प्रकृति और रूढ़ि परंपरा का उत्सव: हिचाड़ नार में हर परिवार में हर्षोल्लास से मनाया गया- आमूस पंडूम,भाजी जोगानी पर्व
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
हिचाड़ (चिचाडी) गांव में कोयतोर जीवन दर्शन और प्रकृति के गहन संबंध को प्रतिबिंबित करते हुए आमूस पंडूम, भाजी जोगानी पर्व को इस वर्ष भी रूढ़िगत पारंपरिक रीति-नीति और उल्लास के साथ मनाया गया। यह पर्व न केवल एक रूढ़ि परंपरा है, बल्कि प्रकृति, सामाजिक एकता और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा का जीवंत उदाहरण भी है। इसी दिन से ही भाजियों की रानी *जीरा भाजी* के साथ अन्य भाजियों को जोगाया (कुसीर पोलहना) जाता है।
कोयतोरों द्वारा बसाए गए गांवों में हर पर्व का मूल प्रकृति में निहित होता है। गांव की रुढ़िगत परंपरा, सामाजिक संरचना के अंतर्गत हर समुदाय — जैसे गोंड/मुरिया, राउत, लोहार, गांडा, कलार, मरार आदि समुदायों को जिम्मीदारिन याया, बुमयार के मार्गदर्शन में सौंपी जाती हैं, जो उन्हें गांव की पेन-पुरखाओं (जिम्मीदारिन याया, बुमयार, भीमाल एवं अन्य पेन पुरखा) की मार्गदर्शन व आशीर्वाद से प्राप्त होती हैं।
यह आमुस पर्व आषाढ़ महीने की अंधियारी में मनाया जाता है, जब खेतों में फसलें पनप रही होती हैं और मानसून का असर पशुधन व मनुष्यों पर भी दिखता है। इस अवसर पर आजी, दादी और सगा-समधान के द्वारा छोटे बच्चों को सुबह-सुबह आंकते हैं, गाय-बैलों को टीका लगाते हैं, जिससे बीमारियों और बुरी शक्तियों से बचाव हो सके। किसान हर खेतों में भेलवां (कोहका) पत्ता एवं शतावरी/छेदावरी पौधे को गाड़ता है जिससे खेत में फैलने वाली कीट पतंगों एवं अन्य बीमारियों से बचाव किया जा सके।
*देशी औषधीय परंपरा: रसना जड़ी और छेदावरी/शतावरी का महत्व*
जब से कोयतूर गांव बसता है तब से कोपा (राउत) समुदाय द्वारा इस दिन रसना जड़ी और छेदावरी पौधे की जड़ी से विशेष औषधि तैयार की जाती है। पर्व से एक दिन पूर्व राउत उपवास करता है, जंगल से रसना जड़ी एवं छेदावरी पौधे औषधि संग्रह से पहले जिम्मीदारिन याया, बुमयार, भीमाल एवं अन्य पेनों को होमजग देकर अर्जि-विनती कर रसना एवं छेदावरी पौधे की खोदाई करता है। तैयार औषधीय जड़ी बूटियों को सफाई करने के बाद रात भर नये हंडी में पकाकर दवाई तैयार करता है। यह सब पुरखों द्वारा दी गई अद्भुत स्वास्थ्य-संरचना को दर्शाता है। यह औषधीय जड़ी कई प्रकार के फंगश, इंफेक्शन एवं अन्य बीमारियों से बचाव करता है। आमुस के दिन गांव के गायता, पटेल, पुजारी एवं गांव के प्रमुख सियानों के समक्ष गांव के पेन पुरखों की सेवा अर्जी कर सुबह यह औषधीय पूरे गांव (चिचाड़ी, सोड़ापारा, डुरकीपारा, गुड्डरीपारा) में प्रत्येक परिवार को वितरित की जाती है, जिसे गाय-बैलों, मनुष्यों को खिलाया जाता है एवं जड़ी के रस को घरों व बैल कोठा के छतों पर छिड़काव किया जाता है।
लोहार (वाडे) समुदाय इस दिन हर घर के चौखट और मूसर पर लोहा खिला ठोंकता है, जिससे बाहरी नकारात्मक शक्तियाँ घर व गांव में प्रवेश न कर सकें। बुजुर्ग सियानों के बताये अनुसार मान्यता है कि लोहार आमूस के दिन जरूर स्नान करता है, क्योंकि आमुस के दिन उनका गौरवान्वित और पहचान का दिन होता है। लोहार को अपने पुरखों से चली आ रही रूढ़ि परंपरा को निभाना है।
आमुस के दिन, राउत के द्वारा, हर घर के सामने भेलवां और छेदावरी के पत्ते खोंचता है, जिससे फंगश, इंफेक्शन, बीमारियों से बचाव होता है। इस दिन गांव के सभी पेनों, माटी, कृषि औजार, मवेशी, खेत, प्रकृति को सम्मान दिया जाता है। यह पर्व गांव की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का प्रतीक है। इसी दिन से ‘गेड़ी (डिटोंग/गोड़ंदी) में चलना’ भी प्रारंभ होता है, जो आगे नवाखानी पर्व (महापर्व पुनांग तिंदना पंडुम) तक चलता है।
आमूस पर्व हमें बताता है कि प्रकृति, रूढ़ि परंपरा और पुरखों के ज्ञान में ही जीवन की रक्षा निहित है। यह पर्व जंगलों, औषधियों, पशुधन और गांव व्यवस्था को एकसूत्र में बांधता है। इसीलिए आज भी बाहरी धार्मिक-आधुनिक प्रभावों के बावजूद यह कोयतोर संस्कृति में अक्षुण्ण रूप से जीवित है। इस पर्व के माध्यम से गांव-गांव में स्वास्थ्य, आस्था और सामूहिकता का संदेश फैलता है। गांव के प्रत्येक परिवार अपने पेन पुरखाओं की सेवा अर्जी विनती करते हुए बड़े हर्षोल्लास से मनाते हैं। क्षेत्रीयता अनुसार रूढ़ि परंपरा में आंशिक भिन्नता हो सकता है। लेकिन उद्देश्य एक ही है- प्रकृति आधारित पंडुम, परंपरा को संरक्षित करना है। तभी दुनिया एवं मानव जीवन सुरक्षित रहेगा।
सभी को आमूस पंडुम की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। जय जोहार, सेवा जोहार!

