UNIFORM CIVIL CODE समान नागरिक संहिता के दायरे से गोंड़ समाज सहित सभी ट्राइबल्स बाहर रखा जाए …. रमेशचंद्र श्याम
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
छत्तीसगढ़ राज्य में विभिन्न व्यक्तिगत तथा पारिवारिक विधियों के अंतर्गत विवाह, विवाह-विच्छेद, भरण पोषण, उत्तराधिकार एवं अन्य सम्बंधित विषयों का संचालन पृथक-पृथक प्रावधानों के अनुसार किया जा रहा है। इन विधियों का समग्र परीक्षण कर एक समरूप, संतुलित एवं व्यवहारिक विधिक संरचना विकसित करने के लिये समान नागरिक संहिता की जरूरत है.. सरकार की ऐसी मान्यता है।
इसलिए यूनिफार्म सिविल कोड.. समान नागरिक संहिता की मसविदा तैयार करने के लिए उच्च स्तरीय ड्राफ्ट कमिटी का गठन किया गया है। इस पाँच सदस्यीय कमिटी में अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) माननीया रंजना प्रकाश देसाई, श्री शत्रुघ्न सिंह सेवा निवृत्त आई. ए. एस. सदस्य, एम. के. राउत, सेवा निवृत्त आई. ए. एस. सदस्य, श्री मोहन पवार वरिष्ठ अधिवक्ता सदस्य, एवं ज्योति रानी सिंह सेवा निवृत्त प्राचार्य महिला सदस्य हैं। यह कमिटी अलग अलग क्षेत्रों में सामूहिक चर्चा कर आम जन की विचार जानने की कोशिश कर रही है। इसी क्रम में बिलासपुर में संभाग स्तरीय जन संवाद का आयोजन किया गए था। यह आयोजन पहले 30 अक्तूबर को प्रस्तावित था। लेकिन मुस्लिम जमात द्वरा जुमा के दिन और समय को छोड़कर अन्य दिन करने के आग्रह पर 28 अक्तूबर मंगलवार को रखा गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में श्री शत्रुघ्न सिंह ने सन 1000 ईस्वी से लेकर मुगल शासन कल और आगे ब्रिटिश रूल तक पारिवारिक और निजी कानून के विकास और बदलाव क्रम को संक्षेप में सभा से साझा किया। और चार बिंदुओं 1. विवाह 2. विवाह विच्छेद और भरण पोषण, 3 उत्तराधिकार, और 4. लीव – इन रिलेशनसीप (रखैल) पर खुली बहस के सभा में छोड़ दिया। लोगों ने खुल कर अपने विचार रखे जिसकी वीडियो रिकार्डिंग भी की गई। मुस्लिम समाज ने समान नागरिक संहिता के प्रति असहमति जताई, लीव इन रिलेशनशिप को मान्यता देने की खिलाफत की।
छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड़ महासभा के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष ने कहा कि गोंड़ समाज सहित सभी ट्राइबल कम्युनिटी को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जाए। क्योंकि जनजातीय वर्ग में कठोर सामाजिक कानून है। विवाह, विच्छेद, सहित अन्य सामाजिक विवादों और समस्याओं का सियान लोग आपस में मिल बैठकर व्यावहारिक और मान्य समाधान सुझाते हैं। जिससे आर्थिक रूप से कमजोर लोग कोर्ट कचहरी के अनावश्यक और खर्चीले चक्कर से बच जाते हैं। आदिवासियों की अपनी सामुदायिक सह जीवन के साथ विशिष्ट कबिलाई प्रणाली एक आदिम जीवन पद्धति है जो चिरंतन है निरंतर है और समयानुसार अद्यतन भी है। उनके LAND, LANGUAGE, customary LAW, FAITH AND FESTIVALs जिसे संस्कृति कहा जाता है उन्हें अन्य से विशिष्ट बनाते हैं। अन्य समाज के साथ उन्हे एक ही कानून में बांधना उनकी विशिष्टता को समाप्त करना होगा। उन्होंने आगे कहा कि जिस तरह से उत्तराखंड में आदिवासी समाज को समान नागरिक संहिता से बाहर रखा गया है और मा. गृह मंत्री भारत गणराज्य मा. अमित शाह जी ने सार्वजनिक रूप से घोषित किया है, तदनुरूप छत्तीसगढ़ में भी जनजातीय वर्ग को समान नागरिक संहिता के दायरे से बाहर रखा जाए.
लीव-इन रिलेशनशिप को मान्यता और प्रोत्साहन का विरोध करते हुए उन्होंने समिति के सदस्यों को संबोधित करते हुए कहा “ आप लोग भी माता पिता हैं.. सोचिए …. जिन्हें आपने दिन रात मेहनत करके पढ़ाया लिखाया कमाने खाने लायक बनाया, उन्होंने माता पिता, घर परिवार, और समाज की अवहेलना कर मनमर्जी की .. घर छोड़ दिया.. उसके लिए सोचना उन्हे बढ़ावा देना है। इस विचार पर
लगभग पूर्ण सहमति बनी।


