समयपूर्व जन्मे बच्चों की बेहतर देखभाल और मितानिनों के कल्याण के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने की पहल
जिवराखन लाल उसारे छत्तीसगढ़ ग्रामीण न्यूज
रायपुर, छत्तीसगढ़ | 4 नवंबर 2026
समाज के प्रत्येक नवजात शिशु को स्वस्थ जीवन और बेहतर भविष्य का अवसर मिले तथा स्वास्थ्य सेवाओं की पहुँच अंतिम छोर तक सुनिश्चित हो — इसी उद्देश्य से State Health Systems Resource Centre (SHSRC), द्वारा मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य तथा सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के कल्याण से जुड़े विषयों पर विशेष पहल की जा रही है। इसी क्रम में World Prematurity Awareness Week (विश्व समयपूर्व जन्म जागरूकता सप्ताह) के माध्यम से समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों की विशेष देखभाल, उनके स्वास्थ्य, पोषण एवं समुचित विकास के प्रति जनजागरूकता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
1. समयपूर्व जन्मे बच्चों की देखभाल एवं जागरूकता
SHSRC, के तकनीकी सलाहकार डॉ. संतोष कुमार क्रालेटी ने बताया कि गर्भावस्था के 37 सप्ताह पूरे होने से पहले जन्म लेने वाले शिशुओं को प्रीटर्म अथवा समयपूर्व जन्मे शिशु कहा जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में प्रत्येक 10 में से लगभग एक बच्चा समयपूर्व जन्म लेता है। ऐसे शिशुओं को जन्म के बाद विशेष चिकित्सकीय देखभाल, पोषण और निरंतर निगरानी की आवश्यकता होती है।
डॉ. क्रालेटी ने कहा कि भारत और छत्तीसगढ़ के आँकड़े इस विषय की गंभीरता को दर्शाते हैं। द लैंसेट (2023) के अनुसार वर्ष 2020 में भारत में लगभग 30.2 लाख शिशु समय से पहले जन्मे, जो दुनिया में सबसे अधिक है; देश में लगभग हर 100 में से 13 शिशु समयपूर्व जन्म लेते हैं। नमूना पंजीकरण प्रणाली (SRS 2024) के अनुसार छत्तीसगढ़ की शिशु मृत्यु दर 36 प्रति 1,000 जीवित जन्म है, जो देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक है, जबकि राष्ट्रीय औसत 24
उन्होंने कहा कि समयपूर्व जन्मे बच्चों की देखभाल केवल अस्पताल में भर्ती रहने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। अस्पताल से छुट्टी के बाद भी उनके स्वास्थ्य, वजन, पोषण, टीकाकरण तथा शारीरिक एवं मानसिक विकास की नियमित निगरानी जरूरी है। इसके लिए निम्न बिंदुओं पर विशेष जागरूकता आवश्यक है—
गर्भवती महिलाओं की नियमित प्रसवपूर्व जाँच और समय पर स्वास्थ्य परामर्श।
समयपूर्व जन्म के जोखिमों की पहचान तथा आवश्यकता पड़ने पर उचित स्वास्थ्य संस्थान में रेफरल।
जन्म के बाद नवजात शिशुओं को आवश्यक विशेष चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना।
कंगारू मदर केयर (Kangaroo Mother Care) एवं स्तनपान को प्रोत्साहित करना।
अस्पताल से छुट्टी के बाद नियमित स्वास्थ्य जाँच और बच्चे के विकास की निगरानी।
परिवारों को नवजात शिशुओं की देखभाल के संबंध में सही जानकारी एवं सहयोग देना।
विश्व समयपूर्व जन्म दिवस हर वर्ष 15 नवंबर को मनाया जाता है। इस वर्ष का संदेश है — “Small Babies, Big Potential – Invest in Follow-up Care to Protect Their Future.” अर्थात छोटे शिशुओं में भी असीम संभावनाएँ हैं; उनके भविष्य की सुरक्षा के लिए निरंतर स्वास्थ्य देखभाल में निवेश आवश्यक है।
