विश्व प्रसिद्ध लिंगो देव जात्रा का आयोजन 2 से 4 अप्रैल तक
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
विशास आयोजन को लेकर तैयारियां जोरों पर
जलि के वलेकनार सेमरगांव में 2 से 4 अप्रैल तक लिंगों पेन का विश्व प्रसिद्ध करसाड़ होगा। लिंगों कर्रसाड़ में जन समुदाय अपने अंदर प्रेरणा की खोज करते हैं, जीवन के विभिन्न संभावनाओं ऊर्जा और तरंगों को महसूस कर जीते हैं। इस लिंगों कर्रसाड़ में उत्सव, संस्कृति, परंपरा, संस्कार, आस्था, समरसता, कुटुम्ब भाव, प्रकृति आधारित जीवन, व्यक्तिगत रूप से शरीर, मन, बुध्दि भावना, आध्यात्म से सर्वांगीण व्यक्तित्व विकास के साथ मूल में विविधताओं में भी सामूहिक एकता का प्रतीक है। जो सामुदायिक जीवन पर आधारित है. यह कर्रसाड़ सामाजिक ताना-बाना, माझी विरासत, सांस्कृतिक विरासत एवं धरोहर सांस्कृतिक पहचान, सांस्कृतिक चेतना और प्रकृति से जुड़े आदर्श जीवन मूल्यों को अपनाने के साथ आज के युवा पोड़ियों की और आने वाली पीढ़ी को
क्यों महत्वपूर्ण है वलेक मड़ा अर्थात सेमर वृक्ष
वलेक मड़ा दुनिया की उन अद्भूत प्रजातियों में से एक है जो अपने बीज का प्रसारण सबसे अधिक दूरी तक, वायु में उड़कर पानी के ऊपर बहकर जमीन से लड़कर प्रसार करता है । गोड़ समाज बारह भाई बानी-बिरादरी समुदाय उन दूसरे प्रजातियों को जो पृथ्वी के इको सिस्टम (पारिस्थितिकीय तंत्र) को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं उन्हें वे अपने पेन टोटेमिक सिस्टम में जगह देकर सम्मानित करते हुए उसके संरक्षण की जिम्मेदारी भी लेते हैं। जिसे उनकी आने वाली पीड़ियों को उनकी जड़ों ने जोड़े रखने रूड़ि प्रथा के साथ अनंतकाल तक पीढ़ी दर पीढ़ी निभाते हैं। वलेक मड़ा ऐसा अद्भूत वृक्ष है जो रहवास में सूर्य की ऊर्जामयी किरणों को सबसे पहले आकर्षित करता है जिससे अल-सुबह सूर्य की किरणों की चाहत में अनेक जीव-जन्तुओं का जमावाड़ा इस पर बना रहता है, उन जीव-जंतुओं के व्यवहार से प्रकृति में घटने वाली घटनाओं का पूर्वानुमान हो जाता है जिसके आधार पर लोग अपने कार्यों को करते थे। मानव जीवन से संबंधित विभिन्न ज्ञान इस वृक्ष से मिलने के कारण इस वृक्ष को पेन वृक्ष स्वीकार किया।
अपने जड़ों को पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करना भी कर्रसाड़ का महत्वपूर्ण उद्देश्य है।

आयोजन में कौन शामिल होंगे
प्रति चार वर्ष में आयोजित होने वाले इस कर्रसाड़ में छत्तीसगढ़ में निवासरत बारह भाई बानी बिरादरी के अलावा महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, झारखंड, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु, राजस्थान, असम, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा सहित विदेश से भी लोग शामिल होने आते हैं, विगत वर्षों के करसाड़ में रुस, आस्ट्रेलिया, डेनमार्क, ब्रिटेन से भी लोग कर्रसाड़ में सहभागी बने थे।
कौन हैं लिंगो पेन?
