेड़ पौधे ही मूल रूप से देव रूप में पूजे जाते हैं।
प्रकृति ही सत्य है,जो देता है वही देवता है।पर आधुनिक युग में विभिन्न धर्म संस्कृति संप्रदायो के सानिध्य में प्रकृति के साथ आदिवासी धर्म भाषा संस्कृति पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ रहा है। वर्तमान राजनीति और शासन प्रशासन में बैठे लोग भी दोषी है।
जिस आदिम (गोंडी)भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल होना संरक्षित होना था।प्र आज पर्यंत नहीं हो पाया,जहां सहज मिलना चाहिए लड़ाई लड़ना पड़ रहा है। आदिवासी क्षेत्रों को संरक्षित करने पांचवीं छठवीं अनुसूची शासन द्वारा बनाया तो गया है।पर शासन प्रशासन में बैठे लोग जानबूझकर पालन नहीं करते। आदिवासी संवैधानिक अनुसूचित जनजाति के लिए आया राशि का उपयोग भी उनके हितों में न करके या तो अन्य मदो में लगा दिया जाता है या वापस कर दिया जाता है। आखिर ऐसा क्यों होता है? हमारे लोग जानने समझने का प्रयास ही नहीं करते।
लोग शिक्षा को दोष देते हैं हालांकि की आदिकाल में कुछ कपटी लोगों द्वारा आदिवासियों को शिक्षा से वंचित रखने का प्रयास हक अधिकार को छिनने का प्रयास किया गया, इतिहास मिटाया गया और संभवतः आज भी हो रहा है।पर आज लोग शिक्षित होते हुए भी शिक्षा का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं।कारण राजनीति तंत्र में बैठे लोग आदिवासियों के हितों में न तो कार्य करना चाहते और न आगे बढ़ने देना चाहते।
वर्तमान में अधिकांश जगह देखा जा रहा है विभिन्न धर्मों के लोग आस्था,लालच आदि के नाम से धर्म परिवर्तन करा रहे हैं।हक अधिकार छिन रहे हैं ऐतिहासिक प्राचीन गढ़ किलो पर कब्जा कर नाम परिवर्तित कर अपने धर्म जाति लोग और संस्कृति के नाम कर रहे हैं जो आदिवासियों के सरलता सहजता का फायदा उठा रहे हैं।जो गलत है। राजनीति माध्यम से आदिवासी संगठनों को तोड़ने का भी प्रयास करते है और सफल भी हो रहे हैं।कारण आदिवासी जनजाति समुदाय के राजनीतिक लोगों में नेतृत्व अपनत्व क्षमता का अभाव है। युवा वर्ग दिखावा और अन्य धर्म संस्कृति के संसर्ग में बहक रहे हैं।
कहीं कहीं पर नशा युवा युवतियों को अपने आगोश में ले रहा है।जिसे रोका जाना अनिवार्य है।
शिक्षित होकर अपने धर्म भाषा संस्कृति और समाज को न पहचान पाये संस्कृति और भाषा को मान्यता दिला नहीं पाते, संवैधानिक अधिकारों को समझ नहीं पाये तो कैसी शिक्षा कैसा ज्ञान।
समझे और अपने धर्म भाषा संस्कृति को संरक्षित करें। समाज की पहचान और जल जंगल जमीन की रक्षा करें। शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़े।जय सेवा,जय बुढादेव,जय जोहार को प्रकाशित करें।

