लोधेशवरधाम के संरक्षक, स्वजातीयो ने अमर शहीद वीरांगना महारानी अवंतीबाई लोधी के बलिदान दिवस पर किया नमन
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज वीरांगना अवंतीबाई लोधी अमर रहे..अमर रहे…से गूंजा लोधेशवरधाम।लोधेशवरधाम लोधी क्षत्रिय समाज रायपुर छत्तीसगढ के तत्वावधान में 1857 की क्रांति में अमर शहीद वीरांगना अवंतीबाई लोधी की छायाचित्र पर श्रद्धासुमन पुष्पांजलि अर्पित किया गया। इस अवसर पर संरक्षक मंडल सहित लोधेशवरधाम के पदाधिकारीगण, सदस्यगण एवम स्वजातीय बंधूओ की उपस्थिति रही। देश की सर्वश्रेष्ठ, महान क्रांतियों में सर्वोपरि स्थान प्राप्त है, अनेक महिला क्रांतिकारी इतिहास के पन्नों में आजीवन अमर है। उनकी गाथा हम सुनते और पढ़ते आए हैं, जिनमें रानी लक्ष्मीबाई, सरोजनी नायडू और अनेकों वीरांगनाओं का जिक्र किए, बगैर इतिहास अपूर्ण रहेगा, जिसमें सर्वप्रथम नाम है- अवंतीबाई लोधी। वे किसानों, देशी सैनिकों, जमींदारों एवं मालगुजारों को अपने हाथों से पत्र लिखकर गाँव-गाँव क्रांति का संदेश भिजवाने वाली प्रथम नारी थी। रामगढ़ मंडला की महारानी अवन्तीबाई लोधी। वह एक ऐसी राष्ट्र भक्त थी, जिन्हें इतिहास में उचित स्थान प्राप्त नहीं हो सका है। परन्तु ब्रिटिश सत्ता के विरूद्ध उनके संघर्ष एवं बलिदान से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री समकालीन सरकारी पत्राचार, कागजातों व जिला गजेटियरों में बिखरी पड़ी है। स्वतंत्रता संघर्ष में खुशी-खुशी अपने प्राणों को न्यौछावर कर देने वाली, एक ऐसी वीरांगना का नाम हैं-‘महारानी अवंतीबाई लोधी’। इस अवसर पर समाज के द्वारा अमर शहीद वीरांगना अवंतीबाई लोधी के जीवनगाथा पर प्रकाश डाला गया। उल्लेखनीय है कि उनका जन्म 16 अगस्त 1831 को हुआ था। विवाह रामगढ़ के राजा विक्रमादित्य के साथ हुआ था। वह बहुत योग्य शासक थे, परंतु अत्यधिक धार्मिक कार्यो के प्रति जागरूक रहते थे। अंग्रेजों ने अपनी धुर्तता का परिचय देते हुए, विक्रमादित्य को गद्दी से बेदखल कर दिया। कुछ समय बाद उनकी अस्वस्थ्ता का लाभ उठाते हुए, अंग्रेेजों ने रामगढ़ के काम-काज को भी अपने हाथों में ले लिया। रानी अवंती बाई लोधी और उनके दोनों पुत्रों जमालसिंह लोधी व शेरसिंह लोधी के जीवन व्यापन हेतु अंग्रेजों ने पेंशन बांध दी। महारानी अवंतीबाई लोधी को अत्यधिक रोष आ रहा था। अंग्रेजों से बदला लेने और उन्हें सबक सिखाने के लिए उनका विरोध करने की ठान ली। अंग्रेज षडयंत्र कर अनेकों राज्यों पर अपना अधिकार जमा रहे थे। उनकी नजर मंडला पर पड़ी, जिसे उन्होंने हड़प लिया। रानी ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष शुरू किया, जिसमें अंग्रेजी सेना परास्त हुई और मंडला और रामगढ़ पर रानी अवंतीबाई लोधी का अधिकार हो गया। लेकिन अंग्रेजों की धुर्तता कम नहीं हुई और उन्होंने रामगढ़ की ओर कूच किया, क्योंकि वह रानी से बदला लेना चाहते थे। महारानी की फौज व अंग्रेज सेना में घमासान युद्ध हुआ, पंरतु इस बार रानी को सफलता नहीं मिली। अवंतीबाई कहां हार मानने वाली थी और रानी ने जंगलों में शरण ली, जहां से वे लगातार अंग्रेजी सेना पर वार करती रही। उन्हें लगा कि अंग्रेज उसे पकड़ सकते है, अतएवं अपने अंगरक्षक से तलवार लेकर अपने सीनें में उतार दी। महारानी अवंतीबाई लोधी इस तरह एक वीरांगना ने अंग्रेजों से लोहा लेकर और अपने राज्यों की स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों का 20 मार्च 1858 को बलिदान कर दिया। गौरतलब है कि लोधेशवरधाम द्वारा प्रतिवर्ष बलिदान दिवस एवम जयंती दिवस के दौरान श्रद्धासुमन अर्पित किए जाते है। इस अवसर पर लोधेशवरधाम के पदाधिकारीगण, सदस्यगण एवम स्वजातीय बंधू अधिक संख्या में उपस्थित थे। यह जानकारी लोधेशवरधाम के सचिव प्रहलाद दमाहे ने एक प्रेस विज्ञप्ति में दी है।

