जामडी पाटेश्वर धाम के नाम पर एक फिर आदीवासी समाज के भीतर में बवाल की आशंका
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
सर्व आदीवासी समाज, जिला बालोद छत्तीसगढ़ ने दिनांक 20/05/2026 दिन बुधवार जिला के सभी स्तर के समाजिक संगठनों की तत्काल बैठक का आयोजन गोंडवाना सामुदायिक भवन डौंडीलोहारा में संभव किया जाना तय है। सर्व आदीवासी समाज जिला बालोद की माने तो जिला स्तरीय बैठक आहूत करने का मकसद दिनांक 17 मई 2026 से लेकर 15 जून 2026 तक चलने वाला जामडी पाटेश्वर धाम के भीतर आयोजित बाबा बालक दास का वह कार्यक्रम है, जिसे वह स्वंय अपने मुख से समाजिक व धार्मिक चेतना का नाम देकर छत्तीसगढ़ के समाज प्रमुखों के समक्ष मानवता और इंसानियत का महा संगम बताने से बाज नहीं आ रहा है, जबकि यही बाबा बालक दास आज से कुछ बरस पहले इस क्षेत्र में अपना कब्जा बनाने के उद्देश्य से आदीवासी समाज के द्वारा की गई रूढ़िवादी प्रथा को निष्ठा नाबूत करते हुए निर्दोष और निहत्थे आदिवासियों पर जानलेवा हमला करवाया था। सोंचिए जो बाबा संत संत और त्यागी होता है क्या वह ऐसे दुर्दांत कृत्य को कभी कर सकता है क्या? क्योंकि संत ज्ञानी और त्यागी तो साक्षात ईश्वर के सामान होता है उसे ना तो जमीन का लोभ हो सकता है और ना ही किसी जमीन के लिये निर्दोष आदीवासी पर गुंडों के जरिये गुंडागर्दी करने की जरूरत पड सकती है। बावजूद इसके जामडी पाटेश्वर धाम के भीतर में रहने वाला एक तथाकथित संत ने यह धर्म के आड में कर दिखाया और गरिब निहत्थे आदीवासीयों को दौडा दौडा कर मरवाया फिर उनकी हक और अधिकार के क्षेत्र में अपना डेरा डालकर बैठ गये। सनद रहे जांमडी पाटेश्वर धाम संविधान के अनुरूप पांचवी अनुसूची क्षेत्र के दायरे में आता है जहां पर ग्राम सभा की अनुमति किसी भी कार्य के लिए अनिवार्य माना गया है। इस बिच देश के कानून और संविधान के मुताबिक पांचवी अनुसूचि क्षेत्र में यदि कानून और संविधान के मुताबिक बनाई हुई नियमों की अनदेखी होती है तो उसका जवावदेह शासन और प्रसासन को माना जाना चाहिए। बाबा बालकदास का सियासी जमात के रसूखदार नेताओं के साथ बेहतरीन संबध है जिसके चलते नियम और कानून को दरकिनार करते हुए जिला प्रसासन बालोद के जिम्मेदार और जवाबदेह प्रसानिक अधिकारी भी बाबा के हर काम में साथ देते हुए दिखाई देते है। वंही बाबा बालकदास के आंतक से पिडित गरीब आदीवासियों की ओर झांकने वाला कोई नहीं है। बीते कई सालों से तुझे गोंडी से ताल्लुक रखने वाले लगभग एक दर्जन गांव बाबा के चलते कोर्ट और कचहरी का चक्कर लगा रहे हैं जबकि बाबा इनके गांव में आकर खुद उनके संरक्षण हेतु बनाई गई हुई कानून को तहस-नहस कर उनके जल जंगल और जमीन पर कुंडली मारकर बैठे हैं।
“संत की आड़ में सत्ता का नशा ?”
गरीब, निहत्थे और मेहनतकश आदिवासियों पर हमला करवाने वाले आखिर किस प्रकार के “बाबा” हैं ? जिस व्यक्ति के भीतर मानवता मर चुकी हो, जो अपने प्रभाव और भीड़ के दम पर कमजोर लोगों को डराने-धमकाने का प्रयास करे, उसे संत कहना ही संत समाज का अपमान है।
एक सच्चा संत प्रेम, करुणा, शांति और न्याय का मार्ग दिखाता है, लेकिन यहां तो मामला बिल्कुल उल्टा नजर आ रहा है। जिन आदिवासी परिवारों ने सदियों से जंगल, जमीन और अपनी संस्कृति को बचाकर रखा, उन्हीं गरीब आदिवासियों पर अत्याचार करवाना यह साबित करता है कि कुछ लोगों के भीतर अहंकार इतना भर चुका है कि उन्हें इंसानियत तक दिखाई नहीं दे रही।
बाबा बालक दास को यह समझ लेना चाहिए कि आदिवासी समाज अब डरने वाला नहीं है। अब वह जमाना चला गया जब गरीब और सीधा-सादा आदिवासी अन्याय सहकर चुप बैठ जाता था। अब हर अन्याय का जवाब संगठित आवाज से दिया जाएगा।
सर्व आदिवासी समाज बालोद का अपने आदिवासी भाइयों के समर्थन में मजबूती से खड़ा होना यह साफ संकेत है कि अब पूरा समाज एकजुट हो चुका है। किसी भी आदिवासी पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं माना जाएगा, बल्कि पूरे समाज की अस्मिता और सम्मान पर हमला समझा जाएगा।
जो लोग धर्म और संताई की आड़ में दहशत फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इतिहास गवाह है — जब-जब कमजोरों पर अत्याचार बढ़ा है, तब-तब समाज ने अत्याचारियों के खिलाफ आवाज बुलंद की है। आदिवासी समाज अब न्याय की लड़ाई में सीना तानकर खड़ा रहेगा और अन्याय के खिलाफ हर मोर्चे पर संघर्ष करेगा।
“संत वही जो मानवता बचाए,
जो गरीबों पर वार करे, वह संत नहीं अत्याचार का व्यापारी कहलाए।”

