भील आदिवासी समुदाय में दो प्रकार कि जातर होती है 1) नादरू जातर
भील आदिवासी समुदाय में दो प्रकार कि जातर होती है
1) नादरू जातर
2) नवाई जातर
2) नवाई_जातर
जय_खत्रीज
आदिवासी_भील_समुदाय_कि_रूडी_परंपरा
नवाई जातर नई फसल माका कि डोडिये (भुटे) खाने से पहले नवाई जातर कि जाती है! यह परंपरा मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में कि जाती हैं! कहने का मतलब भील प्रदेश का क्षेत्र!
पुरे गाँव में तेडा(सुचना) करा जाता हैं!
समस्त गाँव वाले मिलकर एक 🌴दिन निधारीत करते हैं,
सर्व प्रथम एक व्यक्ति कोरा रहकर नवाई जातर के मवडे (महुआ) भरता हैं! फिर महुआ का दारू निकाला जाता हैं!
उस दारू को एक मिट्टी के मटके में भरा जाता है, उसे कोवारी कहते हैं!
पुरी तयारी कर फिर निधारीत दिन कि शाम को पटेल (तडवी) के घर आदिवासी विधि विधान से पुजा,अर्चना कर नवाई जातर कि गायण बिठाई जाती हैं! गांव के पटेल, बडुवा व गाँव के लोग मोजुद रहते हैं, जो व्यक्ति कोरा रहता हैं,वह हर समय पुजा, अर्चना में मोजुद रहता है!
उस मटेके में भरे हुए दारू कि धार डाल कर गाँव के लोग धार के दारू का सेवन करते हैं!
फिर गाँव के बडवों द्वारा
पुरी रात गायणां (गायन) किया जाता हैं!
सुबह फिर वहाँ से उठ कर गाँव के देव स्थल पर जाकर गायन करा जाता है!
सब गाँव वाले अपने खेत से ककड़ी, माका (भुटे) देव स्थल पर चडाने के लिए लाते हैं!
कचे माका के दानों से खिर बनाई जाती हैं, भुटे चके जाते हैं!
बिली पेड़ के सात पतों में चावल रख कर बाबा कसमोर व बाबी सावन माता के सामने रखा जाता हैं!
पहले बाबा कसमोर के सामने 🌴पटेल व गाँव के लोगों द्वारा धार डाली जाती हैं,
फिर गाँव का बडुवा धार डाल कर बाबा कसमोर के सामने बैठ जाता हैं!
ओर आदिवासी पुरखों (खत्रीजों ) का अहवान करता है, तथा खत्रीज उस के शरीर में प्रवेश करते हैं, ओर बडुवा उन बिडों को एक- एक कर सात लोगों को पकडा कर देव स्थल में रखवाता हैं!
उस के बाद बाबा कसमोर के सामने बकरे को तिलक लगाकर चावल उपर डाल कर फिर दारू लेकर कोरा रहा अदमी हाथ फैरता हैं, बडुवा बाबा कसमोर 🌱को नमन् करते हुऐ बकरे को छोड़ देता हैं, बकरा को झाडा लेने के बाद बकरे का भोग करा जता हैं!
सात पतों में खिर, भुटा,घी, डालकर रख दिया जाता है, एक पते में अलग से माका,खिर तयार कि जाती हैं, उस कि सब अये हुए गाँव वाले पुज रखते हैं!
उन सात खिर भुटे वाले पतों को बचों को दिया जाता हैं!
फिर दारू की चाक सब लोगों को दि जाती हैं!
उस के बाद एकत्रित कची माका डोलियों को सब में बांट दिया जाता हैं! बकरे के मटन को गाँव के सब लोगों में बाटने के लिए वाटें पाडे जाते हैं!
सब अपना- अपना वाटा लेकर घर चलेजाते हैं!
नवाई जातर के बाद लोग अपने सगां संबंधियों को देकर घर पर नवाई कर नई फसल माका (भुटे) को खाते हैं!
जय_जोहार
जय_आदिवासी #जय_खत्रीज

