विधिक एवं संवैधानिक इतिहास – मद्रास तथा बम्बई में सुप्रीम कोर्ट की स्थापना
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
(मद्रास और बम्बई में सर्वोच्च न्यायालयों की स्थापना)
सन् 1773 के रेग्यूलेटिंग एक्ट तथा सन् 1781 के बन्दोबस्त अधिनियम (एक्ट ऑफ सेटिलमेंट) के प्रभाव के कारण बंगाल, बिहार व उड़ीसा प्रान्तों के न्यायिक प्रशासन में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए जो विधि की दृष्टि से आवश्यक थे। परन्तु मद्रास और बम्बई की न्याय व्यवस्था अभी भी सन् 1726 तथा सन् 1753 के चार्टर के अन्तर्गत लागू की गई न्यायिक योजना के अनुसार ही थी। अतः इन प्रदेशों की बढ़ती हुई जनसंख्या तथा व्यापारिक प्रगति को देखते हुए वहाँ कार्यरत दीवानी न्यायालयों की संख्या अपर्याप्त प्रतीत होने लगी तथा कार्य की अधिकता के कारण में न्यायालय उचित न्याय देने में असमर्थ थे। जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है, मेयर कोर्ट में कार्यरत न्यायाधीश विधि सम्बन्धी प्रक्रिया में अनुभवहीन तथा अप्रशिक्षित होने के कारण पेचीदे मामलों को उचित रूप से नहीं निपटा पाते थे। अतः सर्वप्रथम वह आवश्यकता अनुभव की गई कि इन न्यायालयों के न्यायाधीशों को विधि एवं न्याय-शास्त्र का पर्याप्त ज्ञान तथा अनुभव होना चाहिए। आपराधिक न्याय प्रशासन की भी यही स्थिति थी क्योंकि यह कार्य गवर्नर तथा उसकी परिषद् के सदस्यों को सौंपा गया था तथा वे अपने सामान्य प्रशासनिक कार्यों के अतिरिक्त फौजदारी के मामले भी निपटाते थे। परन्तु जनसंख्या में वृद्धि तथा व्यापारिक विकास के कारण अपराधों की संख्या भी इतनी अधिक बढ़ गई कि गवर्नर तथा कौंसिल (Governor in Council) के लिए फौजदारी मामले निपटाने के लिए पर्याप्त समय नहीं रहता था। फलतः यह अनुभव किया गया कि न्याय प्रशासन की फौजदारी शाखा के लिए भी विधि तथा न्यायशाख में पारंगत पूर्णकालिक न्यायाधीशों की नियुक्ति की जानी चाहिए।
सन् 1791 में मद्रास के गवर्नर की कौंसिल ने कम्पनी के इंग्लैण्ड स्थित निदेशक मण्डल (Board of Directors) की तत्कालीन न्याय व्यवस्था सम्बन्धी कठिनाइयों से अवगत कराते हुए दीवानी तथा फौजदारी न्यायालयों में विधि में दक्ष तथा अनुभवी न्यायाधीशों की नियुक्ति किये जाने की प्रार्थना की। उसने कम्पनी के निदेशकों को यह सुझाव भी दिया कि मद्रास के न्यायालयों को कलकत्ता के सुप्रीम कोर्ट के अधीनस्थ रखा जाए जिससे अपीलें इंग्लैण्ड की बजाय कलकत्ता को भेजी जा सकें तथा वास्तविक विवादियों को उचित न्याय मिलने में विलम्ब न हो।। इसके परिणामस्वरूप सन् 1797 में ब्रिटिश संसद् ने एक अधिनियम पारित किया जिसके अन्तर्गत ब्रिटिश संसद् को अधिकृत किया गया कि वह चार्टर जारी करके मद्रास तथा बम्बई में मेयर कोर्ट के स्थान पर प्रत्येक के लिए रिकार्डर्स कोर्ट (Recorder’s Court) स्थापित करे। 1 फरवरी, सन् 1798 में तत्कालीन ब्रिटिश सम्राट जॉर्ज तृतीय ने मद्रास तथा बम्बई में रिकार्डर के कोर्ट (अभिलेख न्यायालय) को स्थापना किये जाने हेतु राजपत्र (Charter) जारी किया। मद्रास के रिकार्डर कोर्ट ने नवम्बर सन् 1798 से कार्य करना प्रारम्भ किया तथा बम्बई का रिकार्डर कोर्ट भी लगभग इसी समय स्थापित हुआ।
रिकार्डर्स कोर्ट (Recorder’s Court)
मद्रास तथा बम्बई के रिकार्डर्स कोर्ट (Recorder’s Court) में एक मेयर, तीन एल्डरमेन तथा एक रिकार्डर नियुक्त किया गया था। वस्तुतः रिकार्डर ही इस न्यायालय का वास्तविक न्यायाधीश होता था जिसकी नियुक्ति कम्पनी द्वारा न की जाकर ब्रिटिश सम्राट द्वारा की गई थी। रिकार्डर के पद पर नियुक्ति के लिए पाँच वर्ष का बैरिस्ट्री का पूर्वानुभव होना आवश्यक था। रिकार्डर को वे सभी दीवानी, फौजदारी, धार्मिक तथा
1. फॉसेट (Fawcett)- फर्स्ट सेंच्युरी इन ब्रिटिश इण्डिया’, पृ० 226-27.
2. 37, जॉर्ज तृतीय, पृष्ठ 142.
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