9 अगस्त अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस पुरे देश के आदिवासी प्रतिनिधियों का जनसैलाब इंडोर स्टेडियम रायपुर
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस इंडोर स्टेडियम में सबसे पहले बुड़ा देव की की पूजा किया गया और आदिवासी पुरखों को नमन करते हुए माल्यार्पण किया गया पर उसके उपरांत सुबह 12:00 बजे से इंडोर स्टेडियम से सिटी कोतवाली होते हुए जय स्तंभ चौक में शहीद वीर नारायण सिंह जी के शहादत स्थल को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वापस इंडोर स्टेडियम पहुंचे उसके बाद मंच में मुख्य अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया गया स्वागत भाषण में बी.एस.रावटे ने कहा आज पूरे विश्व आदिवासी दिवस मनाया जा रहे हैं उसके तत्वावधान में भारत देश पहुंचे प्रतिनिधियों का स्वागत किया और उसने धन्यवाद भी दिया इस कार्यक्रम का उद्देश्य को भी बताएं आज आदिवासी धर्मकोट की पूरे देश के आदिवासी एक साथ मिलकर भारत सरकार से मांग करेंगे आज विशेष राष्ट्रीय पेरि संवाद में देश भर के आदिवासी समाज के प्रतिनिधि सामाजिक चिंतन शिक्षाविद विधि विशेषज्ञ एवं जनप्रतिनिधि सहभागिता करेंगे पेरसंवाद में आदिवासी धर्म कोड से जुड़े प्रमुख विषयों का विस्तृत चर्चा किया गया धर्म कोड को प्राप्त करने की संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रिया उसके संभावित सामाजिक संस्कृति एवं प्रशासनिक लाभ आगामी जनगणना में धर्म संबंधी प्रविष्टि तथा धर्म कोड की मान्यता हेतु समाज द्वारा हम सब मिल मिलकर उठाने कि आवश्यक कदम में शामिल होने आए हैं साथ ही आदिवासी समाज की भूमिका जन जागरूकता संगठनात्मक रणनीति एवं भविष्य की कार्य योजना पर भी यहां पर चर्चा होगी
देव कुमार धान( पुर्व मंत्री झारखंड)ने कहा 9 अगस्त नाच गान का दिन नहीं है भारत की सरकार हमें आदिवासी नहीं मानती चाहे कांग्रेस की हो या बीजेपी की सरकार संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत सरकार के प्रतिनिधि जाकर बोलते हैं कि भारत में आदिवासी नहीं रहते देश के राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस को एक शब्द बधाई भी नहीं देते भारत सरकार से पूरे देश के आदिवासी मांग करते हैं कि 9 अगस्त को राष्ट्रीय आदिवासी दिवस घोषित करें भारत सरकार से मांग करते हैं सुर्य सिंह बेसरा (पुर्व विधायक झारखंड )ने कहा आदिवासी जनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा मानव अधिकार परिषद ने अपने 29 जून 2006 के जिस संकल्प के द्वारा आदिवासी जनों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र की घोषणा के मूल पाठ को स्वीकार किया जिसमें शामिल परिषद के सिफारिश को ध्यान में रखते हुए अपने 29 जुन 2006 के कल्पना के द्वारा आदिवासी जनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा के मूल पाठ को स्वीकार किया इसमें शामिल परिषद की सिफारिश को ध्यान में रखते हुए संकल्प 61/178प को याद करते हुए इसके अनुसार उसने घोषणा पर विचार किया और कार्यवाही को टालने का निर्णय लिया था ताकि उसे पर विचार विमर्श करने के लिए समय मिले और साधारण सभा का 61वां