अमरकंटक… तुमान और रतनपुर के खंडहर कलचुरी नहीं कोयतुरी (DYNASTY) वंश के हैं – रमेश चंद्र श्याम.
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज़
अक्ती तिहार सम्पूर्ण छत्तीसगढ़ में शादी व्याह के सन्दर्भ में विशेष महत्त्व रखता है. जन-मन में अक्खा तीज पारंपरिक रूप से सर्वकालिक और सर्वमान्य शुभ लग्न स्वीकार्य है. इस दिन महुआ को बुढादेव में अर्पित किया जाता है और महुए के नए फसल का सेवन प्रारंभ किया जाता है. मेरे दादाजी इक्कीस इक्कीस नग महुए को तीन अलग अलग बांस के सींक में पिरोकर गुली (महुए) के तेल के दिये के लौ में हल्का भूंज कर देवालय में चढाते थे और उसका प्रसाद बाँटते थे. अक्ती से पूर्व नए महुए का सेवन नहीं किया जाता है.
सो … अक्ती के दिन बद्री प्रसाद जी खैरवार…संगठन मंत्री युवा प्र. के बारात में ग्राम जटगा प्रवास का अवसर प्राप्त हुआ. यूँ तो अक्ती दिन के लिए पांच वैवाहिक निमंत्रण प्राप्त हुआ था लेकिन अपने कर्मठ कार्यकर्ता का सम्मान करते हुये और नई जगह भ्रमण के लालसा में जटगा जाना ही तय किया. अन्य निमंत्रण को भाई भतीजों के साथ मैनेज किया. बिल्हा से गंगाराम छेदैहा जी कोनी से समय सिंह गोंड जी और जगदीश प्रसाद सिदार जी तथा लोफंदी से अनिल ध्रुव जी साथ रहे. .
दोपहर में कोनी से निकले. रतनपुर – कटघोरा नेशनल हाइवे पर पाली के बाद कसनिया मोड़ पड़ता है. कसनिया से पेंड्रा के लिए नई और पक्की सड़क निकलती है. यूँ तो पाली से ही प्राकृतिक वन प्रारंभ हो जाता है लेकिन कसनिया से आगे जंगल घने होने लगते हैं. रस्ते में बिंझरा, नगोई और तुमान गाँव पड़ता है. जंगल और पहाड़ के बीच आदिवासियों की छोटी छोटी बस्तिया है. जिसमे गोंडों की बहुलता है. अमरकंटक की मैकल पर्वत श्रृखला का अंश इस क्षेत्र में है
तुमान गाँव का ऐतिहासिक महत्त्व है. तुम्माण नवमी शताब्दी से ग्यारहवी शताब्दी के पूर्वार्ध तक कोयतुरी वंश के राजाओं का गढ़ (राजधानी) था. लेकिन इसे कलचुरी वंश से जोड़ दिया जाता है. वनांचल और पर्वतीय क्षेत्र में कोयतुर लोग ही निवास करते थे और कर रहे हैं. आंग्ल भाषा के लिखने और पढ़ने में भिन्नता की वजह से कोयतुरी कलचुरी होगया है. जैसे लिखते हैं CHALK लेकिन पढ़ते है चाक और लिखते हैं NATURAL लेकिन पढ़ते हैं नेचुरल. पास में ही मातिन गढ़ है जहाँ पहाड़ पर २००० फीट की उंचाई पर मातिन दाई की मूर्ति नहीं आसन है जिसकी पूजा होती है. मातिन दाई गोंडों की पुरखिन है. अमरकंटक के खंडहर कथित कलचुरी वंशीय खँडहर में अब भी गोंडवाना राज चिन्ह हाथी पर सवार सिंह के मूर्ति देखे जा सकते हैं. इस क्षेत्र में कलचुरी राजा और प्रजा के वंशज और उनके संस्कृति के साक्ष्य स्वरुप अवशेष भी नहीं मिलते. जबकि कोयतुर जन और उनके संस्कृति व्यापक रूप से मिलते है. यह तथ्य ही प्रमाण है कि अमरकंटक… तुमान और रतनपुर के खंडहर कलचुरी नहीं कोयतुरी (DYNASTY) वंश के हैं.
