छत्तीसगढ़

गढ़ लिमहा में गोंड राजे शंकरशाह रघुनाथ शाह को दी गई श्रद्धांजलि.

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जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज 

लिम्हा (बेलतरा) विकासखंड बिल्हा जिला बिलासपुर यूँ तो छोटा सा गोंडवाना गाँव है लेकिन आदिम संस्कृति के प्रखर पक्षधर है. जनजातीय महत्त्व के विभिन्न अवसरों पर सांस्कृतिक आयोजन करता रहता है. यह सब दादा हीरासिंह मरकाम के गोंडवाना समग्र क्रांति के समर्पित सहयोगियों में से एक डॉ. एम्. सिंह खुशरो के निरंतर प्रयासों से संभव हुआ है. उन्ही के सौजन्य से १८ सितम्बर को महाराजा शंकर शाह मंडावी और युवराज रघुनाथ शाह मंडावी के सर्वोच्च बलिदान को स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया.
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि रहे रमेश चन्द्र श्याम कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष छत्तीसगढ़ गोंडवाना गोंड महा सभा, विशिष्ट अतिथियों में सर्व श्री छेदीलाल नेताम, संरक्षक गोंडवाना समाज सीपत परिक्षेत्र, घनश्याम खुशरो सचिव शिव चरण जगत कोषध्यक्ष रहे श्रीमती प्रमिला मरावी. कार्यक्रम की अध्यक्षता श्री फाग सिंह सरोतटे व्याख्याता ने की. श्रीमती प्रमिला मरावी को लिम्हागढ़ गोंडवाना किला का सर्व सम्मति से उत्तराधिकारी “रानी” मनोनीत किया गया. सम्मानित सगाजनो में सर्व श्री / श्रीमती गेंद्बाई टेकाम, बेबी कोर्राम, सोरते, , अन्गिता सोरते, प्रमिला मरावी, रमाशंकर सिंह तंवर, कीर्ति कुमार सरोटीया सहितअनेको लोग उपस्थित रहे.
प्रसंगवश महाराजा शंकरशाह और युव्राज्शाह की संकलित जानकारी प्रस्तुत है….
तेरहवीं सदी के पूर्वार्ध में एक वीर योद्धा जादों राय (यदु राय) ने गढ़ा- कटंगा क्षेत्र जबलपुर में गोंड राजवंश की नींव रखी। कालांतर में यह साम्राज्य गोंडवाना साम्राज्य के नाम से जाना गया। आगे चलकर सोलहवीं सदी में राजा संग्राम शाह मंडावी का राज्याभिषेक हुआ. संग्राम शाह के पुत्र दलपत शाह… उनकी रानी दुर्गावती हुई. २४ जून १५६४ में वीरांगन दुर्गावती के प्राणोत्सर्ग के समय पुत्र नारायण शाह के अबोध बालक (जिन्हें रानी पीठ के पीछे बुकिया बाँध कर युद्ध करती थीं) होने के कारण उनके देवर चन्द्र शाह राज गद्दी पर बैठे. संग्राम शाह…दुर्गावती का शासन काल गोंडवाना साम्राज्य का “स्वर्ण युग” था. इन्ही के शासन का में स्वर्ण मुद्रा का प्रचलन था. राजा चन्द्र शाह के दसवीं पीढ़ी में राजा सुमेर शाह मंडावी हुए…. उनके पुत्र शंकर शाह … शंकर शाह के पुत्र रघुनाथ शाह हुए.
सुमेर सिंह मराठों के बंदी होकर सागर के किले में कैद थे, रानी बेटे शंकर शाह के साथ राजधानी गढ़ा पुरवा में आकर रहने लगी थीं. शंकर शाह जंगल में बांस छीलकर नुकीले बाण तैयार करने लगेय उन्हें देख आसपास के गोंड बालक भी जुड़ गए. धनुषबाण से वे निशानेबाजी का अभ्यास करने लगे. थोड़े ही दिनों में उनकी एक मित्र मंडली तैयार हो गई, जिसे गोंटिया दल का नाम मिला. इस दौरान सन 1800 में मराठों ने सुमेर सिंह को कैद से मुक्त कर दिया और वह अपने परिवार के साथ पुरवा में आकर रहने लगे. जहां मात्र 16 साल की उम्र में उन्होंने शंकर शाह को युवराज बना दिया. शंकर शाह गुरिल्ला युद्ध के जरिए मराठा सैनिकों पर हमले करने लगे. जबलपुर स्थित गढ़ा पुरवा में मंडला, सिवनी, नरसिंहपुर, सागर, दमोह सहित मध्य भारत के लगभग सभी रजवाड़े परिवार, जमींदार, मालगुजार के साथ 52 गढ़ों से सेनानी भी उनका नेत्रित्व स्वीकार किया.
19वीं शताब्दी मध्यान्ह तक अंग्रेजों के अत्याचार और अनाचार चरम सीमा पार कर गए थे। डलहौजी की हड़प नीति के बाद भारत में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि तैयार हो रही थी जिसकी जानकारी राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को भी लग गई थी। राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह ने मध्य प्रांत के रजवाड़े परिवार जमींदारों और मालगुजारों को एकत्रित करने के लिए रोटी और कमल की जगह दो काली चूड़ियों की पुड़िया जिसमें संदेश लिखा होता था कि “अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियाँ पहन कर घर बैठो”। जो रजवाड़े परिवार, जमींदार और मालगुजार इस पुड़िया को स्वीकार कर लेते थे तो इसका आशय होता था कि वे अंग्रेजों के विरुद्ध संग्राम में शामिल हैं और जो स्वीकार नहीं करते थे तो यह मान लिया जाता था कि वे साथ नहीं है। इस तरह से मध्य प्रांत में राजा शंकर शाह और रघुनाथ शाह के नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध एक मोर्चा तैयार हो गया था। उनका झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे तथा कुंवर साहब से भी संपर्क था।

राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह जोजस्वी कवी थे. उन्होंने स्वरचित वीर रस के कविताओं और गीतों के माध्यम से जन-जागरण किया और जनता को स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए प्रेरित किया, लेकिन उनकी गुप्त योजनाओं की भनक अंग्रेजों को लग गई। राजा शंकर शाह और कुंवर रघुनाथ शाह को अंग्रेजी सरकार ने 14 सितंबर 1858 को गिरफ्तार कर लिया। उन पर अंग्रेजों के खिलाफ षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया गया। चार दिनों तक उन्हें कई प्रकार की यातनाएं दी गईं. न्याय आयोग ने उन्हें फाँसी की सजा सुनाई. राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह बुद्धिमान थे, उनकी सोच थी कि प्रजा के सामने उन्हें तोप से उड़ाने पर क्रांति और भड़केगी. इसलिए उन्होंने कहा कि – हम ठग, पिंडारी, चोर, लुटेरे, डाकू हत्यारे नहीं है, जो हमें फाँसी दी जाए, हम गोंडवाना के राजा हैं, इसलिए हमें तोप के मुँह से बांधकर उड़ाया जाए। ब्रिटिश न्याय आयोग ने भी विचार किया कि तोप के मुँह में बांध के उड़ाने से जनता में दहशत फैलेगी।
तोप के मुह में बांधकर उन्हें यह प्रस्ताव भी दिया गया कि इसाई धर्म स्वीकारने पर उन्हें जीवनदान दे दिया जाएगा. लेकिन गोंडवाना के रणबांकुरे कहाँ माननेवाले थे.
अंततः 18 सितंबर 1857 को प्रातः 11 बजे 33वीं मद्रास नेटिव इन्फेंट्री सहित पाँच हजार सैनिकों के घेरे में रेसीडेंसी के सामने राजा शंकर शाह-रघुनाथ शाह को तोप के मुँह पर बांधा गया। चारों और अपार जनसमूह उमड़ आया था। पिता और पुत्र शांत चित्त होकर खड़े थे। उनके चेहरों में किसी भी प्रकार के भय के लक्षण नहीं थे। लेफ्टिनेंट क्लार्क के तोप के गोले से उड़ाने के आदेश के पूर्व राजा शंकर शाह ने उस स्वरचित कविता का प्रथम छंद गाया: ,

“मूंद मुख डंडिन को चुगलों को चबाई खाई, खूंद डार दुष्टन को शत्रु संघारिका,
मार अंगरेज रेज पर देई मात चंडी, बचे नहीं बेरी बाल बच्चे संहारिका, “

ऐसे साहसी बलिदानी अपने पूर्वज को…. राजा युवराज को शत शत नमन…