मां मावली आदि शक्ति स्वरूपा आदि काल से आदिवासी मनके आराध्य देवी रहिस अऊ आज भी हावय अऊ भविष्य में रहिही
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
मां मावली आदि शक्ति स्वरूपा आदि काल से आदिवासी मनके आराध्य देवी रहिस अऊ आज भी हावय अऊ भविष्य में रहिही घलो। काबर भूतकाल बीतगे भविष्य काल आने वाला हवय, वर्तमान काल अर्थात समय ह चलत हवय।
आज हमन जऊन हवन चाहे इतिहासकार होवय चाहे कहानी कार लेखक अऊ कवि अपन अपन हिसाब से ओ बीते इतिहास,अऊ वर्तमान चलत हे तेला लेके भविष्य के गणना करथे।फेर कतेक सत्य होथे कतेक नहीं ओ अपन अपन विचार हरे।
हमर क्षेत्र म माता मांवली के महिमा अऊ पूजा विधान रीति नीति परंपरा रहिस जेला हमन अपन पुरखा पूर्वज ले सुनेन जानेन कुछ वर्णन करे के लिखे के प्रयास करत हंव।आज प्रकृति ही सत्य हे जेला केवल ज्ञान संत महात्मा ही समझ पाथे भले ओ सत्य ल जान के भी जेन भी वर्णन करथे लेख लिखते हमन जाने सुने के प्रयास जरूर करथन।
सिंगापुर मावली वर्तमान में जिला बलौदाबाजार-भाटापारा के सिंगापुर अऊ लेवई गांव के मेड़ो म विराजमान हवय। जेकर इतिहास अईसन हवय जेला हम पूर्वज मन ले सुने रहेन।
700 से 800 सौ वर्ष के पहली समय के बात हरे जब आदिवासी कबिला ओ मेर ले गुजरत रहीन ऊंहा एक कुंड (छोटा तालाब) रहीस जेन जगा ढार परिन पानी देख के आराम करना हे कहिके खाना पकाईन खा के थोरकुन सुस्ताईन लेकिन नींद लग जथे।त ऊही समय माता सपना देथे कबीला के मुखिया ल कि बरहा हमला करने वाला हवय सावधान रहो हम यहां विराजमान है सावधान हो जाओ उसी समय मुखिया का अचानक नींद खुल जथे देखथे बरहा गुर्रात रहे अपन खांड़ा ल उठाईच तुरंत बरहा ऊपर वार करिस कुछ लोगन भाला बरछी अऊ तीर से घेर के शिकार करिन बरहा के खुन माता के निराकार पत्थर में पड़ीस माता प्रसन्न हो कबिला वाले मन ल संतान अऊ सुख समृद्धि के आशीर्वाद दे माता अदृश्य हो गे।कबिला के मुखिया बहु गर्भ से रहिस थोड़ा दूर प्रसव पीरा शुरू होय से एक सुन्दर बालक के जन्म होईस वही गांव आज लेवई पड़िस नवा संतान के जनम के कारण।तब मुखिया हो प्रतिमा ल धुप पानी ले बचाय खातिर खदर (घासफूस)ले छा के छावनी बनाईच।फेर खदर कब टिकय हवा के मार ल नई सह सकय उड़ा जय त छोटकून ठाना बनाईच जेला चुना अऊ पथरा ले बनाय गीच।
तब से आदिवासी कबीला गोंड समाज बरहा के बलि चैत्र नवरात्र में प्रतिवर्ष देके शुरू करिच। मनौती के पुरा होय म लोग धीरे-धीरे माता बलि स्वरूप बरहा से बकरा के बलि दे के शुरू करिन। पहली माता के ठाना म बलि देत रहिच कालांतर म वहां के पुजारी मन से पूजा कराके दाना लाके बाहर म दे जाथे आज भी प्रचलित हवय फेर सब के मनोकामना पूर्ण होवत हे।
आज के समय म कुछ लोग कुछ कुछ दिमाग लगाथे जेन पहली ले चलत आवत हे तेला अपन आप ल संभ्रांत मानने वाला में बंद करावत हवय अपन हक अधिकार जमावत हव।कहे के मतलब आदिवासी कल्चर रूढ़ीवादी परंपरा संस्कृति रीति नीति ल लगभग बंद करे के प्रयास करें जात हवय। पूर्व से ही सब जमीन म आदिवासी के नाम रहिस पर धीरे धीरे सब ल कुछ संभ्रांत लोग शासन प्रशासन के माध्यम ले अपन नाम भी करात जात हवय।
जिहां आदिवासी पुर्वज आदिकाल से खदर काट के महासभा करय आज आदिवासी मन अपन हक अऊ वर्चस्व ले दूर करे जात हवय।आज जेन आदिवासी इतिहास मावली के इतिहास ल नई जानय तेन अपन हक अधिकार जमात हे।
क्षेत्र म एक मावली माता के बात नहीं उही प्रकार ले दाई तुरतुरिया बार नवापारा के माता गढ़ के भी रहस्य रहय लेता तथाकथित मन अपन हिसाब से पूर्व से चलत आवात मान्यता ल मिटावत जात हवय। आदिकाल से चाहे माता मावली हो, तुरतुरिया हो,निरई माता हो,सब ल बंद करें जात हवय।लोग ल पता नईय्ये जेन माता शक्ति देथे ओकर ताकत अऊ आदिवासी संस्कृति ल नष्ट करें जात हवय।जो भविष्य के लिए प्राकृतिक आपदा विपदा के देवी प्रकोप के कारण भी बन सकत हे।
क्यों कि प्रमाण जब तक माता खून नहीं डारेगा बच्चे का जन्म असंभव है।उसी जन्म संरक्षण और संहार और आदिवासी रीति नीति परंपरा पर आधारित है के आधार ही आदिवासी बलि देते आ रहे हैं।पर आजकल कुछ लोग खाते तो जरूर हैं।पर देव स्थानो पर प्रतिबंधित कर रहे हैं। क्या मानव मांसाहार छोड़ सकता है, हां तो बाजारो में बिक्री क्यों? व्यापार और उद्योग व्यवसाय में बढ़ावा क्यों? आदिवासियों और उनके रीति-रिवाजों पर हस्तक्षेप न करें। अन्यथा सबका भविष्य और प्रकृति अंधकार में पड़ सकता है।ये मैं नहीं विज्ञान और प्रकृति पर आधारित संतुलन का सिद्धांत कहत हवय।
धन्यवाद
जय सेवा जय बुढ़ादेव जय जोहार
आर के कुंजाम प्रकृति