दोपहर तीन चार बजे के बीच में हम जटगा (जिला कोरबा) पहुँच गए. जटगा से रोड विभाजित होती है एक दायीं और गुरसियाँ तथा दूसरी बायीं और पेंड्रा की और जाती है. ढलती दोपहरी में मौसम का मिजाज बदला और तेज हवाओं के साथ बरसात ने हमारा स्वागत किया. गर्मी से रहत मिली. बाराती लोग अपने अपने रूचि के अनुसार भ्रमण में निकल गए. गाँव के बाहर पहाड़ी नदी “तान” बहती है. वहीँ नदी के किनारे “तुर्रा” पानी है. हमारे साथ गुड़ाखू के शौक़ीन भी थे. सो वहाँ पहुंचे. तुर्रा पानी का भेद खुला. वहां भूमिगत जल स्रोत से स्वच्छ और शीतल जल बारहों महिना बहते रहता है. जलधार के निचे जल संग्रहण के लिए पक्का कुंड बनाकर निकास के लिए १०० MM का पाइप लगा दिया गया है. एक किनारे “झुलनदाई” का ठाना है. बगल में शिवजी भी विराज मान है. तुर्रा पानी में हाथ मुह धोकर ताजादम हुए.
बस्ती वापस आये तो पता चला कि अभी फलदान की तैयारी चल रही है. फलदान के बाद ही बरात परगहनी होगी तब तक रात हो जायेगी. गाँव वालो से पता चला की पास के ही गाँव में (नाम याद नहीं) देसी हाट लगती है. सो टाइम पास के लिए वहां जाना तय किये. यह भी पता चला कि व्हाँ “पोसना” भी मिलता है. पूछते खोजते गाँव पहुंचे तब तक “मुंधियार” हो गया था. हाट आम बाजार की तरह ही था जहाँ किराना सामान, कपडे, सब्जी भाजी मछली, मुरगी सहित दैनिक उपयोग के सभी सामानों के दूकान सजे थे. एक जगह काफी भीड़ थी वहां जाकर देखा तो लोग बोरी भर भर कर चार के गुठली ( जिससे चिरौंजी निकलता है) तौलाकर सेठ से रुपया ले रहे थे.
बाजार के आखिरी छोर में कुछ महिलायें प्लास्टिक जरीकेन में “पोसना” लेकर बैठी थीं. ग्राहक गण गिलास भर – भर पी रहे थे. पोसना वस्तुतः चावल से बनाया गया फर्मेंटेड पेय है. कार्बोहाइड्रेट के फर्मेंटेशन ( कीण्वीकरण ) से किंचित इथाइल अल्कोहल जनरेट होता है और कार्बन डाई आक्साइड गैस मुक्त होता है. हमने एक एक गिलास नमक के साथ और बिना नमक के साथ टेस्ट किया. नमक के साथ मसाला छाछ का स्वाद और बिना नमक के “मही” जैसा स्वाद मिला. लोगों ने बताया कि पोसना देशी बियर की तरहहै जो गर्मी में शीतलता प्रदान करता है और पाचन तंत्र के लिये फायदेमंद होता है.
वापस जटगा लौटे तो बरात परगहनी की तैयारी चल रही थी. सहेतरूजी…. दुल्हे के मौसाजी अगुवाई कर रहे थे. पारंपरिक बरात परगहनी और समधी भेंट हुई. पर्रा पीटने और बारातियों को लाल भाजी खिलाने का रस्म भी निभाया गया. लालभाजी का रस्म तो अब गुडेरिया चिरई हो गया है. ठेठ गंवई परिवेश में विलुप्त होती रस्मो को भरपूर एन्जॉय किये. इसकेलिए बद्रप्रसाद खैरवार जी को धन्यवाद और सुखद और सफल दाम्पत्य जीवन के लिए शुभकामनाएं. वो
भोजन के पश्चात सहेतरू जी को जिम्मेदारी सौपकर बिलासपुर वापसी के लिए रवाना हुए. रात एक बजे घर पहुचे.
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(रमेश चंद्र श्याम )
जिला अध्यक्ष

