गोंडवाना समग्र विकास क्रांति के स्वप्न द्रष्टा को पुण्य जोहार स्मरण
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
दादा को लोग अपने अपने नजरिए से देखते, जानते, और समझते हैं, कोई उन्हे पीली क्रांति के जनक, तो कोई समग्र क्रांति के नायक, तो कोई उन्हे महामना की उपाधि देता है । लेकिन मैं उन्हे महानायक (ग्रेट लीडर) मानता हूँ। प्यार और “वार” में निराश प्रेमी और हताश योद्धा में जान फुकने वाला ही महानायक होता है। दादा हीरा सिंह मरकाम ने यही किया। हीन भावना से ग्रस्त और अनावश्यक आत्मग्लानि से दबे गोंड़ समाज में जान फूँका। समाज को यह विश्वास दिलाने में वे सफल रहे कि जनजातीय वर्ग के सबसे बड़े धड़ गोंड़ समाज की संस्कृति विश्व संस्कृति की जननी है। वे महान गोंड़ राजवंश के संतान और प्रजा हैं। उनके गौरवशाली इतिहास के साथ वैभवशाली भूगोल भी है। उनके पूर्वज महाराजा, राजा, जमींदार, मालगुजार और गउँटिया रहे है। इसके लिए दादा ने गोंडवाना की विशिष्ट धार्मिक रीति रिवाज और तीज त्यौहार को माध्यम बनाया। यह उनकी दूर दृष्टि और जन आकांक्षाओं को पढ़ लेने की अद्भुत क्षमता को दर्शाती है। उन्होंने सीमित संसाधनों के साथ लेकिन कठोर परिश्रम से गाँव गाँव घूमकर धैर्यपूर्वक लोगों को समझा और समझाया।
अंततः वे गोंडवाना समाज को उस मोड तक ले आए जहां से राजनीति के राजमार्ग गुजरता है। हालांकि इस राजमार्ग में चलते हुए दादा को नैतिक मूल्यों के कीमत पर कुछ परिस्थितिजन्य समझौता करना पड़ा, लेकिन कारवां चल पड़ा। दुर्भाग्य से इस मार्ग में कुछ दादा के विश्वस्त सहयोगी और अनुयाइयों ने अपना ही कारवां लूट लिया। बकौल दुष्यंत कुमार .. “दुकानदार तो मेले में लूट गए यारों, तमाशबीन दुकान लगाकर बैठ गए”।
खैर, दादा के राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाले कई लोग हैं, लेकिन जिस धार्मिक एवं सांस्कृतिक बुनियाद पर गोंडवाना आंदोलन ने आकार लिया है उसे स्वतंत्र गैर राजनीतिक और पृथक रूप देना समय की मांग है. इससे हो सकता है जनजातीय वर्ग का अन्य धड़ा, और अन्य राजनीतिक विचार धारा से प्रतिबद्ध सजातीय जन दादा के समग्र विकास क्रांति अभियान से जुड़ जाए। देखना है राजनीति से परे दादा के धार्मिक – सांस्कृतिक विरासत का झण्डा कब और कौन उठाता है ?
गोंडवाना के महानायक को उनके षष्ठम पुण्य तिथि पर शत शत नमन, हजारों हजार जोहार.. कोटि कोटि प्रणाम ….
रमेशचंद्र श्याम
कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष

