काश मैं तू और तुम बन जाऊँ यूँ हम और आप से परे फिर से तेरा और तुम्हारा कहलाऊँ -एम.बी.बलवंत सिह खन्ना

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज 
एक उम्र पर पहुँच कर ऐसा अहसास होता है कि अब हमारे मित्र तुम, तू, तेरा और तुम्हारा के दहलीज़ को पारकर हम, हमारा, आप और आपका तक पहुँच जाता है। तब शायद हम कई दहलीज़ पार कर चुके होते हैं और ऐसा लगता है कि अब शायद वह मित्रता दोबारा हो पाना संभव नहीं है जिस मित्रता में तू या तेरा से बोल चाल हो। शायद इतनी छूट किसी को दे पाना अब संभव नहीं है या इतने क़रीब किसी को ला पाना, अब केवल मतलब और प्रोटोकॉल के हिसाब से संबंध बन रहे हैं।
काश समय का पहिया ऐसा घूमे कि मुझे मेरे वही मित्र फिर से अबे बलवंत तू बस हाँ कर बाकि हम सँभाल लेंगे कहें,
जहाँ कोई मुझे आप से नहीं तू से बात करें कोई बड़े भइयाँ बनकर, बड़ी दीदी बनकर चाचा बनकर, बड़े पिता जी बनकर….
काश मैं सब से छोटा ही बना रहूँ
यूँ बड़े भइयाँ
सर
महोदय
आप
आपको
इन सम्बोधनों से अब उबासी सी आने लगी है।
मुझे मेरा छोटापन लौटा दो
मुझे मेरा बचपना लौटा दो
जहां मैं जगत भाईया ना रहूँ
जहां मैं सब के पहुँच में रहूँ
और सब मेरे पहुँच में हों
मेरे कंधे पर हाथ रखे
मेरा दोस्त बनकर मेरे बालों को सहलाये,
मेरी चेथी पर मारे मेरी ग़लतियों पर
काश वो दिन वो समय फिर लौट आये जब मैं आप ना रहूँ मैं तू और तुम बन जाऊँ