शोध पुस्तिका संभू ईशर गवरा के शौर्य, शिक्षा, सृजन दर्शन, कृषि परंपरा, लोक जीवन तथा सांस्कृतिक विरासत को शोधपरक दृष्टि से प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास है
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज लोकमान्यताओं, सांस्कृतिक साक्ष्यों, ऐतिहासिक संदर्भों एवं विविध छायाचित्रों के माध्यम से विषय को प्रमाणिक रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हम मूलवासियों की इतिहास, लोकसंस्कृति एवं परंपरागत ज्ञान पर आधारित शोध पुस्तिका “संभू ईशर-गवरा” शौर्य सृजन की लोकगाथा पर आधारित है। यह केवल पुस्तक नहीं, बल्कि परंपरा और पहचान का दस्तावेज है, जो आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखने में सहायक सिद्ध होगी ऐसा विश्वास है।

इतिहास साक्षी है कि करोड़ों वर्ष पूर्व इस धरती को गोंडवाना लैण्ड के नाम से जाना जाता था। पांच खंड (अफ्रीका, यूरोप, कोयामुरी / एशिया, अमेरिका (उत्तर और दक्षिण अमेरिका मिलाकर), ऑस्ट्रेलिया / ओशिनिया) में विस्तृत इस धरती की सांस्कृतिक स्मृतियों में संभू शेख परंपरा का उल्लेख मिलता है। यह परंपरा केवल लोक कथाओं में नहीं, बल्कि प्रकृति के गर्भ में राज-दाई (ऊना-पुना) शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित जीवनदर्शन है, जो आज भी समाज को दिशा देता है।
आदि अनंतकाल से प्राकृतिक तत्वों और जीवों की व्यवहारिक शक्तियों को जीवनपथ में उतारकर आदिम समाज ने अपनी सांस्कृतिक निरंतरता बनाए रखी है। यही कारण है कि यह समाज आज भी प्रकृति सम्मत और संतुलित जीवन का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
अनादिकाल से चली आ रही शंभूओं की गौरवशाली परिपाटी-अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाये रखने, मनोकामना पूर्ति एवं लोक आस्थाओं की पूर्ति के लिए शंभू ईशर-गवरा दाई का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा से लिया जाता है।
उनकी अमर कीर्ति और शौर्यगाथाएँ केवल आदिम समाज तक सीमित नहीं, बल्कि लोकगाथाओं के रूप में व्यापक जनमानस में परिलक्षित हैं। उनके स्मरण में प्रतिवर्ष कार्तिक अमावस्या को शंभू ईशर राजा और गवरा दाई का मड़मिंग (विवाह संस्कार) बड़े ही हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न कराया जाता है। यह आयोजन केवल सांस्कृतिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि समाज को संगठित, सुसंस्कारित और सांस्कृतिक रूप से एकजुट करने का माध्यम है।
आदिम मान्यता के अनुसार, इस प्रतीकात्मक विवाह संस्कार पूर्ण होने के पश्चात् ही समाज में बाकी आमजन में विवाह संस्कार प्रारंभ किये जाते हैं। यह परंपरा सामाजिक अनुशासन और सांस्कृतिक मर्यादा की गहन भावना को दर्शाती है।
आज आवश्यकता है कि हम इस अमूल्य सांस्कृतिक विरासत को केवल उत्सवों तक सीमित न रखें, बल्कि उसे समझें, संजोएँ और समाज के व्यापक हित एवं मूल दृष्टिकोण के साथ आगे बढायें। इसी शुभकामना के साथ… जय ईशरदेव, जय गवरा दाई, जय सेवा प्रदेश अध्यक्ष चन्द्रभान नेताम ने कहा कि आगामी 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस पर पुरे आदिवासी प्रदेश के साथ हर जिले में मनाया जाएगा और 28 अगस्त को भोजली महस्व राष्टीय स्तर पर किया जाएगा उसमें अनेक राज्यों से आदिवासी उपस्थित रहेंगे