2. बस्तर में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सुधार की पहल
डॉ. क्रालेटी ने बताया कि बस्तर संभाग में घने जंगल, नदी-नाले, दूर-दूर बसे पारे और बरसात में कट जाने वाले गाँव स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच की सबसे बड़ी बाधा हैं। संभाग के सभी सात जिलों में संस्थागत प्रसव 71.5 से 82.3 प्रतिशत के बीच है, जो राज्य औसत 86.9 प्रतिशत से कम है।
इन चुनौतियों को कम करने के लिए SHSRC, सहयोगी संस्थाओं के साथ बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और सुकमा जिलों में जमीनी स्तर पर कार्य की योजना बना रहे हैं। इसके प्रमुख बिंदु हैं—
हर पारे का स्वास्थ्य-पहुँच सर्वे: नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र तक पैदल लगने वाला समय, सड़क, नदी-नाले और बरसात में संपर्क कटने के महीनों का रिकॉर्ड।
बरसात के महीनों में प्रसव वाली, दूरस्थ पारों की गर्भवती महिलाओं को प्रसव से एक-दो सप्ताह पहले प्रसव प्रतीक्षा गृह में ठहराना।
मितानिनों द्वारा जन्म के बाद पहले छह सप्ताह तक हर नवजात का गृह-भ्रमण; कम वजन और समयपूर्व शिशुओं की पहचान, कंगारू मदर केयर और समय पर एसएनसीयू रेफरल।
सड़क के अंतिम छोर पर एम्बुलेंस मिलन बिंदु तय करना और दुर्गम क्षेत्रों के लिए मोटरसाइकिल एम्बुलेंस।
गोंडी, हल्बी, भतरी और दोरली भाषाओं में स्वास्थ्य संदेश।
इन कार्यों को अंतिम रूप देने के लिए सहयोगी संस्थाओं, क्षेत्रीय अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ परामर्श बैठकों (राउंडटेबल) की श्रृंखला प्रस्तावित है, ताकि 2027 के मानसून से पहले जमीनी कार्य शुरू हो सके।
3. दिव्यांगता से जुड़े आँकड़ों का संकलन एवं पहल
डॉ. क्रालेटी ने बताया कि बस्तर के जिलों में दिव्यांगता के जिला-स्तरीय आँकड़े सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं हैं, इसलिए दिव्यांगता से जुड़े आँकड़े एकत्र किए जा रहे हैं। जनगणना 2011 के अनुसार छत्तीसगढ़ में 6,24,937 व्यक्ति (कुल आबादी का 2.45 प्रतिशत) दिव्यांग थे, जिनमें से लगभग एक-तिहाई चलने-फिरने से जुड़ी दिव्यांगता से प्रभावित थे। ऐसे लोगों के लिए जंगल के रास्ते या नदी पार कर स्वास्थ्य केंद्र तक पहुँचना और भी कठिन है। समयपूर्व जन्मे शिशुओं में भी आगे चलकर देखने, सुनने और सीखने से जुड़ी समस्याओं का खतरा अधिक होता है।
इस दिशा में—
मितानिन हर पारे के सर्वे में दिव्यांग व्यक्तियों का विवरण दर्ज करेंगी: दिव्यांगता का प्रकार, UDID कार्ड की स्थिति और व्हीलचेयर, श्रवण यंत्र जैसे सहायक उपकरणों की आवश्यकता।
समाज कल्याण विभाग और सहयोगी संस्थाओं के साथ ब्लॉक स्तर पर पहचान एवं प्रमाणन शिविर आयोजित किए जाएँगे।
समयपूर्व और कम वजन वाले शिशुओं की नियमित जाँच कर देखने, सुनने और विकास में देरी जैसी समस्याओं की जल्द पहचान और समय पर उपचार सुनिश्चित किया जाएगा।
पहचाने गए दिव्यांग व्यक्तियों को प्रमाणपत्र, सहायक उपकरण और सरकारी योजनाओं से जोड़ा जाएगा।

