5 जून विश्व पर्यावरण दिवस और आदिवासी* —-
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज
लेख – आर .के.कुंजाम
प्रां महासचिव गो. ध.सं. सं. सं. छत्तीसगढ़
*विश्व पर्यावरण दिवस*
आज पर्यावरण को बचाने विश्व स्तर पर 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। बहुत ही अच्छी पहल है।पर क्या विश्व के नेता, वैज्ञानिक, शोधकर्ता, पर्यावरण विद जानते हैं कि आदिवासी और पर्यावरण एक दूसरे के पूरक हैं।
आदिवासी जंगलो में निवास करने के साथ-साथ प्रकृति संरक्षक भी और जंगलों की रखरखाव देखरेख करते हैं क्योंकि आदिवासी जीवन यापन प्रकृति और जंगलों से मिलने वाले कंद मूल फल फूल और औषधि महत्वपूर्ण है। जंगल से मिलने वाले विशेष जड़ी बूटी से ही आयुर्वेदिक उपचार के साथ मेडिसिन भी बनाया जाता है। पर्यावरण वातावरण में शुद्धता, आक्सीजन की उपलब्धता सब जंगलों, पेड़ पौधों और वनस्पतिओ पर निर्भर है। जिसके संरक्षण आदिवासियों द्वारा होता है।
पर आज सरकार विभिन्न कंपनियों, उद्योग धंधों के लिए जंगलों को नष्ट किया जा रहा है।वह अलग बात है जंगल साफ कर पेड लगाना उतना महत्व नहीं है जितना जंगलों को सुरक्षित रखना।
आज पर्यावरण प्रदुषण बढ़ रहा है, जिसका मुख्य कारण उद्योग धंधों, कंपनियों, चिमनियों से निकलने वाली धुआं, गाड़ी से निकलने वाली धुआं , कंपनियों से निकलने वाली गंदे बदबूदार पानी नदियों के साथ वातावरण को दूषित कर रहे हैं।
जंगलों को नष्ट कर सौ पेड़ लगाना कहां का न्याय है। बढ़ती जनसंख्या और विकास की होड़ में जंगल नष्ट किए जा रहे हैं।जो पर्यावरण के लिए जीव जगत के लिए भविष्य में भारी खतरा साबित हो सकता है।
आज ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ना, तापमान में वृद्धि,असमय प्राकृतिक आपदा ये सभी पर्यावरण के दूषित होने का ही परिणाम है।जिसका कारण स्वयं मानव है।
जंगलों का विनाश के कारण आये दिन जंगली जानवर की संख्या में कमी तथा जंगलों को छोड़कर आबादी, गांवो में आना मनुष्य को फसलो को हानि पहुंचाना भी जंगल नष्ट करने के कारण ही होता है।
आज राजनीति दल जंगलों को संरक्षित करने के बजाय एक दूसरे पार्टियो नेताओं पर आरोप प्रत्यारोप बस करना जानते हैं। पर्यावरण को शुद्ध रखना है तो जंगलों को बचाना होगा।गांव गांव शहर शहर हर रोड़ किनारे हर बाड़ी,खेत के मेड़ मैदानी भागों में पेड़ लगाना होगा। जंगलों में निवास करने वाले आदिवासियों को सुरक्षित रखना होगा।
आज शासन प्रशासन द्वारा पेड़ लगाने कई योजनाएं निकाला जाता है पर मात्र कागज तक सीमित रहता है। ऐसी जगह पेड़ लगाते हैं जहां पानी की व्यवस्था नहीं , न ही देख भाल न रखरखाव। क्या ऐसे में पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।
सोचो विश्व पर्यावरण दिवस कब से मनाया जा रहा है,कितने पेड़ लगाये गये और कितने आज सुरक्षित है जीवित हैं शासन प्रशासन क्या इनका निरक्षण कर्ता है ? नहीं।
मात्र दिखावा विश्व पर्यावरण दिवस मनाने , मात्र कुछ पेड़ लगाकर फार्मेल्टी पूरा करने दिखाने से विश्व पर्यावरण दिवस मनाना सार्थक नहीं है। कहने का मतलब प्रकृति है,तो पर्यावरण है , पर्यावरण शुद्ध है तो संपूर्ण मानव जाति के साथ संपूर्ण जीव जगत आधारित है। अतः इमानदारी से जंगलों की रक्षा करें। जंगलों को सुरक्षित रखने वाले आदिवासियों को संरक्षित करें। कंपनियों को उद्योगो के लिए जंगलों को नष्ट न करें।पेड़ पौधे लगाकर रखरखाव करें। जहां पेड़ लगाया जा रहा है पहले वहां पानी और देखरेख की व्यवस्था करें। तभी सार्थक होगा।और ईमानदारी से करें। पर्यावरण के नाम से निकलने वाले राशि का दुरूपयोग बंद हो मानव जीवन के साथ जीव जगत के साथ खिलवाड़ न करें।
प्रकृति है,तो पर्यावरण है पर्यावरण है तो जीवन है। आदिवासी है तो जंगल है, जंगल है तो पर्यावरण है।
जय सेवा जय बुढ़ादेव जय जोहार

