Friday, July 24, 2026
Latest:
सामाजिक

छत्तीसगढ़ में आरक्षण का मामला फसने पर आदिवासी समाज में नाराजगी देखी जा रही है -अरविन्द नेताम

जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्युज अरविंद नेताम ने कहा विशेष चर्चा का विषय है आरक्षण का मुद्दा और ये पिछले सितंबर मैं हाईकोर्ट के फैसले के बाद उठा है और हाईकोर्ट के फैसले से सबसे ज्यादा प्रदेश आदिवासी समाज दुखी भी है चिंतित भी है, संविधान के हिसाब से आरक्षण अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का संविधान यही कहता है जितनी आबादी होगी उतना आरक्षण होगा या फिक्स है इसमें कोई कंफ्यूजन नहीं है।मध्यप्रदेश में हमारी आबादी 20 परसेंट था तो 20% आदिवासियों को और 16% मध्यप्रदेश में शेड्यूल कास्ट का था।नया राज्य बना तो भारत सरकार ने नया आदेश जारी किया उसमें हमारा 20 से 32 हुआ और शेड्यूल कास्ट का 16 से 12 परंतु पिछली सरकार ने करीब 5 से 6 शाल पेंडिग रखा…

2011 में हम लोगों ने आंदोलन किया,जेल भी गए तब कहीं जाकर के ये आदेश पालन हुआ पर उसमे बैकवार्ट क्लासेस का 6 से 14 हुआ यानी के कुल 58% का आरक्षण जो इंदिरा साहनी जजमेंट जो है सुप्रीम का उससे 8% ज्यादा हो गया और शायद वही एक बेस था माननीय हाईकोर्ट का जिसको पूरी की पूरी आदेश को असंवैधानिक घोषित किया है और आज वह सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।

मेरे हिसाब से आरक्षण विशुद्ध रूप से संवैधानिक मामला है कोई एडमिनिस्ट्रेटिव आर्डर से होता नहीं बस संविधानिक मामला है और इस मामले को संविधान के दायरे में रहकर ही सोचना चाहिए देखना चाहिए।अरविंद नेताम ने आगे कहा…अभी आरक्षण के मामले को लेकर हम लोग इतना उलझ गए हैं समाज में पर उसे भी महत्वपूर्ण है पेसा कानून हो यह तो नेक्स्ट स्टेप में हम भी जायेंगे समाज के सामने पेशा कानून ज्यादा महत्वपूर्ण है इसलिए जल जंगल जमीन पर अधिकार ढाई सौ साल से समाज का नहीं था अंग्रेजों से लेकर के 1996 तक भारत सरकार आजाद हुआ उसके बाद भी नही था, पेशा कानून 96 में बना उसमें जल जंगल जमीन पर समाज का नियंत्रण यह पहली बार कानून बना जो कभी सोच भी नहीं सकता था और उसको ही सरकार ने एक झटके में खत्म कर दिया।

चिंता का विषय है इस पर आज तक राज्य सरकार से कोई स्पष्टीकरण नहीं आया ।