सिन्धी समाज पूज्य शंकराचार्यों के मार्गदर्शन में चल रहे देश में धर्म का शासन स्थापित करने के अभियान में ठोस भूमिका निभाए : साईं मसन्द
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
रायपुर। भारत में सतयुग से शासन की व्यवस्था सनातन वैदिक सिद्धांतों पर आधारित धर्म के शासन की रही है। यथा राजा तथा प्रजा के आधार पर भारत सदैव पूरे विश्व का कल्याण करने वाले विश्वगुरु का दायित्व निभाता रहा है। हमारे देश की आजादी का उद्देश्य भी तत्कालीन अभिलेखों के अनुसार भारत द्वारा विश्वगुरु का दायित्व पुनः निभाना रहा। जब-जब भारत धर्म के शासन की व्यवस्था से दूर हुआ तब-तब देश और दुनिया में अव्यवस्था, अधर्म और पाप की वृद्धि हुई। इस अव्यवस्था से छुटकारा दिलाने हेतु ईश्वर ने अब तक २४ बार अवतार लेकर भारत में पुनः धर्म का शासन स्थापित कराया है।
भारत में इन दिनों पाप, अधर्म एवं अव्यवस्था की स्थिति पुनः चरम सीमा में आ चुकी है। भारत के पूज्यपाद शंकराचार्य एवं अन्य अनेक महान संत इस दुखदाई स्थिति के निराकरण हेतु इन दिनों देश में पुनः धर्म का शासन स्थापित कराने का अभियान चलाये हुए हैं। प्रसन्नता की बात है कि इन दिनों भारत के साथ-साथ विश्व के अनेक देशों में रह रहे लाखों हिन्दू कार्यकर्ता इस अभियान में शामिल होते जा रहे हैं। सिन्धी समाज सदैव से सनातनी हिन्दू समाज रहा है। अतः सिंधी समाज भारत के पूज्यपाद शंकराचार्यों के नेतृत्व में चल रहे देश में धर्म का शासन स्थापित कराने के इस अभियान में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए।
उक्त आह्वान स्थानीय मसन्द सेवाश्रम के पीठाधीश साईं जलकुमार मसन्द साहिब ने गत दिनों लखनऊ में सिंधी समाज के विख्यात शिव शांति संत आसूदाराम आश्रम में आयोजित सत्संग तथा भारत एवं कुछ अन्य देशों में गठित सिंधी समाज के विभिन्न संगठनों के प्रमुख पदाधिकारियों की संयुक्त बैठक को सम्बोधित करते हुए किया। साईं मसन्द साहिब इस लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु चारों शंकराचार्यों की अध्यक्षता में गठित विश्व के १०८ देशों के अंतर्राष्ट्रीय हिन्दू संगठन परम धर्म संसद १००८ के संगठन मंत्री भी हैं। उल्लेखनीय है कि देश में यह अभियान सितम्बर २०१२ से साईं मसन्द साहिब की पहल पर चल रहा है।
साईं मसन्द साहिब ने बताया कि सिंधी समाज की धर्म, देश और लोककल्याण के क्षेत्र में हज़ारों वर्षों से आज तक बड़ी सराहनीय भूमिका रही है। विश्व के वर्तमान पाषाण लिपि वैज्ञानिकों ने हाल ही में पुष्टि की है कि हज़ारों वर्ष पूर्व की सिंधु घाटी सभ्यता की पाषाण लिपि, जिसे अब जाकर पढ़ा जा सका है, में वैदिक शास्त्रों की ऋचाएं दर्ज हैं। सनातन वैदिक संस्कृति का जीवन जीने वाले तत्कालीन सिंधी व्यापारी जलमार्ग से विश्व के अनेक देशों में लम्बे समय के लिए व्यापार करने जाते थे। वहां के नागरिकों पर इनकी सनातन वैदिक संस्कृति की जीवन शैली का प्रभाव पड़ता था। इस तरह उनका भारत को विश्वगुरु बनने में बड़ा योगदान रहा है।