बारह भाई बानी बिरादरी में लिंगो पेन का खासा महत्व है। इन्हें टोटम व्यवस्था व सम-विषम सगा में विभाजित कर सामाजिक ताना-बाना को व्यवस्थित करने वाले माने जाते हैं। साथ ही समाज को शिक्षित और संस्कारित करने के लिए गोटूल का सृजन करने वाले लिंगो पेन हो हैं। इनको 18 प्रकार के वाद्ययंत्र, 18 प्रकार के गीत, 18 प्रकार के नृत्य करने में महारत हासिल था तथा इनके सृजनकर्ता भी लिंगो ही थे। इसलिए इनको डाका और पाटा गुरु काहा जाता है।
अंतरराष्ट्रीय मांझी सरकार के सैनिक भी होंगे शामिल
अंतरराष्ट्रीय समाजवाद मांझी सरकार नई दिल्ली के अध्यक्ष और कंगला मांझी की पत्नी राजमाता पूलता देवी कांगे भी अपने सैनिकों के साथ कर्रसाड में शिरकत करेंगे। मांझी सरकार के सैनिक अपने विशेष सैनिक पोशाक का अनुशासन के कारण आयोजन में आकर्षण के केंद्र बनते है। फूलबा देवी अपने आराध्य आंगा पेन के साथ प्रत्येक करसाड़ में शामिल होती हैं।
तिथि का निर्धारण कैसे करते हैं
दुनिया की सबसे प्राचीनतम आयोजन पहांदी पारी कुपार लिंगो कर्रसाड़ है। मांझी, गायता, पेनवो, पुजार्क बताते हैं कि 50 वर्ष पूर्व यह कर्रसाड़ 12 साल में एक बार होता था। इसके पीछे मान्यता यह थी कि 12 साल बाद बांस के फूल खिलते थे। जो बारिश नहीं होने या सूखा अकाल पड़ने का प्रतीक था। लिंगों पेन से सेवा-अरजी करने पर बारिश होती थी इसलिए लोग बरसात व लोगों के सुख-शांति के लिए कर्रसाड़ निकालते थे। आज भी कर्रसाड़ से विदाई के दिन बारिश होती है। पेनवी, पुजार्क यह भी बताते हैं कि तिथि का निर्धारण लिंगो आंगा पेन और स्थानीय पेन पुरखों की अनुमति से चन्द्रमा को देखकर किया जाता है। जिससे इसकी तैयारी एक साल पहले से ही शुरु की जाती है। अभी इस अवधि को कम करके 4 वर्ष की गई है यह कर्रसाड़ चैत पुन्नी में होता है यदि पुन्नी का तिथि शुक्रवार को हो तो उसे अच्छा माना जाता है। चैत पुन्नी में शुक्रवार का दिन प्रत्येक चार वर्ष में आता है। इसलिए वर्तमान में कर्रसाड़ का अवधि 4 वर्ष किया गया है।
जगह का नामकरण कैसे हुआ?
जिस जगह लिंगो पेन का स्थान है उस गांव का नाम है सेमरगांव। जिसे गोंडी में वलेकनार कहते हैं। वलेक मड़ा अर्थ सेमल का वृक्ष। सेमल वृक्ष के नाम से गांव का नाम वलेकनार (सेमरगांव) पड़ा, बुजुर्ग बतातें है इसी वृक्ष के नीचे लिंगो ने ज्ञान प्राप्त कर कोयतोरिन व्यवस्था के संचालन की रीति-नीति तय किया।
झांटी है लिंगो का प्रिय संगीत वाद्ययंत्र
लिंगो संगीत के जनक माने जाते हैं करसाड़ के मौके पर जब लिंगों की उनके स्थान से उठाया जाता है तब कच्चे बाँसों के झुंड को सैकड़ों युवाओं व्दारा आपस में टकराया जाता है जिससे एक खास प्रकार को ध्वनि निकलती है जिसे सुनकर लिंगो प्रसन्न होते हैं, बांस के इन लंबे डंगाल को “झांटी’ कहते हैं। बांस के इन झांटी को पकड़कर बजाने वालों को “पोता गड़िया कहते हैं। 2 अप्रैल गुरुवार को पेन-पुरखों का आगमन, 3 अप्रैल 2026 शुक्रवार को रात्रि में करमाड़, 4 अप्रैल 2026 शनिवार को पेन स्नान, सेवा-अरजी, आमंत्रित पेनों की विदाई होगी।