सत्र खत्म होने के पहले उसे पर विचार को पूरा करने का निर्णय लिया था वर्तमान संकल्प के परिशिष्ट में दिए हुए अनुसार आदिवासियों को अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संघ की घोषणा को स्वीकार करती है आदिवासी जनों को पारंपरिक अवस्थियों का प्रयोग करने और उनके स्वास्थ्य सेवा पद्धति कायम रखने का अधिकार है जिसमें अपने महत्वपूर्ण औषधि में पेड़ पौधे जानवरों तथा खनिजों का संरक्षण शामिल है आदिवासी जनों को बिना किसी भेदभाव के सभी सामाजिक एवं स्वास्थ्य सेवा प्राप्त करने का अधिकार है आदिवासी युवतियों को साथ उच्च स्तरीय शिक्षा की शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य का उपयोग करने का समान अधिकार है राज्य इस अधिकार के उत्तर हासिल करने की दृष्टि से उसे जरूर कदम उठाएंगे इस प्रकार करके उसने अनुच्छेद 1 से 40 अनुच्छेदों का उल्लेख पढ़कर बताया और इसको पूरा देश में पालन करने को कहा गया अरविंद नेताम (पुर्व केबिनेट मंत्री) ने सबसे बड़ा मुद्दा संविधान के बारे में समझने की समीक्षा करने की आदिवासियों को कितना अधिकार दिया है और संविधान को लोगों ने किस प्रकार का उपयोग में लाते हैं संविधान निर्माता भीमराव अंबेडकर को भी नहीं करते जितना संविधान को करते हैं जो संविधान में आदिवासी के अधिकार के बारे में लिखा गया है 1935 में लंदन विश्व पार्लियामेंट में जो कानून में सरकार के लिए बनाया गया उसमें सबसे ज्यादा आदिवासियों के बारे में चर्चा किया गया संविधान को पढ़कर उसके लिए विकल्प ढूंढने के लिए 1935 का कानून महात्मा गांधी ने खुद कहा कि मेरे पास टाइम नहीं है कि आदिवासियों को के बारे में पढ़ा जाए 1935 में अंग्रेजों से पहले लाखों आदिवासी के बारे में कानून बनाया गया संविधान सभा में कुछ ऐसे व्यक्ति है जो इस संविधान के बारे में अनेक प्रकार की चर्चा करते थे मेरा प्रश्न यही था कि संविधान का जितना भी कानून बनाएं उसकी विश्लेषण होनी चाहिए उसकी समीक्षा होनी चाहिए संविधान का आज देश में खुले आम उल्लंघन करते हुए देखा जा रहा है हर राजनीतिक पार्टी अपनी रोटी सेखने के लिए आदिवासियों का प्रयोग करते हैं मैं एक कानून का उदाहरण दूंगा आपको स्पष्ट करूंगा कि पेसा कानून जब भारत सरकार ने 1991 में आर्थिक नीति परिवर्तन की उसकी उदारीकरण लाया गया तो 1991 से पहले आदिवासी एरिया में टाटा या बिरला को घुसने नहीं दिया जाता था इनकी उपकर्मो को वहां तक जाने की अनुमति नहीं था परमिशन नीति कभी-कभी तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर आजाद जी के उदारीकरण के बारे में याद करके सीधा गांधी का देश कहा जाता है जिस देश में उदारीकरण अमेरिका के हिसाब से करने के लिए सरकार ने योजना बनाई जिसमें पांचवी अनुसूची छठी अनुसूची SC/ST पार्लियामेंट में जाने में उदारीकरण का विरोध हुआ इसको हमको समझने के लिए दिल्ली के यूनिवर्सिटी डीयू के प्रोफेसर JNU के प्रोफेसर को बुलाया गया उसने हमें स्पष्ट बताया कि इसमें आप लोगों की नुकसान है क्योंकि इसमें उद्योगपति का आपके पांचवी अनुसूचियां छठी अनुसूची में हस्तक्षेप बढ़ जाएगी इसलिए पैसा कानून लाया गया उसमें स्पष्ट दर्शाया गया है कि