दिन देवारी,ईसर गवरा विवाह
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज
प्रां महासचिव गो.ध.सं.सं.समिति
आदिकाल ले आदिवासी समाज समुदाय सबो ग्रामीण शहरी सबो खेती किसानी ले आश्रित हर ल बड़ा धूम धाम ले मनावत आवत हन।हर परब ल मनाय के पाछू कुछ न कुछ रहस्य जरूर रहिथे।
हमर छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढ़िया मूल परब म हरेली, तीजा,पोरा,भोजली,नवापानी खाई,दसहरा,देवारी,गौधन पूजा होरी ये परब ल हम सबो जूर मिल के मनावत आवथन।
देवारी के पहिली घर के साफ सफाई लिपई पुतई काबर करथन दीया काबर जलाथन गोंडवाना मूल म आवव जानन।
हम गोडियन जन खेती से जुड़े हन त अषाढ़ म खेत म बीज डाँथन,सावन म बियासी निदई गुड़ई इही फसल कुंवार कार्तिक मे पक के तैयार रहिथे इही अन्नपूर्णा माता जेकर से साल भर हमर अऊ समस्त जीव के भरण पोषण होथे।उही अन्न पूर्णा लक्ष्मी के आगमन होना रहिथे तेकर अगवानी मे घर कोठी डोली ल साफ सफई करके लिपई पोतई करे जाथे।ओकर बिहान दिन गौ माता जो भी पालन हार हरे,त नवा चांऊर के खिचरी एकम के चंदा देख के खवाय जाथे,राऊत मन सुघर सोहई बांधते।
चुंकि शंभू मूला सृष्टि के प्रथम दाई ददा हरे तेला ईसर महादेव गवरा माता के रूप दोनों के बिहाव रचा के नर नारी प्रकृति अऊ पुरूष सृष्टि उत्पत्ति के रूप म मनावत आवथन मनावत रहिबो।जेमा गांव के समस्त देवी देवता शीतला महामाया धन्नई,कोदई,कुसार माई,इक्कीसो माता, चौंसठ जोगनीं, सिद्ध बाबा, ठाकुर देव,अखरा देव,राऊतराय,सांहड़ा देव, ए सब प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष बिहाव म शामिल रहिथे ।हमला नशा पान त्याग के आपसी प्रेम भाईचारा के भावना ले ए परब ल मनाना चाहिए।
ईसर महादेव गवरा माता सृष्टि पिता सृष्टि माता के बिहाव अऊ धन दाई अन्नपूर्णा माता के अगवानी म गांव देहात शहर सबो जगह गगन मगन ले घर द्वार ल लिप पोत के दिया जलाके इही शक्ति म के स्वागत ल करथन।जो प्रमाणित हे।धन अऊ ऋण दाई अऊ ददा से सृष्टि के निर्माण अर्थात वंश उत्पत्ति अऊ धन अर्थात अन्न पूर्णा माता से भरण पोषण होथे।जो पूर्ण रूप ले प्रकृति से लगाव हे।
आदिवासी गोडियन जन म ईसर गवरा बिहाव के बाद ही अपन लोग लईका के मंगनी जचनी लेन देन शादी बिहाव के प्रक्रिया ल शुरू करथे।
गोंडियन आदिवासी समाज सबो परब के विशेष महत्व हे पर देवारी ह खास रहिथे।ये दिन हम अपन ईष्ट ईसर महादेव संग माता गवरा माता के बिहाव करथन जेन परा रीति नीति परंपरा के साथ मनाय जाथे।गांव के दाई बहिनी मन सिरजे के पहिली बिहिनिया देवठाना ले बाजा गाजा गवरा माटी लाथे,संझवती ददा भाई सिरजाथे,रात भर नाचत गावत रात जागरण कथे सुबह सरवर स्नान कराय जाथे।इही ईसर गवरा दाई के बिहाव और ईसर महादेव के दुल्हा राजा के सिंगार करके आये के कारण घरो घर दिया जला के स्वागत करथन।
लईका,महतारी, ईसर गवरा बिहाव के खुशी म पहिली ले सुआ नाचे के शुरू कर देथे।काबर गोडियन आदिवासी संस्कृति के मुख्य पहिचान सुआ ,करमा,ददरिया हरे इही नृत्य, गीत,भाव आज देश विदेश म भाव रूप चित्र के रूप मे प्रचारित हे।प्रकृति ही मूल हे एकरे से संपूर्ण सृष्टि के जीव जगत आश्रित हे।प्रकृति नही त सृष्टि नही।
जय सेवा जय बुढ़ादेव जय जोहार

