जबान, पुरखों की सीख और गवरागढ़ की खोज
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
हम शोध के लिए भाटीगढ़, गरियाबंद गए थे। तब एकाएक हमारे मुँह से निकला था कि _“जब संभु ईशर-गवरा : शौर्य-सृजन की लोकगाथा पुस्तक छपकर आएगी, तो हम पुनः यहाँ आएँगे।”_ हमारे पुरखों ने हमें सिखाया है कि जबान बहुत सोच-समझकर देनी चाहिए और यदि आप जबान दे चुके हैं, तो उसे पूरा करना चाहिए।

हम या हमारे आराध्य पेन यदि किसी बंधन में बँधे हैं, तो वह है *जबान।* आप वरिष्ठ से वरिष्ठ लोगों से संज्ञान लें और अनेक प्राचीन धरोहरों का अध्ययन करें, तो सभी जगह आपको यही मिलेगा। आज लोग काल्पनिकता एवं चमत्कार के पीछे इतने दीवाने हैं कि वास्तविकता से कोसों दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में हमने अपने उस प्राचीन एवं गूढ़ तथ्य के परिपालन में भाटीगढ़, मैनपुर, गरियाबंद की पवित्र भूमि पर कदम रखकर पाट दाबे।
गवरागढ़ की खोज एवं जानकारी प्राप्त करने की जिज्ञासा को मन में सँजोकर अध्ययन की श्रृंखला हमें वहाँ तक ले गई थी। हमारी पुस्तक “संभु ईशर-गवरा : शौर्य-सृजन की लोकगाथा” छपकर आई, तो पहली पुस्तक पुरखा के नाम और दूसरी पुस्तक भाटीगढ़ स्थित गवरागढ़ के नाम से अलग रखी थी। शायद ही कोई इस गहराई को समझ पाए, लेकिन हमें इसकी समझ है। हाँ! हम वहीं तक लिखेंगे, जहाँ तक पुरखों की दिशा होगी। उससे आगे न हम लिखेंगे और न कुछ कहेंगे, यह भी हमें पता है।
हमने पुस्तक लयोर चिमन फूलझरिया मरकाम और उनके पिताजी के हाथों में भेंट की। हमने उन्हें बताया कि “एक पुस्तक और नारियल भाटीगढ़ के लिए तथा दूसरा नारियल बूढ़ाराजा के लिए है, और एक पुस्तक आपको भेंट है।” इस तरह हम वहाँ से होकर आए हैं।
लयोर चिमन फूलझरिया मरकाम बहुत ही प्रतिभावान एवं ज्ञानी व्यक्तित्व के धनी हैं। मैंने उनमें अनेक प्रतिभाएँ देखी हैं। उन्हें लगा था कि वे अपने घर ले जाना चाहते थे, किंतु सच कहूँ तो मुझे उनके घर जाना था। चिमन फूलझरिया मरकाम, इसमें ‘फूलझरिया’ उनका उत्पत्ति स्थल या कहें कि गढ़ है, जहाँ उनके पेन मौजूद हैं और उनके परिवार के लोग आज भी सेवा-अर्जी कर रहे हैं।
‘फूलझरिया’ के आराध्य पेन, पेनठाना, पेन स्थल, कुंदा, बिड़द, गढ़ एवं मंडा को मेरा जोहार भेंट। हमारी पूरी टीम की ओर से भी जोहार पहुँचे।
चिमन फूलझरिया मरकाम भाई, आपने मुझे आते समय एक सवाल किया था। मैंने आपको बताया था कि आप जानते हैं, किंतु आते-आते मैं उसकी ऐतिहासिक दृष्टिकोण से पड़ताल करते हुए उसके इतिहास, कारण, गुण, उपयोग तथा परिणाम तक की महत्त्वपूर्ण जानकारी तक पहुँच गया और उसे लिख भी लिया है। आपके मन में ऐसी और भी जानकारियाँ प्राप्त करने की जिज्ञासा हो या कोई प्रश्न उपजे, तो मुझे जरूर पूछें, क्योंकि वह मेरे लिए एक टास्क होता है। जब तक मैं उस तथ्य की पड़ताल नहीं कर लेता, तब तक दम नहीं लेता हूँ।
हाँ! आप वह जानकारी व्हाट्सऐप या अन्य माध्यम से मत पूछना। अब उसे मैं एक पुस्तक में लिपिबद्ध कर आप तक पहुँचाऊँगा। आपने बहुत ही बेहतरीन प्रश्न किए थे। आपसे निवेदन है कि ऐसे प्रश्नों का जखीरा मेरे पास भेजें। मैं उनके जवाब तक अवश्य पहुँचूँगा या पहुँचने की कोशिश करूँगा।
अंत में इतना ही कहूँगा कि आपमें अनन्य प्रतिभा है। उस प्रतिभा को निखरते हुए देखना चाहता हूँ। शायद मेरे इस पोस्ट को आपके सियान लोग पढ़ रहे हों, तो उनसे निवेदन है कि ऐसी प्रतिभा को गुम होने मत दीजिएगा और ऐसे युवाओं को एक मंच पर लाकर निखारने का प्रयास कीजिए।
सेवा जोहार!
ईशर-गवरा जोहार!
गवरागढ़ न जोहार!
भाटीगढ़ न जोहार!
कुल्हाड़ी घाट न जोहार!
राव-कैना देव दरहा न जोहार!
कुदरगढ़ त कुदरगढ़हीन जोहार!
> ✍🏻 धर्मपाल कोड़ापे

