राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन 13 सितंबर 2007 अंतरराष्ट्रीय आदिवासी अधिकार दिवस UNO द्वारा घोषित के अवसर पर
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज आदिवासी भारत में लगभग 705 आदिवासी समुदाय है जिसकी जनसंख्या लगभग 12 करोड है जनगणना के अनुसार भारत के जनसंख्या का 8 .6 प्रतिशत है भौगोलिक दृष्टिकोण से भारत के मध्य एवं उत्तरी पूर्वी राज्यों में अधिकाधिक संख्या है आदिवासी अंचलों में ही देश के प्रकृति एवं खनिज संसाधन भरपूर है भारत के संविधान में आदिवासियों का अधिकार दिया गया है आदिवासियों के लिए छठवीं एवं पांचवी अनुसूची के तहत क्षेत्र के भी प्रशासन नियंत्रण उनके अनुसार किया गया है आदिवासी प्रकृति पूजक है आज भी देश के आदिवासी विकास के मानकों में पिछड़ा नजर आता है जल जंगल जमीन और खनिज के संरक्षण के लिए लड़ाई के साथ अपनी परंपरा और आदिवासीयत अस्तित्व के लिए संघर्ष है भारत राष्ट्र के उत्थान और समग्र विकास की कल्पना आदिवासियों के सहभागी के बगैर संभव नहीं है राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन एक प्रयास है आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण और समस्याओं के निराकरण के लिए मानव सभ्यता के विकास के पिछले दस हजार साल से कृषि की शुरुआत हुई है सबसे पहले विश्व के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग सभ्यता है प्रमुख रूप से दो सभ्यताएं बनी एक जिन्होंने अपनी आर्थिक सामाजिक राजनीतिक धार्मिक व्यवस्था के तहत संगठित स्वरूप में खड़ी थी दूसरी सभ्यता में प्रकृति एवं मनुष्य के शोषण को आधार बनाकर जिनको आज हम सब विकास के नाम से जानते हैं और जिनको विकसित सभ्यता मानते हैं प्रकृति संसाधन के हर स्वरूप को चीज या वस्तु समझती है और उनको व्यवसाय पर या व्यापार में शरीक करती है जिससे संपत्ति पैदा होती आधुनिक समय में तकनीकी के विकास के समय प्रकृति शोषण की प्रकृति प्रक्रिया को रफ्तार मिली साथ में जल जंगल जमीन और हवा को गंभीर रूप से प्रदूषित भी किया दूसरी ओर प्रकृति प्राकृतिक संसाधन जो कि सबके लिए थे इस पर मालिकित प्रस्थापित करने के लिए अंधाधुन दौड़ मची हुई है जिसके चलते प्रकृति संसाधन चंद निजी हाथों में केंद्रित होते गए मानव समाज में असमानता है बड़ी और आधी दुनिया भुखमरी के कगार पर आ गई जो समुदाय इस होड़ में शामिल नहीं हुआ और यदि व्यवस्था जो कि प्रकृति और मानव के बीच संबंधता और सहअस्तित्व को आधार बनाकर श्रम सहकारिता समानता सामूहिकता संवेदनशीलता सादगी प्रेम करुणा दया सत्य अहिंसा सरलता जैसे मूल्यों के साथ जीवन यापन करते हैं वहीं आज के आदिवासी के नाम से पहचाने जाते और उनको अविकसित पिछड़ा समझते हैं विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति संसाधनों जल जंगल जमीन खनिज हवा व्यापम शोषण शुरू हुआ और प्रकृति का संतुलन बनाए रखने वाले आदिवासियों पर सीधे हमले होने लगे बड़े पैमाने पर आदिवासियों का संहार हुआ उसके चलते पूरे विश्व में पर्यावरण संकट सुनामी बाढ़ सूखा हिमवर्षा अब ग्लोबल वार्मिंग वैश्रिक तापमान बढ़ोतरी अकाल चक्रवात मौसम में अविश्वास बदलाव महावारी वगैरह पैराग्राफ से समग्र विश्व की मानव सभ्यता एवं प्रकृति के अस्तित्व के सामने गहरा संकट खड़ा हुआ अस्तित्व के इस संकट से विश्व के मानव सभ्यता समेत प्रकृति को धरती मां को बचाने हेतु संयुक्त राष्ट्र संघ UNO ने सन 1992 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो शहर में पृथ्वी परिषद का आयोजन किया पृथ्वी परिषद के समांनातर रियो डी जेनेरो के करीबी गांव केरीओको विश्व के 68 देशों के करीब 400 आदिवासी कर्मशीलो ने भी धरती मां एवं विश्व के आदिवासियों को कैसे बचाया जाए इस विषय पर गहन चिंतन किया पृथ्वी परिषद के उन आदिवासी कर्मशीलो के साथ व्यापम