बिना ग्राम सभा के कोई भी उद्योग स्थापित नहीं किया जा सकता है और 5वीं अनुसूची मैंने अपने जीवन काल में राजनीति में था कभी भी मैंने आदिवासियों राजनीतिक जीवन में समझौता नहीं किया आज तक भारत सरकार ने उसका पालन नहीं किया जितने भी ग्राम सभा हुए हैं सब फर्जी है इस अवसर पर भुवन कोर्राम मध्यप्रदेश प्रदेश राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष मधुकर उयके प्रोफेसर महाराष्ट्र डा. हीरा मीणा प्रोफेसर दिल्ली करमा लकड़ा उड़ीसा विश्वनाथ वाकड़े महाराष्ट्र मनोहर मेश्राम तेलंगाना श्रीमती रेखा सोरेन बिहार जनार्दन कोड़ा पश्चिम बंगाल प्रवेश वसावा गुजरात सभी राज्यों के आदिवासी प्रतिनिधि उपस्थित थे विशिष्ट अतिथि अकबर राम कोर्राम गोड़वाना गोड़ महासभा अध्यक्ष मंगतु राम पवार पुर्व विधायक हरवंश मिरी प्रदेश अध्यक्ष कंवर समाज विकास समिति रामेश्वर उरांव प्रदेश अध्यक्ष रमेश यदु प्रदेश अध्यक्ष छत्तीसगढ़िया सर्व समाज लखन लाल साहू लखन लाल कोशले सुदिप श्रीवास्तव वकिल सुप्रीम कोर्ट दिल्ली जी आर राणा पुर्व अपर कलेक्टर जी आर चुरेद्रा कमलेश धुर्वे नकुल चन्द्रवंशी अनुसुचित जनजाति शासकीय सेवा संघ महासचिव मोहन कोमरे प्रदेश अध्यक्ष अधिकारी कर्मचारी प्रकोष्ठ सर्व आदिवासी समाज विनोद भगत श्रीमती अकदा ठाकुर प्रदेश उपाध्यक्ष सर्व आदिवासी समाज विनोद नागवंशी प्रदेश सचिव सर्व आदिवासी समाज जयपाल ठाकुर मनहरन चंद्रवंशी शंकर कुंजाम कौलाश नेताम रुपेश नागरची देवनाश नागरची महेश रावटे कमलेश मंडावी जिवराखन लाल उसारे प्रदेश मिडिया प्रभारी सर्व आदिवासी समाज पुरे देश भर आदिवासी समाज लगभग 5 हजार कि संख्या में उपस्थित थे आदिवासी धर्म कोड आगामी जनगणना इस विशेष राष्ट्रीय परि संवाद में देशभर से आदिवासी समाज के प्रतिनिधि सामाजिक चिंतन शिक्षाविद विधि विशेषज्ञ एवं प्रतिनिधि सहभागिता करेंगे परि संवाद में आदिवासी धर्म कोड से जुड़े प्रमुख विषयों पर विस्तृत चर्चा की गई धर्म कोड प्राप्त करने की संवैधानिक एवं वैधानिक प्रक्रिया इसके संभावित सामाजिक संस्कृति एवं प्रशासनिक लाभ आगामी जनगणना में धर्म कोड संबंधी प्रविष्टि तथा धर्म कोड की मान्यता हेतु समाज द्वारा उठाए जाने वाले आवश्यक कदम शामिल है साथ ही आदिवासी समाज की भूमिका जनजागरूकता संघटनात्मक रणनीति एवं भविष्य की कार्य योजना पर विचार विमर्श कर सामूहिक संकल्प लिया गया
देश के ट्राइबल कम्युनिटी 9 अगस्त को विश्व आदिअवासी दिवस के रूप में बड़े धूमधाम से मनाता है लेकिन भारत गणराज्य का इस पर्व पर विस्मयकारी मौन कई सवाल खड़े करता है. भारत सरकार की इस विषय पर नीति क्या है? और नियत कैसा है? इस पर चर्चा करना सामयिक है.
विश्व महापंचायत जिसे “ संयुक्त राष्ट्र संघ “ यूनाइटेड नेशन ऑर्गेनाइजेशन –UNO के वैधानिक नाम से जाना जाता है. इस माह पंचायत के भारत सहित विश्व भर के 193 देश सदस्य हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध में परमाणु अस्त्रों के विभीषिका के बाद 1945 में स्थापित यह संगठन मुख्य रूप से विश्व शांति, मानवाधिकार और पर्यावरण जैसे विषयों पर केन्द्रित कार्यदल गठित कर वैश्विक विमर्श और कार्य योजना तैयार करता है.
विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर फोकस करने के लिए कुछ “ ध्येय दिवस” निर्धारित किया गया है. जैसे 5 जून : विश्व पर्यावरण दिवस, 22 मार्च : विश्व जल दिवस, 21 सितम्बर अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस, 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस … इत्यादि. इनमे से कुछ “विश्व दिवस” और कुछ “अंतर्राष्ट्रीय दिवस” हैं. ऐसा क्यों ? जिस विषय पर समस्त सदस्य राष्ट्र एकमत हैं उस मुद्दों पर “विश्व दिवस” घोषित किया जाता है . जिन मुद्दों पर सभी सदस्य राष्ट्रों की सहमति नहीं बन पाती उसे “अंतर्राष्ट्रीय दिवस” का नाम दिया जाता है.
ऐसा ही UNO के मानवाधिकार पर गठित कार्य दल ने यह पाया कि सर्वाधिक मानवाधिकार का उलंघन (Human right Violetion) और भेदभाव पूर्ण व्यौहार किसी भी राष्ट्र के देशज जनसंख्या (native / Indigenous Population) पर हो रहा है. उनके सम्मानपूर्ण जीवन के अधिकार सहित उनके भूमि, भाषा, भूषा, संस्कृति एवं आस्था के संरक्षण की आवश्यकता है. जिस उप आयोग ने यह परामर्श प्रस्तावित किया उसकी पहली बैठक 9 अगस्त 1982 को जेनेवा में हुई थी.
23 दिसंबर 1994 में संयुक्तर राष्ट्र संघ के महासभा (General Assembly of U.N.O.) ने उपरोक्त प्रस्ताव को पारित किया और 9 अगस्त को “अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस” ‘The International day of World’s Indigenous people “ घोषित किया.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत गणराज्य का प्रतिनिधित्व भारत सरकर ( Government of India) करता है न कि कोई राज्य सरकार. UNO द्वारा पारित उक्त प्रस्ताव और घोषणा से कुछ राष्ट्र सहमत नहीं हैं उसमें भारत भी शामिल है. इसलिए 9 अगस्त विश्व आदिवासी दिवस न होकर अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस (The International day of World’s Indigenous people) हो गया. 1982 से लेकर अब तक भारत राष्ट्र में सरकारें बदलती रही है लेकिन UNO में भारत का स्टैंड अपरिवर्तित है कि देश में सभी indigenous people हैं किसी के साथ भेदभावपूर्ण व्यौहार नहीं हो रह है. इसलिए भारत सरकार अंतर्राष्ट्रीय आदिवासी दिवस को अधिकारिक मान्यत नहीं देता.
2000 के दशक में देश में पहली बार रांची झारखण्ड में विश्व आदिवासी दिवस मनाया गया जिसमें देश भर के आदिवासी नेता, कार्यकर्त्ता गण शामिल हुए थे. छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व मा. अरविन्द नेताम और शिशुपाल शोरी बी. एस. रावटे ने किया था.
भारत में ट्राइबल कम्युनिटी ही अपने आप को देशज या नेटिव (indigenous people) मानता है और अपने साथ अन्याय और शोषण के लिए बाहरी व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहराता है. इसलिए indigenous people शब्द को सुविधानुसार “आदिवासी” या “मूलनिवासी” से प्रतिस्थपित किया जा सकता है.
अमेरिका और आस्ट्रेलिया जैसे विकसित राष्ट्र में भी tribals हैं और उनके अधिकार सुरक्षित हैं. अमेरिका में 574 और आस्ट्रेलिया में 600 ट्राइबल प्रजातियाँ को मान्यता प्राप्त है. अमेरिका में प्रमुख नेटिव ट्राइब्स में से एक “रेड इंडियन” है. इसवी सन 1492 में इटली के समुद्र यात्री क्रिस्टोफर कोलंबस ने गोल्डन बर्ड – इंडिया के खोज में जहाज लेकर निकला और पहुँच गया अमेरिका. अपने यात्रा वृतांत में वहां के गोरे – लाल रंग के त्वचा वाले ट्राइबल्स को गलत पहचान से “रेड इन्डियन” नाम दे दिया.

