जोहार फिल्म्स प्रोडक्शन C.G. की पहली फिल्म “ दंडाकोटुम” की सूटिंग अबूझमाड़ में पारंपरिक पेन सुमरनी के साथ प्रारम्भ
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
जोहार फिल्म्स प्रोडक्शन C.G. की पहली फिल्म “ दंडाकोटुम” की सूटिंग अबूझमाड़ में पारंपरिक पेन सुमरनी के साथ प्रारम्भ… गोंडी भाषाविद और गोंडी संस्कृति के पितामह शेरसिंह आचला और पद्मश्री पंडीराम मंडावी भी दिखेंगे परदे पर….
गत रविवार का दिन अबूझमाड़ के डरे सहमे आदिवासियों के जीवन में एक अजीब रोमांच के साथ अमिट छाप छोड़ गया जब फ़िल्मी दुनिया के तकनीशियनों और कलाकारों के साथ दर्जनों मोटर गाड़ियों ने जंगल के डरावने सन्नाटे को उत्सव और उत्साह के माहोल में बदल दिया. ये अवसर था निर्माता रमेश चन्द्र श्याम की “जोहार फिल्म्स प्रोडक्शन C.G.” के बैनर तले बनने वाली पहली फिल्म “दंडाकोटुम” के मुहूर्त शॉट का. इस फिल्म के लेखन, निर्देशन और मुख्य भूमिका में छत्तीसगढ़ के स्टार कलाकार अमलेश नागेश हैं.
महीनो के तैयारी के बाद. पटकथा, संवाद, वेशभूषा, तत्कालीन और समकालीन परिदृश्यों पर रिसर्च के उपरांत जानकार लोगो के साथ विचार विमर्श कर फिल्म का ब्लू प्रिंट तैयार किया गया. कथानक के अनुकूल शूटिंग लोकेशन की खोज की गई. और दंडाकोटूम के युवा टीम ने तमाम जोखिमों और दुर्गम भौगोलिक स्थितयों को सामना करने का दृढ निश्चय कर अबूझ मांड अंदरूनी गाँवों का चयन किया.
सम्बंधित मंत्रालय से औपचारिक अनुमति ली गयी. स्थानीय जिला प्रशासन और पुलिस प्रशासन से भी सहयोग और सहमति ली गयी. सबसे अधिक मेहनत स्थानीय लोगों को विश्वास में लेने में लगा. अबूझ माड़ अब भी अबूझ है और अभेद्य है. मुख्य सड़क निर्माणाधीन है जो कारों के लिए उपयुक्त नहीं है. बसाहट मुख्य सड़क से अंदर जंगल में है जहाँ पैदल ही पहुचा जा सकता है. बोली न हम समझ पाते थे न वे हमारी बातें. ऐसी स्थिति में उस क्षेत्र के जाने माने और गोंडी और मुडिया भाषा जानने वाले दादा शेरसिंह आचला और दादा पंडीराम मंडावी माध्यम बने. नारायणपुर में गोंड समाज और मुडिया समाज के प्रमुखों के साथ बैठके हुई. फिर गांवों के गायता / सिरहा लोगों के साथ गांवों में ही रात में बैठके हुई. उनके चलागत के अनुसार जिमिदारिन याया और भुमियार डोकरा का पूजा किया गया. उन्हें अपने गाँवों में न सिर्फ फिल्म के सूटिंग की सहमति देने बल्कि सूटिंग में भाग लेकर फिल्म के हिस्सा बनने के लिए भी समझाया गया.
कुछ युवा लोग जो शहरो में रहकर पढ़ते हैं उन्हें यह बताया गया कि अब तक आप लोग मोबाईल और थियेटर के पर्दों पर लोगों को देखते हैं, आनेवाले दिनों में दुनिया आप लोगों को और आपके गावों को देखेगी. यह बात लोगों को जंच गयी और वे उत्साह पूर्वक फिल्म में काम करने के लिए तैयार हो गए.
और इस तरह से प्रोजेक्ट दंडाकोटुम का पारंपरिक बाजे गाजे के साथ जोशीला हुआ. जंगल में स्थापित सुरक्षाबलों के कैंपों ने इस पहल गर्मजोशी से का स्वागत किया.