चिंतन करने के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ निम्नलिखित बिंदुओं पर आम सहमति बनाई( 1) विकास की तरह होनी चाहिए जिसके प्रकृति संसाधनों का हमेशा के लिए विनाश ना हो जल जंगल जमीन हवा प्रदूषित ना हो उनका पुनः निर्माण होता रहे जैविक विविधता बची रहे पर्यावरण का संतुलन बना रहे स्थानीय निवासियों पर कोई संकट खड़ा ना हो इस तरह के संयुक्त राष्ट्र संघ ने टिकाऊ विकास संस्कृत डेवलपमेंट को स्वीकार करते हुए एक हजार साल के लिए व्यापक कार्यक्रम तैयार किए (2) विश्व समाज में पहली बार स्वीकार किया कि विश्व के आदिवासी का प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन जल जंगल जमीन हवा का वैज्ञानिक प्राप्त ज्ञान प्रकृति से जुड़ी हुई उनकी रूढ़िवादी परंपरा और उनकी संस्कृति विश्व के टिकाऊ विकास साथ में आदिवासियों के जीवन मूल्य व संस्कृति एवं समीक्षा भरी जीवन वौश्रिक पूर्ण संस्कृति एवं समहिता सामूहिकता भरी शैली विश्व के लोकतांत्रिक सामूहिक जीवन एवं अस्तित्व को टिकाऊ रखने के लिए महत्वपूर्ण है आदिवासियों का जीवन मूल्य जीवन शैली कला संस्कृति ज्ञान हुनर एवं इतिहास मानव सभ्यता की धरोहर है और इस को बचाए रखने के लिए यह अंतिम यह मौका है साथ में विकसित कहलाने वाले सभ्यता अगर अपनी भोग वादी की जीवन शैली नहीं बदलती है तो मानव सहित समग्र सृष्टि के सामने बहुत गहरा पर्यावरण संकट खड़ा हो सकता है संयुक्त राष्ट्र संघ UNO विश्व के आदिवासियों और आदिवासी संस्कृति को बचाए रखने हेतु 1993 को विश्व आदिवासी वर्ग एवं 1904 से 2004 से 2014 तक को विश्व आदिवासी दशक एवं सन 1985 से हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है विश्व के आदिवासीयों ने अपने अस्तित्व अधिकारों के लिए 1923 से ( LEAGUE OF NETION )लीगल ऑफ नेशन के सामने संघर्ष शुरू कर के विश्व समाज का ध्यान अपनी और आकर्षित किया था सन 1982 में(economic and social council) इकोनामिक एंड सोशल काउंसिल (ECOSOC) का गठन करके संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व को आदिवासीयो के सवालों के समाधान हेतु प्रयास किया “पृथ्वी परिषद” के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में 28 जुलाई 2000 मैं रेलीगेशन क्रमांक 2000/22 आदिवासियों के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थाई समिति का गठन किया जिसे हम THE UNITED NATION PERMANENT FORUM ON INDIGENOUS ISSUES (PNPFII) नाम से जानते हैं साथ में 2007 में 13 सितंबर को विश्व के आदिवासियों के लिए अधिकारों की घोषणा की और हर साल 13 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी अधिकार दिवस के नाम से मनाया जाता है आदिवासी समन्वय मंच भारत का गठन आदिवासियों की समस्याओं का समाधान के लिए सन 2015 में हुआ जो देश के आदिवासी क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न संगठनों कर्मशील एवं लोगों का साझा मंच है इस मंच ने 2016 में दिल्ली में मेंदेशवा अंतरराष्ट्रीय अधिकार दिवस राष्ट्रीय स्तर पर सबको साथ लेकर मनाया था और महामहिम राष्ट्रपति जी को आदिवासियों के समस्याओं के बारे में ज्ञापन प्रस्तुत किया था इसके बाद देश के विभिन्न प्रदेशों में संगठनों कर्मशीलो एवं लोगों को जोड़ने हेतुहेतु सन 2017 में नागपुर महाराष्ट्र 2018 में रांची झारखंड 2019 में मैसूर कर्नाटक सन 2020 में मिलोन्डा गुजरात में एवं 2021 में दीपू कार्बि एंग लॉन्ग डिस्ट्रिक्ट ऑडिटोनामस काउंसिल देश की सबसे पहली छठी अनुसूची के तहत गठित मेंआयोजन किया गया इस वर्ष सन 2022 का अंतरराष्ट्रीय आदिवासी अधिकार दिवस का राष्ट्रीय आयोजन सम्मेलन छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर शहर में किया जा रहा है
12 एवं 13 सितंबर आदिवासी राष्ट्रीय सम्मेलन कार्यक्रम की रूपरेखा 12सितंबर 2022 सुबह 9:30 विभिन्न प्रांतों से आए हुए सम्मानीय समाजिक जनों का पंजीयन समाजिक प्रमुख एवं दलों का स्वागत सुबह 10:30 प्रथम सत्र उद्घाटन विभिन्न राज्यों से आए हुए विभिन्न प्रदेश के प्रारंभिक संस्कृति वेश भूषा का प्रदर्शन आदिवासियों के संवैधानिक अधिकार विषयों पर सेमिनार एवं चर्चा( 1) विकास की आधुनिक अवधारणा में आदिवासी एवं प्रकृति सन्साधन का संरक्षण( 2) पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण एवं प्रसारण में आदिवासी महिलाओं की भूमिका (3)आदिवासियों के राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय अधिकार और वास्तविक स्थिति( 4) आदिवासियों के पारंपारिक ज्ञान एवं रीति रिवाज में वैज्ञानिकता( 5) आदिवासी बोली भाषा साहित्य एवं इतिहास(6) पेशा कानून की स्थिति एवं भविष्य की संभावना जिन राज्यों में लागू है वहां क्या पर्याप्त है(7) वन अधिकार और मान्यता कानून कहां तक का प्रभावी स्तर लागू है सुप्रीम कोर्ट एवं केंद्र सरकार की स्थिति आदिवासियों के लिए हितेषी है(8)राष्ट्रीय जनजाति नीति की वर्तमान स्थिति क्या है( 9)भूमि अधिकरण क्या आदिवासीयों के विस्थापन का मार्ग है एवं वर्तमान स्थिति पर तार्किक विचार (10)परिसीमन डीलीस्टिंग पर चर्चा (11) कुछ प्रदेशों में जनजातियों को मूल सूची में शामिल नहीं किया गया तथा कुछ राज्यों में विचाराधीन है राज्य समीक्षा (13) पदोन्नति में आरक्षण एवं अनुसूचित क्षेत्र में तृतीय चतुर्थ में 100% आरक्षण में भारत सरकार एवं सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण ( 13,) महिलाओं को संपत्ति में अधिकार मिले आदिवासी परंपरा में कहां तक का प्रासंगिक है (14) राज्यों का पुनर्गठन एवं निर्माण भाषाई आधार पर कितना सार्थक है (15 )एक्टो सिटी एक्ट का पालन कैसे हो (16) जनगणना में पूर्व की भांति आदिवासियों के लिए अलग जनगणना काला पर चर्चा (17) देश में आदिवासियों पर अत्याचार बस्तर में सारकेगुडा ताइमेटला एरोबोर गोमपाड जैसे घटनाओं के जांच रिपोर्ट उपरांत भी राज्य सरकार कोर्ट एवं आयोग द्वारा की गई कार्रवाई की चर्चा( 18 )छत्तीसगढ़ राज्य सहित अन्य प्रदेशों में नक्सल समस्या का आदिवासी समाज में प्रभाव एवं इसका समाधान उपरोक्त विषयों के अलावा आदिवासियों के अंतरराष्ट्रीय संयोजक एवं क्षेत्रीय सामाजिक विषयों समाधान के पर भी चर्चा संध्या 5:00 बजे विभिन्न प्रदेश से आए हुए संस्कृति ने समूह का प्रदर्शन रात्रि 9:00 बजे दिनभर की चर्चा का समायोजन। सुबह 9:00 बजे प्राथमिक सेवा अर्जी जोहार भेट सुबह 10:30 सभी प्रांत से आए हुए पारंपारिक वेशभूषा के साथ भव्य लैरी जयस्तंभ चौक तक रैली दोपहर 1 30 को राष्ट्रीय अतिथियों का स्वागत उद्बोधन एवं आदिवासीयों विषयो का प्रस्तुतीकरण आदिवासियों के अधिकार एवं समस्याओं के समाधान हेतु प्रस्ताव
आयोजक आदिवासी समन्मय मंच भारत एवं सर्व आदिवासी समाज छत्तीसगढ़ रूढीजन्य परंपरा पर आधारित समस्त आदिवासी समुदाय भारत एवं छत्तीसगढ़ प्रदेश संपर्क माननीय अरविंद नेताम माननीय सोहन पोटाई प्रदेश अध्यक्ष माननीय बी एस रावटे 94242 16515 माननीय आर एन साय 94060 33133 माननीय विनोद नागवंशी 99 811 32162 अकबर र्कोरम 75871 97404 मोहन कोमरे 94251 21347 जयपाल ठाकुर 79 8761 8601 सविता साय 93 2944 4014 सुभाष परते 99079 25177 प्रकाश ठाकुर 9424 283959 विनय प्रकाश 94241 89 693 सदे कोमरे 94242 75605 निखिल नेताम 89 827796 84 सहभागी गोंडवाना गोड़ महासभा गोंडवाना समन्यव समिति बस्तर राजी पहाड़ा भारत कंवर समाज हल्बा महासभा सरना उराव महासभा संवारा समाज उरांव आदिवासी कल्याण समिति बैगा समाज बिरहोर कमार पांडो नगारची बिझवार ध्रुरवा भुजिया मैना बियार कंडरा भतरा पाव खड़िया समस्त आदिवासी समुदाय छत्तीसगढ़ आदिवासी अधिकार क्षेत्रों पर कार्य करने वाली संगठन

